Wednesday, 24 December 2014

कोई सन्देश आए Kavita 225

कोई सन्देश आए

तुम्हारी बात में कुछ बात ऐसी
सहस्रों मन्त्र उच्चारित हों जैसे
कि ज्यों कानों में कोई गुनगुनाता।

तुम्हारे राजसी अंदाज़ ऐसे
अनेकों भेद अपने में छुपा कर
चला उन्मत्त दरिया छलछलाता।

तुम्हारे शब्द में हैं अर्थ मेरे
कहीं एक छद्म झोंका चाहतों का
मेरे कमज़ोर दिल तक सनसनाता।

हवाओं को पकड़ कर कैद कर लूँ
खुद अपने साथ तो हो लूँ ज़रा सा
कि हरियाला सा सपना लहलहाता।

कि जैसे रोशनी बंधक बनी हो
कि जैसे जीतने की धुन ठनी हो
कोई सन्देश आए खनखनाता।


Tuesday, 23 December 2014

Gazal 44

Gazal 44

आज भी आती है तुम्हारी याद उसी तरह
आज भी पुख्ता है पूरी बुनियाद उसी तरह.

कितनी खाई तुमने खोदी, कितनी खोदी मैंने
चलता आ रहा अब तक यही विवाद उसी तरह.

आओ, सबसे छुप कर हम दूर कहीं बस जाएँ
आज भी दोस्त हैं बने हुए जल्लाद उसी तरह.

मन का यह वीरान खंडहर रोशन ही रोशन
आज तुम्हारी यादों से आबाद उसी तरह.

आओ, प्रेम धरा पर हम घर का सपना बोएँ
दूर-दूर तक बिछी हुई है खाद उसी तरह.

शुरू शुरू में हम दोनों ने जैसे किया संघर्ष
आ, स्थापित करें प्रेम का नया वाद उसी तरह.

रोज़ घृणा का गरलपान कैसे करते हो?
आ, हाथ बढ़ा कर शुरू करें संवाद उसी तरह.

जितना जीवन जो साथ जिया गर अर्थहीन था
आ, हो जाएँ फिर से हम तुम बरबाद उसी तरह.


Monday, 22 December 2014

आज की प्रार्थना Kavita 224

आज की प्रार्थना

जीने की कोई चाह नहीं
मरने की कोई राह नहीं।

सूख गया आँखों का पानी
होठों पर कोई आह नहीं।

कोई मोल न सुख का, दुःख का
कोई भी अब परवाह नहीं।

काँटे कभी न जिसे चुभे हों
ऐसा तो कोई शाह नहीं।

जैसे सब कुछ बीत गया हो
बची कोई वाह-वाह नहीं।

Sunday, 21 December 2014

संयोग : बरखा मोहन

संयोग : बरखा मोहन

कई वर्ष पहले की बात है. मेरे पुत्र की नई-नई शादी हुई थी. पुत्रवधु बरखा एक सप्ताह रहने के लिए अपने मायके गई. जिस दिन वह गई, उसके अगले दिन मैं अपनी एक employee वंदना के साथ घर पर थी. हम दोनों अकेली थीं. घर में सुबह से ही बदबू आ रही थी, जैसे कोई चूहा मर गया हो. वंदना ने भी कहा, 'बहुत बदबू है, शायद चूहा मर गया है.' हम दोनों ने सारे घर का कोना-कोना ढूँढ लिया, कहीं ज़िंदा या मरे, कैसे भी चूहे के दर्शन नहीं हुए. बरखा कुछ भी ढूँढने के मामले में तेज़ है, हमें चीज़ नहीं मिलेगी, उसे मिल जाएगी। सो मैंने वंदना से कहा कि बरखा ही इस मरे हुए चूहे को ढूँढ सकती है, उसे ले आते हैं. और मैं वंदना को लेकर बरखा के मायके पहुँच गई. बरखा की माँ ने कहा, 'अभी कल ही तो आई है, कुछ दिन तो रहने दें, आप आज ही उसे लेने आ गईं.' मैंने सारी बात बताई और बरखा को लेकर घर आ गई. बरखा ने भी घर में घुसते ही कहा, 'हाँ मम्मी, बहुत बदबू है.' उसने भी ढूँढा पर उसे भी कुछ नहीं मिला। हमें समझ नहीं आ रहा था, हम क्या करें? 'चलो, चाय पीते हुए सोचते हैं,' मैंने कहा. बरखा चाय बनाने रसोई में गई, वहाँ उसे ज़्यादा बदबू आई. (मुझे तब तक रसोई में जाने की कोई ज़रूरत नहीं पड़ी थी), उसने गैस जलाने से पहले देखा कि गैस सिलेंडर से चूल्हे तक आने वाली रबड़ की पाइप जगह-जगह से क्रैक हो रही है, जिसमें से छन कर गैस पूरे घर में फैली हुई थी. उसने सिलेंडर की नॉब बंद की (जो हम कभी बंद नहीं करते थे) और उसके थोड़ी देर बाद बदबू आनी बंद हो गई. यह संयोग ही था कि बरखा को फटी हुई पाइप नज़र आ गई और एक हादसा होने से टल गया.

आज भी उस बात को सोचती हूँ तो दहल जाती हूँ कि कहीं बरखा ने गैस जला ली होती और कोई बड़ा हादसा हो जाता, तो बरखा तो जान से जाती ही, मैं भी बच नहीं पाती, आज जेल में होती, बहु को जलाने के आरोप में. एक हफ्ते के लिए मायके में गई बहु को अगले ही दिन ले आना और उसी दिन इस तरह की दुर्घटना हो जाना, आखिर इन सब बातों का यही तो अर्थ निकलता ना? इस संयोग ने भगवान में मेरी आस्था दृढ की.


Saturday, 20 December 2014

16. एक भावचित्र : स्त्री-जीवन

16. एक भावचित्र : स्त्री-जीवन

क्या स्त्री का मूल्य उसके गर्भ-धारण करने की क्षमता के कारण ही है? जब वह गर्भ-धारण के योग्य नहीं रहती तो क्या पुरुष की दृष्टि में उसका मूल्य घट जाता है? माँ बनना स्त्री का भी सौभाग्य है. लेकिन यदि स्त्री अपने यौवन काल में ही माँ बनने की काबलियत न रखे या एक ख़ास उम्र पर पहुँच कर माँ बनने की काबलियत खो दे तो क्या वह पुरुष के प्रेम के योग्य नहीं रहती? क्या स्त्री-पुरुष प्रेम का अर्थ मात्र बच्चे पैदा करना है? क्या स्त्री-पुरुष प्रेम मात्र शारीरिक होता है? क्या केवल स्त्री का शरीर ही पुरुष को आकर्षित करता है? क्या स्त्री-पुरुष के मध्य शारीरिक ऐषणा के सिवा लगाव का अन्य कोई आधार नहीं होता? शरीर है क्या? आज जले, कल राख. आज महके, कल ख़ाक. आज लिखा, कल साफ़. प्रश्न अनेक हैं, अबूझ है, जैसे जीवन अबूझ है, विशेषकर स्त्री का जीवन।


Thursday, 18 December 2014

15. एक भावचित्र : प्रश्नाकुल मन

15. एक भावचित्र : प्रश्नाकुल मन

मन में अनेक प्रश्न उपजते रहते हैं. मन में प्रश्न उठना स्वाभाविक है. मन प्रश्नाकुल न हो तो प्राणी निर्जीव माना जाएगा। ज़िन्दगी में हर 'होना' किसी प्रश्न से जुड़ा है. उत्तर की सार्थकता तभी है जब वह किसी प्रश्न से निकले। यह सम्पूर्ण सृष्टि प्रश्न से निःसृत उत्तर ही तो है. कौन है अपना, कौन पराया? कभी अपना भी पराया लगता है और कभी पराया भी बहुत अपना। यह दुनिया बहुत खूबसूरत है. लोग भले हैं. लेकिन जब तक व्यक्ति 'एक' रहता है, तब तक 'अपना सा' रहता है. वही व्यक्ति जब भीड़ में शामिल हो जाता है तो घिनौना हो जाता है. भीड़ के चरित्र पर विश्वास नहीं किया जा सकता। कहते हैं ना, भीड़ का कोई चेहरा नहीं होता। और जिसका कोई चेहरा नहीं होता, वह अनुत्तरित प्रश्नों से घिरा होता है. 'एक' को तो अपना लें, भीड़ को गले कैसे लगाएँ? उफ़ उफ़ उफ़ !


