Tuesday, 31 December 2013

ग़ज़ल 33

ग़ज़ल 33

दिल करता है, तेरे नाम पर मर जाने को
कितने फसाद किए तूने मुझे रुलाने को.

मेरा चमन उजाड़ कर भी चैन न मिला तुझे
रोज़ भेजता है लाल फूल दिल जलाने को.

खुद अँधेरों में बैठा है तो मैं क्या करूँ
क्यों चला आता है मेरी रोशनी बुझाने को?

कितनी बदसलूकियाँ, कितनी बदतमीज़ियाँ
कितने तामझाम मेरा सब्र आज़माने को?

कौन से पल में मेरी तकदीर ने धोखा किया
याद क्यों रखूँ उसे पर क्या करूँ भुलाने को?

Wednesday, 11 December 2013

आज की प्रार्थना Kavita 181

आज की प्रार्थना

चलो, चलें एक ऐसी राह
जहाँ न हो कोई परवाह।

हम अपने में हों संतुष्ट
मन में नहीं किसी की चाह.

हँसी का हस्तक्षेप रहे
न कोई दर्द, न कोई आह.

द्वेष घृणा सब जाएँ भूल
किसी से न हो कोई डाह.

सुलझें सब उलझे हुए धागे
मस्त चैन की न कोई थाह.

बुझ जाएँ जलते अंगार
जीवन ऐसा कि वाह वाह.

Wednesday, 4 December 2013

ग़ज़ल 32

ग़ज़ल 32

एक खूबसूरत रिश्ते का अंत
कब आया, कब बीत गया बसंत।

शुरु-शुरू में जिसकी थी विभावरी 
कहीं खो गया वह पागल महंत।

सहम गया देखा जो इतना धन
कि दिल कब से था बैरागी संत.

सूनेपन में गूँजी थी सरगम
लहराई थी स्वर की छवि अनंत।

अश्रु-ताप ऐसा कि झुलसे स्वप्न
जूझने को रह गए प्रश्न ज्वलंत।

अब कोई उत्सुकता शेष नहीं
सम्भावनाओं का शापित अंत.