Wednesday, 4 December 2013

ग़ज़ल 32

ग़ज़ल 32

एक खूबसूरत रिश्ते का अंत
कब आया, कब बीत गया बसंत।

शुरु-शुरू में जिसकी थी विभावरी 
कहीं खो गया वह पागल महंत।

सहम गया देखा जो इतना धन
कि दिल कब से था बैरागी संत.

सूनेपन में गूँजी थी सरगम
लहराई थी स्वर की छवि अनंत।

अश्रु-ताप ऐसा कि झुलसे स्वप्न
जूझने को रह गए प्रश्न ज्वलंत।

अब कोई उत्सुकता शेष नहीं
सम्भावनाओं का शापित अंत.

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