14. एक भावचित्र : मैं इंसान हूँ

14. एक भावचित्र : मैं इंसान हूँ

मैं चेतन हूँ, मैं चैतन्य से भरपूर हूँ क्योंकि मैं इंसानियत के क़र्ज़ से दबी हुई इंसान हूँ। न मैं अपने अतीत की यातना को विस्मृत कर सकती हूँ, न ही अपने भविष्य की चिन्ता से मुक्त हो सकती हूँ क्योंकि मैं जीती-जागती इंसान हूँ। इंसानी धर्म छोड़ दूँ तो जानवर कहलाउंगी। भूत-भविष्य याद न आएँ तो पागल ही हुई ना? नहीं, नहीं, मुझे अपनी समस्त यातनाओं और चिन्ताओं के साथ जीना है और इंसान बने रहना है। इंसान हूँ, इसीलिए मुझमें इंसानियत है। इंसानियत है, इसीलिए मैं दूसरों के दुःख भी अपनी आँखों से बहा लेती हूँ, दूसरों के कष्ट समेट कर अपने ह्रदय में रख लेती हूँ। ये सब मेरी अपनी यातना के क्षणों में मुझे दिलासा देते हैं कि देखो, तुम अकेली नहीं हो, हम सब तुम्हारे साथ हैं।


Wednesday, 17 December 2014

13. एक भावचित्र : सखी-संवाद

13. एक भावचित्र : सखी-संवाद

मेरी रहस्यमयी सखी, तुम कल्पना की मूर्ति बन कर जिओ, एक रहस्य बनी रहो, तुम्हें समझने की प्रक्रिया में जो आकर्षण है, उस आकर्षण में बड़ा आनंद है. आज के युग में तुम्हारा लेखन छायावादी युग की याद ताज़ा कर जाता है. रहस्यवाद को फिर से जीवित करने जा रही हो तुम. तुम्हारे लेखन में कोई उपदेश नहीं, कोई सन्देश नहीं, फिर भी न जाने क्यों, सूफी संतों की याद दिला जाता है. तुम जोगिया वस्त्र नहीं पहनतीं, फिर भी जोगन हो. तुम रंगों के साथ सन्यासिन हो. लगता है, किसी तो रंग में डूबी हो. तुम्हारा चेहरा स्वच्छ धवल चाँदनी सा, तुम्हारी आँखों में मातृत्व के सपने, तुम्हारी गोद में बच्चों की तड़प, तुम्हारा सम्पूर्ण व्यक्तित्व भारतीयता का प्रतिनिधित्व करता सा. बताओ, तुम कौन हो? क्यों इतने गहरे डूब जाती हो तुम, बहुत गहरे कि वहाँ से तुम बचाव के लिए चिल्लाओ भी तो किसी को तुम्हारी आवाज़ न सुनाई दे? कुछ दबा हुआ है तुम्हारे मन में, कुछ उबल रहा है तुम्हारे भीतर, छुपाए नहीं छुप रहा है जो, तुम उछाल देना चाहती हो उसे सबके बीच. क्या दर्द का कोई गोला है, जिसे भीड़ को सौंप कर तुम मुक्त हो जाओगी? या ख़ुशी का कोई उपहार, जिसे सबसे बाँट कर तुम्हारी ख़ुशी दुगनी हो जाएगी? सखी, कौन से मुहूर्त का इंतज़ार है? थोड़ा करीब आओ, खुलो और अपने बारे में बताओ कि तुम कौन हो? किस देश से आई हो? तुम्हारे मौन ने मुझे आकर्षित किया है, अब तुम्हारी बातों के जादू में से तुम्हें ढूँढ कर लाना चाहती हूँ. शायद तुम्हारी कहानी में कुछ ऐसा हो जो मुझे एक नई कहानी लिखने की प्रेरणा दे.


Tuesday, 16 December 2014

Gazal 43

Gazal 43

शाख से फूल झर रहा है कोई.
यूँ दिल से उतर रहा है कोई.

चैन को ढूँढ रहे थे तो लगा
तकलीफ बन गुज़र रहा है कोई.

सुर और ताल में चतुराई से 
शोक-संगीत भर रहा है कोई।

प्रेम का किस्सा चूर-चूर हुआ
काँच बन कर बिखर रहा है कोई.

जिन यादों में ज़िन्दा रहता था
उन यादों में मर रहा है कोई.

Monday, 15 December 2014

आलोक मिश्र

आलोक मिश्र

फेसबुक से मुझे एक मित्र मिला, आलोक मिश्र। मुझसे लगभग आधी उम्र का है लेकिन उसका मुझसे बातों में इतना दिल मिलता है कि पूरा दिन बतियाता रहे तो न ऊबे, यह उसी ने मुझे बताया। (मैं इतनी बातें किसी से नहीं कर सकती, बीच-बीच में विरक्ति आ घेरती है और बाद में अफ़सोस करती हूँ कि मैं क्यों इतना बोली?) कहता है, उसे दो मित्र बहुत पसंद हैं, "मैम आप और ध्रुव गुप्त सर." वह दो बार मेरे घर ध्रुव गुप्त सर के साथ ही आया और बाद में कुछेक बार अकेला। व्हाट्सऐप पर बहुत बातें करता है. उर्दू शायरी का शौक़ीन है, अपने लिखे और दूसरों के लिखे शेर सुनाता है, बहुत भावुक है, कहीं जैसे डूबा रहता है. अपने परिवार के किस्से सुनाता है, जिनमे से कुछ पर कहानी लिखने का मैंने उससे वादा किया है. कोई एक लड़की कभी अच्छी लगी थी, उसका दुःख भी गाता है. अस्थायी रूप से दिल्ली में कहीं रहता है. आजकल अपना फेसबुक अकाउंट बंद किए हुए है, कहता है, हर तरफ से मन ऊब गया. असल में जब स्वास्थ्य ठीक न हो तो कहाँ कैसे मन लगे?

आलोक कई महीनों से बहुत बीमार चल रहा है, अपने गाँव में इलाज के लिए गया हुआ है. फोन पर और व्हाट्सऐप पर नियमित सम्पर्क बनाए हुए है. उसकी बातचीत में हर बार ध्रुव जी का ज़िक्र भी ज़रूर होता है, जैसे मेरी, उसकी और ध्रुव जी की एक टीम हो.

"ध्रुव सर कैसे हैं? आपकी कभी बात हुई?"

मैं उसे हर बार बताती हूँ, "आलोक, मेरी और ध्रुव जी की कभी बात नहीं होती। बस, एक बार ध्रुव जी ने तुम्हारा हाल पूछा था."

मुद्दे की बात यह कि इन दिनों वह बहुत बीमार है. एक बार बोला, "मैम, मैं बचूँगा नहीं।"

मैंने कहा, "आलोक, जब मैं कैंसर से बच गई, तो तुम इस छोटी-मोटी बीमारी से क्यों नहीं बचोगे? चिन्ता न करो."

(मैंने आज उससे कहा है, अपना फेसबुक खोल लो। शायद खोल ले. आज बताया, उसका स्वास्थ्य बेहतर है.)

बोला, "एक ज्योतिषी ने बताया है कि 2018 में मेरी मृत्यु होगी। वैसे मैं ज्योतिषियों पर ज़्यादा विश्वास नहीं करता।"

"अरे, अभी चार साल पड़े हैं, यह चार साल मज़े में जिओ. मुझे भी ज्योतिषी ने बताया है कि मेरी मृत्यु 2017 में होगी।" मैंने कहा.

तपाक से बोला, "मैम, बस आप अपनी मृत्यु को एक साल और रोक लेना, फिर 2018 में हम दोनों साथ मरेंगे।"

हे भगवान ! मेरा इतना दुलार करने वाला बच्चा-दोस्त मुझे फेसबुक से मिला।

Friday, 12 December 2014

12. एक भावचित्र : एक पैग़ाम, प्रेमी के नाम

12. एक भावचित्र : एक पैग़ाम, प्रेमी के नाम

मेरे प्रेमी ! तुम मेरे जीवन में मुझसे प्रेम करने नहीं आए थे. तुमने प्रेम किया ज़रूर था लेकिन वह तुम्हारा ध्येय नहीं था. तुम्हें खुद नहीं मालूम था कि तुम्हारा ध्येय क्या था. बस, जैसे तुम आँख मूँद कर चल रहे थे, और मैं आँख मूँद कर तुम्हें स्वीकार रही थी. सच तो यह है कि तुम प्रेम के बहाने मुझे इस संसार की रीत समझाने आए थे, मुझे मुझसे जुड़े अन्य रिश्तों की असलियत बताने आए थे, मुझे दुनियादारी का भान कराने आए थे. तुमसे मिलने के बाद यानि तुमसे मिल कर बिछड़ जाने के बाद मैं तुमसे पुनः-पुनः मिलने के लिए तो तड़पी ही, लेकिन उससे भी ज़्यादा तड़पी कुछ सत्यों के उन रहस्योद्घाटन पर जो तुम्हारे आने के कारण खुले। मेरे प्रेमी ! मेरे जीवन में तुम्हारा प्रवेश बिना किसी मकसद के नहीं था. मकसद भी सिर्फ इतना मकसद नहीं था कि तुम्हारी प्रेरणा से मैं सृष्टि को रच लूँ या मेरी प्रेरणा से तुम किसी सृष्टि की रचना कर लो. नियति ने एक बड़े मकसद से तुम्हें मेरे पास भेजा था. मैं अँधेरों में जी रही थी, अँधेरों को प्रकाश समझती थी, स्वाभिमान में चूर रहती थी, अहम् ब्रह्मोsस्मि का मन्त्र मेरी रग-रग में बसा हुआ था, मुझे कोई हरा नहीं सकता, मुझे कोई मार नहीं सकता, मैं अजेय हूँ, मैं प्रश्नातीत हूँ, मैं सुंदर हूँ, मैं श्लील हूँ, मैं 'मैं' हूँ, क्योंकि मेरे समस्त अपने मेरे साथ हैं. मुझे अपने से ज़्यादा अभिमान था मेरे अपनों पर. लेकिन तुम आए तो मेरे सारे अपनों के चेहरों से मुखौटे उतर गए. जब तुम मेरे जीवन से गए तो तुम भी एक मुखौटा मेरे पास छोड़ गए. लेकिन यह भी सच है कि यदि तुम मेरे जीवन में नहीं आते तो मैं बहुत कुछ जानने से वंचित रह जाती। मैं नहीं जान पाती कि ह्रदय के कितने तल-अतल होते हैं, जिनमे छिप कर रहते हैं कोमल भाव, अतृप्त इच्छाएँ, फुंकारती हुई वासनाएँ, जिन्हें हम उम्र के साथ मरा समझ लेते हैं. मैं नहीं जान पाती कि रिश्तों में कितने छल-छद्म होते हैं. मेरे प्रेमी ! तुम धन्य हो, तुम जीवन में मेरे सबसे बड़े शिक्षक रहे.


Monday, 8 December 2014

मोहातीत

मोहातीत

वैरागी होना आसान है क्या? वैराग की राह में राग ही रोड़े नहीं अटकाता, जीवन के कड़वे यथार्थ भी अकेलेपन में खरोंचते रहते हैं. राग से मुक्ति संभव है, लेकिन जीवन की कड़वी सचाइयों को बर्दाश्त करने के लिए खुद को भीड़ में झोंक देना ही एकमात्र उपाय हो सकता है. काश, अपने आप में जीना फिर से सीख पाती, जैसे पहले तेरह साल एकांतमना रही? लेकिन वह एकान्तवास भी वर्षों के मानसिक ऊहापोह के बाद आया था, जिसमें भीतर कितना कुछ खंडित हुआ था, जो चाहे बाद में असीम तृप्ति में बदल गया था, लेकिन एक त्रासदी से गुजरने के बाद. वह बीच के खंडन का समय, उफ़, उस तकलीफ से दोबारा कैसे गुज़रूँ? कहीं और से घटने के लिए, फिर से जोड़ रही हूँ खुद को आप सबसे, आप सबके बहाने खुद खुश रहने के लिए. दो दिन के अथाह मंथन के दौरान मैंने पाया कि फेसबुक जैसा आश्रय अन्य कोई नहीं। दो दिन का अकेलापन सहा नहीं गया? नहीं, यह बात नहीं, अभिव्यक्ति का भी शौक नही, बस, खुद को व्यस्त रखने के लिए अभिव्यक्त होना है. ज़िंदा रहने से बड़ा अन्य कोई स्वार्थ नहीं। लीजिए, मैं फिर हाज़िर हूँ, अपनी गर्मागर्म प्रस्तुतियों के साथ।

ऐसा बदनसीब कौन होगा जिसे अपनापन नहीं चाहिए? ऐसी बदनसीब मैं हूँ। हर बार अपनापन मिल-मिल कर छिटकता रहा, इसलिए एकांत में जीने की आदत हो गई है। मित्रों, यह अच्छा है कि यह आभासी दुनिया है, यहाँ रिश्ते निभाने की कोई मजबूरी नहीं है. मेरे लिए यह बात सुविधाजनक है क्योंकि मैं निरन्तरता में कोई भी मित्रता निभाने में नाकाबिल हूँ. बहुत अधिक चिपका-चिपकी मुझमें उदासीनता भर देती है। मैं फेसबुक से ऊबी ही इसलिए थी कि कई मित्र (स्त्री हो या पुरुष) मुझसे मित्रता में नैरन्तर्य चाहते थे, यानि मैसेज में जो बात हमने कल जहाँ छोड़ी थी, आज वहीँ से शुरू करें तथा रोज़ नमस्ते, कैसी हैं, खाना खाया? हमने आज यह किया, वह किया, मैंने यह प्यार किया, वह लड़ाई की, रोज़ एक बार बात ज़रूर कर लिया करें मैम, हमें शक्ति मिलती है, आदि आदि. दोस्तों, मैं कितनों से बात करूँ? मेरी क्षमता का भी तो ख्याल करो. आप मुझे इस मामले में बदनसीब कह सकते हैं कि मुझे यहाँ किसी के अत्यधिक अपनेपन की चाह नहीं है. मेरे तईं अपनेपन की बस यह परिभाषा है कि हम एक-दूसरे के प्रति ईमानदार रहें, आप मेरी इज़्ज़त करें, मैं आपकी इज़्ज़त करूँ, न आप मेरी बुराई करें, न मैं आपकी बुराई करूँ और हम सब विचारों में कहीं थोड़ा तो मेल खाते हों. हम यहाँ इसीलिए मित्र हैं कि हम एक-दूसरे के लेखन में, पाठन में रुचि रखते हैं, बस. मित्रों, कमी आप में नहीं, कमी मुझ में है कि बहुत ज़्यादा मीठे से मुझे उबकाई आ जाती है. इस कमी के बावजूद मैं लिहाज-लिहाज में बहुत दूर तक, ऊबने की हद तक निभाए चली जाती हूँ और इस कारण के कारण मुश्किल से अमित्र कर पाती हूँ। इसका अर्थ यह नहीं कि मुझे मित्रों की ज़रूरत नहीं है. आखिर मैं भी इंसान हूँ, मुझे भी सबसे हँसना-बोलना अच्छा लगता है, मैं मैसेज में बात भी करती हूँ, लेकिन जिसे कहते हैं ना स्पेस, यानि निजता, वह बरकरार रहनी चाहिए, उसे कोई न छेड़े। जिन्हें प्यार की जरूरत है, उन्हें प्यार दो, जो प्यार नहीं चाहता, उसे उसके हाल पर छोड़ दो. दोस्ती की रस्सी को बहुत ज़्यादा कसोगे तो टूट जाएगी।

Saturday, 6 December 2014

11. एक भावचित्र : प्रभु की माया

11. एक भावचित्र : प्रभु की माया

कई बार जब लगने लगता है कि बहुत सुखी हूँ, बहुत खुश हूँ, तो भगवान फिर से रोने के इंतज़ाम कर देता है. पता नहीं, उसे अपने ही बनाए हुए बन्दों के रोते हुए चेहरे क्यों अच्छे लगते हैं? वैसे यह सही है कि यह दुनिया ज़्यादातर रोते हुए लोगों की है. प्रभु की माया, उसे इंसान का हँसता हुआ चेहरा कभी रास नहीं आया. उसके पास बारिशों की कमी थी क्या जो उसने लोगों की आँखों से आँसुओं की झड़ी लगा दी? फूलों कर साथ काँटे बना कर उसे तसल्ली नहीं हुई जो उसने इंसान के जीवन में भी काँटे उगा दिए? 'जंगल में मंगल' की कहावत हमने गढ़ी, लेकिन वह दिलों की बसी-बसाई दुनियाओं को जंगल में तब्दील करने में कोई कसर नहीं छोड़ता। क्या वह इतना बेअकल है कि उसने अपनी ही बनाई दुनिया को दुखों की आग में झोंक दिया? कुछ तो है, कुछ तो है, वह कुछ तो फ़ितूरी है, जिसके सारे किए-धरे को हम अपने कर्मों का फल मान कर उसे माफ़ करते आए हैं. और कोई चारा भी तो नहीं। वह दिखे तो उसे उसके किए की कोई सजा दें. पर वह दिखता ही तो नहीं।

वह भी एक समय था, जब मैं सुखी थी, बहुत सुखी। खुश थी, बहुत खुश. तब तक के सारे ग़म झेले जा चुके थे, बुरे दिन भूले जा चुके थे, सारे आँसू सोखे जा चुके थे. और मैं अपने भाग्य पर इतरा रही थी कि ओह, ऐसा सुन्दर भाग्य भी होता होगा क्या किसी का, जैसा मेरा है? नहीं, किसी का नहीं, सिर्फ मेरा। कि भगवान से देखा नहीं गया. उसने मेरे रोने के लिए इतना अनोखा बहाना ऊपर से टपकाया कि मैं दंग रह गई. रेशम में लपेट कर पत्थर मारा, इतने ज़ोर से कि मैं लहू-लुहान हो गई. चोट सहलाने वाला कोई नहीं और रो-रो कर मेरा बुरा हाल. इन आँसुओं की ज़ुबान किसी ने नहीं समझी। उसकी व्यवस्था तो देखो, दुखों को चीर कर ख़ुशी देता है और खुशियों को चीर कर दुःख।

अब फिर से सुखी हूँ, खुश हूँ. आँसुओं में धुल कर, दुखों की आग में तप कर निखर गई हूँ. पर डर रही हूँ, एक तरह से प्रतीक्षा कर रही हूँ कि अब प्रभु कौन सा कहर ढाने वाले हैं? अब कौन सी ख़ुशी को ऊपर से टपकाने वाले हैं, जो अंततः आँसुओं का सबब बनेगी?


Tuesday, 2 December 2014

10. एक भावचित्र : माँ

10. एक भावचित्र : माँ

माँ, तू उदास मत हो. तेरे अपने बच्चों ने तुझे तेरा देय नहीं दिया, कोई बात नहीं। चारों तरफ देख, बच्चे ही बच्चे हैं. अनेक बच्चे, जिनके माँ-पिता ने उनका देय नहीं दिया। कहीं का बदला कहीं निकलता है. सारी दुनिया एक है, यह विश्व एक कुटुंब के समान है, वसुधैव कुटुम्बकम। कई बार करता कोई और है, भोगता कोई और है. सब भोगने वाले एक हो जाएँगे तो सब करने वालों को निष्क्रिय कर देंगे। माँ, देख, कितने बच्चे एक गोद के लिए तरस रहे हैं, आ और उन्हें अपना, खुद भी पूर्ण हो और उन्हें भी पूर्ण कर.


Monday, 1 December 2014

9. एक भावचित्र : शुद्ध आत्मा

9. एक भावचित्र : शुद्ध आत्मा

आज वह बीते हुए कल के शव पर खड़ा है. एक विचित्र दुर्योग के चक्रव्यूह में फँसा है. मर्सिया की धुन में अगीत बज रहे हैं. मन पर ग्रंथियों का पहरा है. देह पर सन्देह का दबाव है. खुशियों की राह रोके हुए है भ्रम-सम्भ्रम. शक का फ़ितूर साँसों में घुला है. पाप से अधिक सन्ताप का बोझ है. उसने अपने जीने के रास्ते खुद बंद कर दिए हैं.

मैं खुद व्यामोह की स्थिति में हूँ. मुझसे डरो नहीं, मेरे पास आओ. मैं एक शुद्ध आत्मा हूँ. मुझे छूकर तुम भी शुद्ध हो जाओगे। मुझमें से निकलने वाली तरंगें तुम तक पहुँचनी चाहिए।

अब न किसी से कहिएगा, दावाए इश्क है गलत.
हमने तुम्हारे इश्क में मर के तुम्हें दिखा दिया।


Sunday, 30 November 2014

8. एक भावचित्र : यात्रा

8. एक भावचित्र : यात्रा

क्यों लग रहा था कि यात्रा खत्म हो गई? नहीं, यात्रा अभी ख़त्म नहीं हुई, यात्रा अभी शेष है. जैसे नया सफर आज ही शुरू हुआ है. एक गंध भरी शाखा झूल रही है, जिस पर अपना बसेरा होगा। निर्गन्ध से निकल कर गंध भरी शाख पर. ज़िन्दगी जैसे मर कर फिर से जाग उठी है. जीना कैसे मुश्किल-मुश्किल हो रहा था? पर अब मरने का समय आएगा तो मरने को जी नहीं चाहेगा। कहाँ तो सम्बन्ध एक-एक कर भुरभुरा गए थे, कहाँ ये नए द्वार खुल रहे हैं. संबंधों के भुरभुराने के साथ क्यों लगता था कि यह दुनिया जीने के काबिल नहीं है, सब छोड़-छाड़ कर कहीं भाग जाएँ? सब तज देने का भाव लिए जो अंतर-आत्माएँ थीं, आज इधर-उधर मोह में डूब रही हैं. कहाँ जाकर छुप गया अतीत? मर गया तो उसका शव तक नज़र नहीं आ रहा. रोशनी की एक किरण के लिए जो तरसते थे, आज उनके आसपास उजाले ही उजाले हैं. मन की कमज़ोरियाँ मज़बूती में बदल रही हैं. चलो, एक नई यात्रा पर चलें। जीत प्रतीक्षा कर रही है.


Friday, 28 November 2014

एक थी सीता

एक थी सीता

समय-समय पर मेरी दुकान पर काम करने वाली लड़कियों में कई सच में बहुत समझदार, सलीकापसंद और सुचारूरूप से घर-गृहस्थी चलाने वाली थीं, लेकिन उनके माता-पिता की दयनीय पारिवारिक स्थिति, कमज़ोर आर्थिक बैकग्राउंड के कारण उनके विवाह ऐसी जगह हुए कि उन्हें उम्र भर खपना पड़ा.

उम्र भर तो खैर हम भी खप रहे हैं लेकिन अपनी इच्छा से किए गए काम और मजबूरी के किए गए काम के तनाव और तसल्ली में अंतर होता है.
सीता मेरे घर में सारा घरेलु काम करती है. कल मैं रसोई में गई तो उसे भिन्डी का ढेर काटते हुए देख कर मैंने कहा, 'यार, इतनी सारी भिन्डी क्यों काट रही हो?' वह तुरंत बोली, 'यार, भिन्डी आए कई दिन हो गए, फ्रिज में पड़े-पड़े खराब हो जाएगी।' मैं कुछ सोच पाती, कह पाती, इससे पहले ही वह बोली, 'सॉरी मैम, सॉरी।' 'सुधर जा, सीता,' मैंने कहा, साथ ही यह कहने वाली थी कि 'अपनी औकात में रह' कि तभी मुझे कुछ दिन पूर्व फेसबुक पर हुई 'औकात' शब्द की छीछालेदर याद आ गई.

लगभग एक साल पहले सीता (नकली नाम) मेरे बुटीक में नौकरी के लिए आई थी. मेरे यहाँ स्टाफ़ पूरा था. मुझे ज़रूरत नहीं थी. मैंने मना कर दिया। दो दिन बाद फिर आई, बोली, 'प्लीज़, मुझे नौकरी की बहुत ज़रूरत है.' कुछ उसके सितारे मुझसे टकराए। वह कहते हैं ना, कई लोगों को देखते ही लगता है कि वे हमसे जुड़ने लायक हैं, मैंने सोचा, मुझे बहुत इधर-उधर जाना पड़ता है, इसे अपने साथ ले जाया करूँगी। एक सहारा रहेगा। मैंने कहा, 'ठीक है, तुम्हारा काम सिर्फ मेरे साथ कार में घूमना होगा। समय सुबह दस बजे से शाम सात बजे तक. हर रविवार छुट्टी। तनख्वाह पाँच हज़ार, वह भी समझो, फ़ालतू खर्च करूँगी क्योंकि मुझे जरूरत नहीं है.' और उसकी नौकरी शुरू हो गई.
मैं दूसरे दिन उसे साथ लेकर चाँदनी चौक गई. बीच रास्ते में घबरा कर बोली, 'रोकिए, रोकिए, जल्दी।' मैंने कार रोकी, कार को अनलॉक किया। उसने अपनी तरफ का दरवाज़ा खोल कर बाहर सड़क पर औक औक उलटी कर दी. किसी तरह रुकते-रुकाते हम वापस नॉएडा पहुँचे।
अगले दिन फिर मैंने उसे कार में बैठने के लिए कहा, मुझे लाजपत नगर जाना था. वह बोली, 'मैम, क्यों ना हम बस में चलें? मुझे कार में उलटी आती है.' मुझे यह कहावत याद आई, नरक का कीड़ा नरक में खुश. मैंने कहा, 'सीता, मैंने ज़रूरत न होते हुए भी तुम्हें काम पर रखा. तुम्हें काम करना है तो अपनी कोई तो उपयोगिता सिद्ध करो.' बोली, 'मैम मैं आपके बुटीक में तुरपाई का काम कर सकती हूँ, साड़ी में फॉल लगा सकती हूँ.' 'पर उसके लिए तो लोग हैं,' मैंने कहा और उसे लेकर दुकान से घर आ गई. घर आकर मैंने उससे पूछा, 'चाय बनानी आती है?' उसने खुश हो कर चाय बनाई, ढाबा टाइप, कम पत्ती को कढ़ा-कढ़ा कर ज़्यादा दूध की. हमें लाइट चाय पीने की आदत थी, फिर भी अच्छी लगी. अगले दिन बोली, 'मैम, मैं आपके घर खाना बनाने का काम कर सकती हूँ.' हमारी खाना बनाने वाली उन्हीं दिनों गाँव गई थी. घर का अन्य पूरा काम करने के लिए एक काम वाली थी जो संयोग से उस दिन छुट्टी पर थी. सीता ने खाना बनाया, बेहद स्वाद। बरखा और बच्चों को भी वह पसंद आई क्योंकि वह गुड लुकिंग, अच्छे कपड़े, साफ़-सुथरी, बोलने में ठीक-ठाक थी. गाँव की है पर लगती नहीं, शान से कहती है, 'मैं दसवीं पास हूँ.'
फिर कुछ दिन बाद बोली, 'मैम, पाँच हज़ार में मेरा पूरा नहीं पड़ता। मैं आपके घर का सारा काम करूँ तो? आप दूसरी कामवाली को हटा कर उसकी तनख्वाह मुझे दे दें.' वैसे उसका पति ठीक-ठाक कमा लेता था, तीन बच्चे थे. सीता की उम्र इतनी अधिक नहीं थी, उसने बताया था, अट्ठाइस साल. सीता अच्छे घर की थी, अच्छे कपड़े पहनती थी, अपने हिसाब से सज कर रहती थी, दसवीं पास थी, और उसने गुरूर के साथ बताया था कि 'मैं ब्राह्मण हूँ, सीता शर्मा।' मैंने पूछा, 'तुम बर्तन माँजना, झाड़ू पोछा, कपड़े धोना, ये सब कैसे करोगी?' वह बोली, 'अपने घर में नहीं करती क्या? यह भी तो मेरे घर जैसा है. और फिर तनख्वाह भी तो बढ़ेगी।' मैंने दूसरी कामवाली से पूछा, उसे काम छोड़ने में कोई ऐतराज़ नहीं था. और सीता ने हमारा पूरा घर सँभाल लिया। हमारे घर में सब आलसी। कोई हिलना न चाहे। खाने की थालियाँ सब के पलँग पर पहुँचने लगीं। डायनिंग टेबल बच्चों की किताबों से भरी रहने लगी. घर का हर सदस्य सीधा उसी से कहने लगा, कब क्या चाहिए। वह सबके लिए तैयार। यहाँ तक कि हमारी अलमारियाँ, कबर्ड में कपड़े सलीके से रखने की ज़िम्मेदारी भी उसी की. भई, बहुत काबिल लड़की है. हम सबने एक सुर में कहा और चैन की साँस ली.

कुछ-कुछ दिन बाद याद दिलाती रहती थी, 'मैम, मैं ज़रूरत की वजह से नौकरी कर रही हूँ, मेरे घर का कभी कोई आ जाए तो कहना नहीं कि मैं यह काम कर रही हूँ, कहना कि मैं आपकी दुकान में नौकरी करती हूँ.' साथ ही यह कहना भी ज़रूरी समझती है, 'मैं दसवीं पास हूँ, मैम, मैं ब्राह्मण हूँ. मेरा पूरा नाम सीता शर्मा है.' मैं उसकी इस बात का जवाब देती, 'ठीक है, तुम ऊँची जात की हो, तुम ब्राह्मण हो. पर बार-बार यह बात क्यों बताती हो? हमारे साथ हमारे पलंग पर बैठती हो, कुर्सी पर बैठती हो, डाइनिंग टेबल पर खाना खाती हो. सबसे बड़ी बात यह कि हम सब अब तुम्हारे काम के मोहताज हैं.'
तीन महीने काम करने के बाद बोली, 'मैम, मेरी तनख्वाह कम है.'
मैंने पूछा, 'कितनी होनी चाहिए?'
'कम से कम पंद्रह हज़ार तो हो.'
'सपनों में मत जी लड़की, काम करेगी बर्तन माँजने का और तनख्वाह चाहिए दफ्तरों वाली? कहीं यह न हो कि ज़्यादा पाने की ख्वाहिश में जो मिल रहा है, वह भी छिन जाए? कहीं और इससे ज़्यादा तनख्वाह मिले तो चली जाना।'
बीच-बीच में नखरा दिखाएगी, 'बस, मैं छोड़ दूँगी।' मैं कहूँगी, 'देख, न तूने हमें छोड़ना, न हमने तुझे छोड़ना, इसलिए अपना बोलने का शौक यूँ न पूरा किया कर.'
लाड़ भी कम नहीं करती. मेरी माँ की तरह आकर मुझसे बोलेगी, 'चाय पड़ी-पड़ी ठंडी हो जाती है और आपको पीना ध्यान ही नहीं रहता। इस मरे कम्प्यूटर को फ़ेंक दूँगी एक दिन.'
एक दिन बोली, 'मैम, मैं यहाँ बहुत खुश हूँ.'
खुश क्यों न होगी बेटा, हमारे साथ हमारे बराबर सोफे पर बैठती है, मेज़ पर खाना खाती है, अकेला बाथरूम मिला हुआ है, नीचे वाले खन पर (मंज़िल पर) तेरा एकछत्र राज्य है, कोई कुछ कहने-पूछने वाला नहीं, मज़े कर. मैंने सोचा।
वह बोली, 'यहाँ आकर समझो, मुझे अपने आदमी से छुटकारा मिल गया.'
'वह कैसे?' मैंने पूछा।
'उसकी रात की ड्यूटी होती है, दिन में घर में रहता है. हर समय आदमी सामने रहे, मुझे अच्छा नहीं लगता.'
मैंने आगे कुछ नहीं कहा. हमें अपने काम से काम, क्या करना है किसी में घुस कर.
उसे सिरदर्द की अक्सर शिकायत रहती। माथे पर कपड़ा बाँध कर काम में लगी रहती। रोज़ हमसे सिरदर्द की गोली माँग कर खा लेती। मैं कहती, 'ऐसा कैसे चलेगा, सीता?' वह कहती, 'मैंने गाँव में डॉक्टरों को दिखाया पर ठीक ही नहीं होता। मैं अपने घर में भी ऐसे ही काम करती हूँ, आप मुझे इस वजह से हटा न देना।'
मैंने बॉबी से कहा, इसे किसी अच्छे डॉक्टर को दिखा दो. बरखा ने डॉक्टर से अगले दिन मिलने का समय लिया। उसके घर जाने के बाद हमें याद आया कि पहले वाले डॉक्टरों के यदि कोई पर्चे हों तो कल आते हुए ले आए. मैंने उसे फ़ोन किया। पहले एक लड़के ने उठाया, बात के अंदाज़ से बड़ा उजड्ड लगा. उसे मेरी बात समझ नहीं आई. उसने फोन एक अन्य लड़के को दिया, वह पढ़ा-लिखा लगा, सभ्य तरीके से बोला, 'आपके यहाँ आने के लिए तैयार हो रही हैं.' मैंने उसे सन्देश दिया कि डॉक्टर के पर्चे, यदि कोई हों तो. ले आए.
उसके आने पर मैंने पूछा, 'यह जो पहले बोला, बड़ा उजड्ड सा था और दूसरा पढ़ा लिखा लगा, इनमे तेरा पति कौन सा है?'
'मैम, जो उजड्ड लगा, वह मेरा पति था. दूसरा पढ़ा-लिखा मेरा देवर था, जिसके बारे में मैंने आपको बताया था ना कि उसने पॉलिटेक्निक से इंजीनियरिंग की है, नौकरी ढूँढने के लिए आया हुआ है. देवरानी भी आई हुई है.'
'अच्छा, अच्छा……'
'मैम, देवर को मेरे काम के बारे में बताया तो नहीं? मैंने सबसे कहा हुआ है कि दुकान में नौकरी करती हूँ वरना सब मेरी खिल्ली उड़ाएँगे।
'नहीं।'
'मैम, मेरे नसीब में भगवान ने उजड्ड ही लिखा था. बोलेगा तो हबड़-हबड़, खाएगा तो चपड़-चपड़, चलेगा तो लपड़-लपड़.'
'कमाल है सीता, तू तो कविता करने लगी.'
'आपके साथ रह कर कविता भी सीख जाऊँगी।'
'पति के बारे में ऐसे नहीं कहते।'
'पति जैसा पति तो हो, मैम. आप ही बताओ, कैसे छुटकारा पाऊँ?'
'एक तो तू तीन बच्चे पैदा करके बैठी है. खैर, यह बता, क्या शराब में पैसा उड़ाता है?'
'नहीं, ऐसा कोई ऐब नहीं है उसमें।'
'क्या तुझे मारता-पीटता है?'
'अजी, हाथ तो लगा कर देखे।'
'क्या तुझे नौकरी करने से मना करता है?'
'नहीं, इससे तो वह खुश है कि घर में पैसे आ रहे हैं. बल्कि रात की ड्यूटी होने से अच्छा है कि दिन में बच्चों को देख लेता है.'
'तो तेरी समस्या क्या है? आराम से रहती रह.'
'मैम, मुझे उसका हबड़, चपड़, लपड़ नहीं पसंद आता.'
'ओह्हो सीता, तू हूर की परी है क्या? किसी राजा-महाराजा के खानदान में पैदा हुई है? तेरे इतने नखरे क्यों हैं?'
मैंने उसे डाँट के चुप कर दिया लेकिन जब भी मौका मिलता है, उसका पति-पुराण शुरू हो जाता है. वैसे हँसती बोलती रहती है, सिर का दर्द धीरे-धीरे ठीक हो रहा है, डॉक्टर के कहने से चश्मा लग गया है. और सबसे बड़ी बात, हम सब उसके भरोसे हैं. जिस दिन वह छुट्टी करती है, खाना बाज़ार से आता है. वह कहावत है ना, तू भी रानी, मैं भी रानी, कौन भरे कूए से पानी? कौन जाने, कभी पंद्रह हज़ार पर अड़ ही जाए तो मेरे पुत्र और पुत्रवधु ने यही कहना है, 'मम्मी, दे दो, रुपये तो हम फिर कमा लेंगे, पर ऐसी कामवाली दूसरी नहीं मिलेगी।' मेरे पुत्र का तो, खैर, यह स्लोगन है, 'कीमत काम का नहीं, कम्फर्ट की होती है.' काम करने वाले अगर चोरी भी करें (यह लड़की तो खैर ऐसी नहीं है), तो पुत्र का कहना होता है, 'थोड़ी बहुत चोरियाँ तो इनकी तनख्वाह में शामिल समझो। बर्दाश्त करो.'
जय हो मेरे घर के निकम्मों की.

7. एक भावचित्र : वर्जित फल

7. एक भावचित्र : वर्जित फल

मैंने वर्जित फल को चखा.

मैं बरसों से भूखी-प्यासी अन्जान रास्ते पर चली जा रही थी. रास्ते में उत्सव थे. उत्सव में नाच-गाने थे. नाच-गानों में हँसी-ठहाके थे. हँसी-ठहाकों में मनोरंजन था. मनोरंजन में दावतें थीं. दावतों में राज-भोग और मदमस्त करने वाले पेय थे. राज-भोग छत्तीस प्रकार के थे. छत्तीस के छत्तीस प्रकार मुझे बेस्वाद लगे. कोई भी पेय मेरे मन में मादकता नहीं भर सका. मैं भूखी की भूखी रही. प्यासी की प्यासी रही. मैं जंगलों में निकल गई. मैं जंगलों में रहने लगी  मैं थक कर निढाल हो गई. मेरा गोरा रंग खुले आसमान के नीचे उमड़ रही धूप में जल कर काला पड़ गया. सर्दी, गर्मी, बरसात के थपेड़ों ने मेरे शरीर को कुम्हला दिया। मैं मरने-मरने को हो गई. मैं मानों मर ही गई. मैं जीते जी लाश हो गई.

यह क्या? जंगल में एक और लाश पड़ी थी. अचानक मैंने महसूस किया, वह लाश सरकते-सरकते मुझ तक आ गई. मैं भी सरकते-सरकते उस लाश के पास गई. मंत्रबिद्ध-सा मेरा हाथ उस लाश के हाथ में था. ठंडा शिथिल हाथ. दोनों का. उस लाश ने मुझे अपना ह्रदय निकाल कर दिया। मैंने भी उसकी देखा-देखी अपना ह्रदय निकाल कर उसे दिया। उसने अपने ठंडे होंठ मेरे माथे पर रखे. मैंने भी अपने ठंडे होंठ उसके माथे पर रखे. और दोनों लाशें गर्म होने लगीं। दोनों लाशों में जान पड़ने लगी. दोनों लाशें ज़िंदा होने लगीं, दोनों लाशें ज़िंदा हो गईं. और एक खूबसूरत प्रेमी युगल में अवतरित हुईं।

उसने वर्जित फल मुझे खाने के लिए दिया। मैंने वर्जित फल को चखा. वह मेरा हो गया. मैं उसकी हो गई.

अब हमारे वारिस होंगे, अनेक वारिस, जो प्रेम की परंपरा को आगे बढ़ाएँगे, हमारे प्रेम की कहानी युगों तक गाएँगे।

ये जो सामने दीवार पर दो प्रतिबिम्ब दिख रहे हैं, एक उसका प्रतिबिम्ब है, एक मेरा प्रतिबिम्ब है.


Wednesday, 26 November 2014

6. एक भावचित्र : मित्रता

6. एक भावचित्र : मित्रता

मित्रता के लिए भी सक्षम, समर्थ और लायक होना पड़ता है.

मैं बहुत बुरी हूँ, फिर भी आप मुझसे मित्रता बनाए रखना चाहते हैं, मेरे मित्र बने रहना अफोर्ड करते हैं, इसमें मेरी कोई खासियत नहीं, खासियत आपकी है क्योंकि आप बुरों के साथ निभाने में सक्षम हैं.

मैं आपके लिए घातक हो सकती हूँ, यह जानते हुए भी आप मेरे मित्र बने रहना चाहते हैं, यानि आप घातक लोगों से अपना बचाव करने में समर्थ हैं.

मैं आपके लिए हर दृष्टिकोण से गलत हूँ, फिर भी आप मुझे सुधारना चाहते हैं, क्योंकि आप लोगों को अपने तरीकों में ढाल कर अपने साथ जोड़े रखने के इच्छुक हैं.

आप मुझे नाकाबिल समझते हैं, फिर भी मुझे छोड़ना नहीं चाहते, क्योंकि आप मानते हैं कि जो एक बार आपके कबीले में आ गया, वह ताउम्र आपकी कैद में रहेगा। आप चाहे उसका खून पिएँ, वह उसे भी अपना अहोभाग्य समझेगा।

तो मित्रता के लिए मैं नहीं, आप सक्षम हैं, समर्थ हैं, काबिल हैं.

हरेक के बस की नहीं है दोस्ती। प्रेम से मुश्किल होती है दोस्ती। दोस्ती में भी वफ़ा और ईमानदारी की ज़रूरत होती है. दोस्ती के लिए पहले लायक बनना पड़ता है. कोई नालायक क्या दोस्ती करेगा?


Tuesday, 25 November 2014

5. एक भावचित्र : आर्तनाद

5. एक भावचित्र : आर्तनाद

मन प्रश्नाकुल है. प्रश्न अनंत हैं, उत्तर एक नहीं। उत्तर ही प्रश्न की नियति है. प्रश्न निःशब्द हो जाता है उत्तर पाकर, अन्यथा रेंगता रहता है मानसिक शिराओं में, खोखला करता रहता है खुशियों को, दिन प्रति दिन.

वह मुझ तक आया छुप कर, अपने को छुपाता हुआ. मैं उस तक गई छुप कर, अपने को छुपाती हुई. वह राजा नहीं, रंक था, मेरे जीने का एक अलग ही ढंग था. मैंने उसकी बेचारगी को सर-माथे लिया, उसके हर दुःख को अपना बना कर जिया। वह सच नहीं, सपना था. साकार नहीं, निराकार था. वह सपना बन कर बहा मेरी शिराओं में. वह निराकार होकर पल-पल रहा मेरे साथ. कितनी अजीब बात.

न वह मुझसे प्यार करता है, न मुझे अपने से करने देता है. न वह मुझसे मिलना चाहता है, न मुझे अपने से मिलने देना चाहता है. न वह मुझसे कुछ कहना चाहता है, न मेरा कुछ सुनना चाहता है. न वह मुझसे कुछ लेना चाहता है, न मुझे कुछ देना चाहता है. फिर भी न वह मुझे छोड़ना चाहता है, न मुझे अपने को छोड़ने देना चाहता है. रखना चाहता है अपने साथ. कितनी अजीब बात? कहता है, 'मेरे कबीले में जो एक बार आ जाता है, मैं उसे कभी अपने से दूर नहीं जाने देता। तू मेरे कबीले में है, इसलिए रहेगी हमेशा मेरे साथ.' कितनी अजीब बात. यह साथ होना भी कोई साथ होना हुआ?

मैं उसे बुलाती हूँ, वह आता नहीं, आ ही नहीं सकता। मैं उससे कहती हूँ, 'आजा. सारी सलाखें तोड़ कर आजा. बस, एक बार आजा. मैं सूख कर लकड़ी हो गई हूँ, मेरी आँखों की रोशनी कम हो गई है, मेरे बाल झड़ गए हैं, मेरा शरीर मुरझा गया है, मेरे अंगों में काँटे उग आए हैं, मैं मैं नहीं रही, सूखा हुआ वृक्ष हो गई हूँ, जिसमे अब कोई फूल-पत्ता नहीं उगेगा।' पर उसे कुछ नहीं सुनाई देता। जैसे उसकी श्रवण शक्ति क्षीण हो गई हो, जैसे मौन उसकी धमनियों में जम गया हो, जैसे शब्दों से उसका बैर हो गया हो. उस तक मेरी कोई आवाज़ नहीं पहुँचती। चीख रहा है मेरा आर्तनाद। सच, कितनी अजीब बात.

उसकी नादानियों का मैं प्रायश्चित करूँगी। अब मैं कविता को कविता में नहीं, गद्य में लिखूँगी।
(मणिका मोहिनी) चित्र नायिका / शेफाली के सौजन्य से


स्मृति ईरानी

स्मृति ईरानी

कई लोग भाग्य को नहीं मानते। हर अप्रत्याशित होने वाले काम को संयोग की संज्ञा दे देते हैं. लेकिन भाग्य होता है, इसे अनेक व्यक्तियों के जीवन में देखा जा सकता है. मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी के बारे में मैंने पहले लिखा था कि वे बहुत कम शिक्षा पाकर भी इतने उच्च पद पर पहुँची, यह उनके भाग्य का ही कमाल था. स्मृति ईरानी 'सास भी कभी बहु थी' धारावाहिक से प्रकाश में आईं, परदे पर उनका सकारात्मक चरित्र हमारे दिलों में उनकी प्रशंसनीय स्वच्छ छवि बना गया. अपनी अभिनय कला प्रदर्शन के दौरान उन्होंने एक साक्षात्कार में बताया था कि जब वे टीनेजर (किशोरी) थीं, तब वे घर से भाग गई थीं (अब पता नहीं, वे इस बात को स्वीकार करेंगी या नहीं?). बहरहाल, उन्होंने अपने से बहुत बड़ी उम्र के, तलाकशुदा एक पारसी व्यक्ति से शादी की, जिसकी तलाक दी गई पत्नी से स्मृति के अच्छे सम्बन्ध रहे, यानि इससे ज़ाहिर होता है, स्मृति एक भले दिल की महिला हैं. (आज चाहे वे कहें कि मीडिया को उनके व्यक्तिगत जीवन में झाँकने की ज़रूरत नहीं है, लेकिन अभिनय-अवधि के दौरान उन्होंने खुद अपने इस व्यक्तिगत जीवन में झंकवाया था). मेरा इरादा यहाँ उनके विपक्ष में कुछ कहने का नहीं है क्योंकि मैं हर उस शख्स को पसंद करती हूँ जिसके जीवन में अप्रत्याशित घटनाएँ घटती हैं, जो अपनी मेहनत से तो सफल होता ही है, भाग्य के चमत्कार से भी सफलता को प्राप्त करता है. स्मृति को उनके अभिनय के दौरान ही एक ज्योतिषी ने बताया था कि वे उच्च सरकारी पद को प्राप्त करेंगी। आज वे शनि की साढ़ेसाती को शांत करवाने के लिए हवन-पूजन करवा रही हैं. उन्हें उनके ज्योतिषी ने यह भी अवश्य बताया होगा कि शनि की साढ़ेसाती अपनी साढ़े सात साल की अवधि में परेशान ज़रूर करती है लेकिन अंत में अच्छा फल देकर जाती है. मुख्य बात जो मैं कहना चाहती हूँ, वह यह कि स्मृति को ज्योतिषी द्वारा यह बताया गया है कि वे एक दिन देश के सर्वोच्च पद पर आसीन होंगी यानि राष्ट्रपति बनेंगी। मैं विश्वास करती हूँ, यदि उनके सितारों में यह लिखा है, तो अवश्य होगा और इसी को कहते हैं चमत्कार। आप कहाँ थे, और कहाँ पहुंचे। अगर ऐसा होता है तो मुझे बहुत ख़ुशी होगी।


Monday, 24 November 2014

4. एक भावचित्र : मैं पापन

4. एक भावचित्र : मैं पापन

लकड़ी जल कोयला भई, कोयला जल भई राख
मैं पापन ऐसी जली, कोयला भई न राख.

एक औरत की यह नियति अग्रहणीय है, अस्वीकार्य है, जो हर वक़्त खुद को दोषी मान कर पश्चाताप की आग में जलती रहती है. खुद को मत कोसो, दोषी तुम नहीं, तुम्हारी यह सोच है, जिसमें तुम सदियों से दबी हुई हो. इस सोच से बाहर आओ, और देखो, पापी तुम नहीं, कोई और है.


3. एक भावचित्र : आत्मसखा

3. एक भावचित्र : आत्मसखा

पूरा जीवन हम सहस्रों लोगों से मिलते रहते हैं और हमें लगता रहता है कि वही लोग हमारा गंतव्य हैं. कि अचानक कोई ऐसे मिल जाता है कि हम चौंक जाते हैं कि अरे, हम तो आजतक जिन लोगों से मिलते रहे, वे तो हमारे लिए थे ही नहीं, हमारा असली आत्मसखा तो यह है. सच है, हमने पूरी उम्र उसी आत्मसखा की तलाश में गुज़ारी होती है लेकिन हमें पता भी नहीं चलता कि हम किसी की तलाश में हैं. हमें हमारा आत्मसखा मिलता ज़रूर है, देर-सवेर, चाहे उसका आना कुछ देर के लिए ही हो, पर वह आता ज़रूर है. वह किस कोने से आएगा, दबे पाँव, हमें पता नहीं चलता। आकर कितनी देर हमारे पास रुकेगा, हमें यह भी पता नहीं होता लेकिन उसके मिलने से हम जान जाते हैं कि यही तो है हमारा गंतव्य। उसका अल्प समय का साथ हममें सदियों का सुख भर जाता है. किसी के साथ हम पूरी उम्र रहते हैं, तब भी अधूरे रह सकते हैं. और किसी का थोड़े समय का साथ भी पूर्णता प्रदान कर देता है. सुख समय की लम्बाई के साथ नहीं मापा जाता, सुख समय के आधार पर नहीं मापा जा सकता, कि हम ज़्यादा से ज़्यादा किसी के साथ रहेंगे, तभी तृप्त होंगे। नहीं, हमें पल भर का साथ भी उम्र भर की तृप्ति प्रदान कर देता है कि उस पाने के बाद अन्य कुछ पाने की आकांक्षा नहीं रहती, अन्य कुछ पाने को शेष नहीं रहता। हमें लगता है, बस, बस, यही था. जो हमारे आदर्शवाद से मेल खाता था. यही था वह, जिसके साथ मिलने पर और मिल कर चले जाने पर अब किसी और से मिलन की चाह नहीं रही. यही तो था वह, जिसके लिए हमारे मन का खाली कोना सुरक्षित था. यही था, जो हमारे शून्य को भरने आया था. यही था, जिसके आने से हमारा तन-मन तरंगित हो कर नृत्य की विभिन्न मुद्राओं में परिभाषित होने लगा था. हमारे जीवन में उसका आना महत्वपूर्ण होता है, जाना नहीं। वह जाते हुए हमारा सर्वस्व लेकर जाता है तो आते हुए हमें सर्वस्व देने के लिए भी आता है.

ऐ मेरे आत्मसखा ! तुम्हारी स्मृतियाँ मेरे एकांत की अमूल्य निधि हैं. मेरा मन जंगल में मंगल है. मैंने तुम्हें खोकर जो खोया, उससे ज़्यादा तुम्हे पाकर पाया था. तुम मेरे जीवन में आए, मैं धन्य हुई.


Sunday, 23 November 2014

2. एक भावचित्र : मैं एक औरत हूँ

2. एक भावचित्र : मैं एक औरत हूँ

मैं एक औरत हूँ. मेरे विभिन्न रंग हैं. मैं अपने आप में पूर्ण हूँ. मैं अकेले जी सकती हूँ. पैसा, ऐशो-आराम का जीवन, यश, ये सब मैं खुद कमा सकती हूँ. मैं मुश्किलों को आसान कर सकती हूँ. मैं नव-निर्माण कर सकती हूँ. मैं क्या-क्या नहीं कर सकती? 

मैं एक औरत हूँ. मुझे कोई भय नहीं सताता। मुझे कोई पराजय नहीं रुलाती। मैं लोगों के दिलों को पढ़ सकती हूँ. मैं लोगों के दिलों पर राज कर सकती हूँ. मैं देश पर राज कर सकती हूँ. मैं क्या-क्या नहीं कर सकती? 

मैं एक औरत हूँ. मैं चाहूँ तो बंजर धरा पर उग जाऊँ। मैं चाहूँ तो आकाश में उड़ कर दिखाऊँ। मैं किसी भी अग्नि-परीक्षा में बिना जले रह सकती हूँ. मैं हर लांछन से बेदाग़ निकल सकती हूँ. मैं किसी भी असुर दृष्टि को भस्म कर सकती हूँ. मैं क्या-क्या नहीं कर सकती?

मैं एक औरत हूँ. मैं ग्रन्थ लिख सकती हूँ. मैं सत्य लिख सकती हूँ. मैं अच्छाई और बुराई का सच लिख सकती हूँ. मैं संयोग को सार्थक कर सकती हूँ. मैं वियोग को रचनात्मक कर सकती हूँ. मैं क्या-क्या नहीं कर सकती?

पर हे पुरुष, तुम्हारे प्यार के बिना मैं फिर भी अधूरी हूँ. मुझे कुछ नहीं चाहिए, बस एक आलिंगन के सिवा, ताकि मैं तुम्हारी धड़कनों में खुद को सुन सकूँ और तुम मेरी धड़कनों में खुद को सुन सको. मैं एक आलिंगन की तड़प लिए मरना नहीं चाहती।


Thursday, 20 November 2014

1. एक भावचित्र : मेरा मरना। और पुनः मरना

1. एक भावचित्र : मेरा मरना। और पुनः मरना

मैं सन्यासी थी. मेरे सन्यास का अर्थ शब्दकोष में नहीं था. मेरा सन्यास दुनिया के भोग में था, दुनिया के त्याग में नहीं। मेरे आसपास लोग थे पर मैं लोगों में नहीं थी. मैं एक कमरे में बंद थी पंच तत्वों के साथ. पर पृथ्वी पर मेरे लिए एक शांत कोना नहीं था, आकाश में फहराने के लिए सपने मेरे पास नहीं थे, जल का आप्लावन मेरे नेत्रों में था, वायु गर्द उड़ा-उड़ा कर लाती और मेरे चारों ओर बिखेर देती, अग्नि भस्मातुर थी हर पल. मेरी इन्द्रियाँ संवेदनाशून्य थीं, मैं गूँगी-बहरी थी, मेरे स्वाद मर चुके थे, घ्राण-शक्ति सुप्त थी, मन स्पर्शित होना भूल गया था. मेरे सामने अनेक प्रकार के व्यंजन थे लेकिन मैं खा नहीं पाई. भूखे रहना मेरी नियति थी. मेरे सामने अनेक प्रलोभन थे लेकिन मन आकर्षित होना भूल चुका था. मेरे पास अनगिनत वस्त्र थे, सबका रंग केवल एक था, जोगिया। आभूषणों का आभूषण था, रुद्राक्ष। एक ही शब्द सुनती थी बार-बार, माँ. एक ही शब्द बोलती थी बार-बार, हाय. हाथ में हर वक़्त गरल, साँस हर वक़्त गले में अटकी। मैं जंगलों में, पहाड़ों में भाग जाना चाहती थी पर मेरे पाँवों में मोह की बेड़ियाँ थीं. बाहर उजाले थे, मन में अँधेरे। मैं नहीं थी वहाँ, जहाँ मैं थी. मैं वस्तुतः कहीं नहीं थी. जहाँ मैं दिखती थी, वहाँ मेरा शरीर दिखता था, मैं नहीं। जहाँ मैं होती थी, वहाँ मेरा शरीर होता था, मैं नहीं। मेरा जीवन भरा-पूरा था पर मैं खाली। मैं भीड़ में थी पर मेरे अंदर सन्नाटा था. मेरे चारों ओर मधुर संगीत था पर भीतर मर्सिया तैर रहा था. मैं दिनों को गिनती थी, दिन मुझे गिनते थे. दिनों की पहचान मेरे चेहरे पर उतरने लगी. मैं धीरे-धीरे खुद को मरता हुआ देख रही थी. मैं खुद अपने सामने मर रही थी. मेरा शव मेरे सामने पड़ा रहता और मैं मुक्ति की सुविधा की तलाश में इधर-उधर भटक रही होती।

कि तभी…… कि तभी…… मेरे हाथों ने अजीब सी छुवन महसूस की, मेरे कानों में कोई नई सी धुन गुनगुनाई, मेरा आसपास खुशबू से महक उठा, मेरे होंठ कुछ कहने के लिए फड़फड़ाने लगे, मेरी आँखों में सपने लहराने लगे. मेरी इन्द्रियों को जागृत होने का वरदान मिला। पृथ्वी ने मुझे अपने में समो लिया, आकाश ने मुझे अपनी बाहों में समेट लिया, जल पछाड़ें मार-मार कर मुझे भिगोने लगा, वायु में चन्दन और गुलाब की खुशबू, अग्नि चाहे तो पूरा जला ले मुझे और मैं उफ़ न करूँ। मैं पंचतत्व में विलीन होती चली गई. मैं सँवरने लगी, मेरा मौन टूटा, ब्रह्माण्ड में ज्यों विस्फोट हुआ, मेरे भाव कविताएँ बन कर बिखरने लगे, मेरे शब्द कहानियाँ बन कर टहलने लगे. मेरे अंग-अंग में चंचलता उग आई, मेरे रोम-रोम से प्रकाश की किरणें फूटने लगीं, मेरे मन के अँधेरे दूर होने लगे, मुझे साफ़ दिखने लगा, मेरी चाल मस्ताने लगी, मैं रंगबिरंगे कपडे सिलवाने लगी, गहने-दर-गहने गढ़वाने लगी. मैं अपने खोल से बाहर आई, दुनिया बहुत रंगीन थी, यह जग बहुत आकर्षक था. मैं जाग गई, मैं ज़िंदा हो गई, मेरा पुनर्जन्म हुआ. ओह ! मैं इतने साल मरी कैसे रही?

और फिर सब थम गया, सब ठहर गया, वहीँ का वहीँ, वैसे का वैसा, मैं वापस अपने खोल में, मैं वापस उसी खोह में, दूसरी मौत मरने के लिए, दूसरा सन्यास भोगने के लिए, पर एक झुरझुरी है उसकी छुवन की, जो जाती नहीं।

(मणिका मोहिनी) फोटो मा जीवन शेफाली के पेज 'नायिका' से साभार


पर मोह शेष था Kavita 223

पर मोह शेष था

काग़ज़ भर काग़ज़ लिखे
शब्दों के आडम्बर रचे
कथा दर कथा
और कथा, और कथा
लिखने के बाद भी
सब यूँ ही रिस रहा है भीतर।
लेखन दर्द को सहेजता है
और कण-कण बाँट देता है
उपहासास्पद होने के लिए.
आह !
कुछ ख़त्म नहीं होता
ख़त्म सिर्फ हम होते हैं
अहसास हमेशा ज़िंदा रहते हैं.
सब कुछ छूटने के बाद भी
सब कुछ हमारे बीच में ही रहता है.
मैं जीवन में थी
पर जीवन मुझमे नहीं था.
जीवन में जीवन ख़त्म हुआ था
पर मोह शेष था
मैं इस दुनिया में होकर भी
इस दुनिया में नहीं थी.
फिर कहूँगी, बार-बार कहूँगी
अपने मरण और पुनर्जन्म की कथा.
हर नए दर्द को सोख लेता है
उससे पहले वाला दर्द
अब दर्द नहीं होता है
दर्द ने हँसना जो सीख लिया है.

Wednesday, 19 November 2014

आज की प्रार्थना Kavita 222

आज की प्रार्थना

वाह प्रभु ! तेरी माया
कैसा-कैसा गुल खिलाया।

प्रकृति को सुन्दरता दी
इंसान अजीब बनाया।

कोई विश्वास नहीं उनका
काला मन, गोरी काया।

विषयों की भरमार दी
पर रूप सँवर नहीं पाया।

सच है तेरी व्याख्या
कहीं धूप, कहीं छाया।

Ma Jivan Shaifaly

Ma Jivan Shaifaly

आप यकीन करेंगे? कि जो व्यक्ति मेरे साये में आ जाता है उसका कभी बुरा नहीं होता। मैं मज़ाक में लोगों से कह देती हूँ, 'अब तुम मेरे Aura में हो, तुम्हारा कुछ बुरा नहीं होगा।' इसे मेरी गर्वोक्ति न समझें। मुझे मानो कोई वरदान प्राप्त है. मैं बड़े से बड़ा फैसला क्षण में कर लेती हूँ और मेरे फैसले हमेशा सही होते हैं. मैं चाहने से बहुत कुछ कर पाती हूँ. इसका अभिप्राय यह नहीं कि मेरा कभी कोई नुकसान नहीं हुआ या मुझे जीवन में कभी मात नहीं मिली। आखिर हूँ तो इंसान ही, बस भगवान की गुड बुक्स में हूँ. भगवान से कुछ कह दूँ और वह न करे, ऐसा हो ही नहीं सकता। जब मैं कोई निर्णय लेती हूँ तो एकदम सोचती हूँ, 'अब यह मैंने भगवान के कानों में डाल दिया है, मेरा यह काम हो जाएगा।' हाँ, जो व्यक्ति मेरे साथ धोखाधड़ी करता है, उसका कभी भला नहीं होता हालाँकि मैं उसे कभी बद्दुआ नहीं देती, क्योंकि बुरा सोच कर मैं पाप इकट्ठे नहीं करती, पर मुझे पता होता है कि फलाँ व्यक्ति ने मेरे साथ बुरा किया है, अब वह गया काम से, अब वह प्रभु के कहर से बच नहीं सकता। यकीन करना है तो कीजिए, नहीं करना, तो मत कीजिए।

Ma Jivan Shaifaly मेरा यकीन करेंगी, क्योंकि वे भी इसी तरह की आध्यात्मिक क्रान्ति के दौर से गुज़री हैं. उनके पेज 'नायिका' में इस बात के संकेत मिल जाएँगे। कई मित्रों से हमारी ह्रदय-तंत्री बिना देखे, बिना जाने मिल जाती है. मुझे पेज 'नायिका' पढ़ने के बाद लगा था, Oh, she is a deep thinker. And when I saw her pretty face on facebook, मोहे ना नारि नारि के रूपा को गलत ठहराते हुए a Godly vibration came to me. I've a strong feeling that whosoever we are meeting and feel close to, they are our last birth cannections. कुछ व्यक्तियों के साथ आपको आध्यात्मिक स्पर्श का अहसास होता है. मुझे शेफाली की ज़िन्दगी के बारे में कुछ नहीं पता. कभी ख़ास बात भी नहीं हुई. उनकी पोस्ट से ही उनके विचारों का पता चला. उनके पास कुछ जादू के अहसास हैं, मेरे पास चमत्कार के. यानि मैं जिसे चमत्कार कहती हूँ, वे उसे जादू कहती हैं.


Tuesday, 18 November 2014

एक पागल की कहानी

एक पागल की कहानी : जनहित में जारी
आधी हकीकत : आधा फ़साना

मैं काउंसलिंग करती हूँ और लोग मुझसे अपनी समस्याओं के निवारण हेतु संपर्क करते रहते हैं. (लेकिन मैं, जब तक बहुत ज़रूरी न हो, किसी से मिलना पसंद नहीं करती।) (And I charge too for my counselling. देखो जी, अब कोई मेरा दिमाग खाने से पहले मेरी फीस अग्रिम जमा करवाए।)

कुछ वर्ष पहले एक अकेली महिला, जो विधवा थी, एक बच्चे की माँ थी, पढ़ी-लिखी और उच्च नौकरी पर थी, पति बहुत पैसा छोड़ कर गया था, हाई स्टेटस था, ने मुझसे संपर्क किया कि मैं उसका दूसरा विवाह करवाने में उसकी मदद करूँ। असल में वह अपना वैवाहिक विज्ञापन मेरे ज़रिये देना चाहती थी. मैंने अपनी ईमेल आई डी के साथ उसका विज्ञापन दे दिया। बहुत प्रतिक्रियाएँ आईं. एक मेल अजीब था. बहुत गरिष्ठ अंग्रेजी में एक व्यक्ति ने लिखा था कुछ इस प्रकार।।।।।

"मैडम, मैं अपने एक मित्र की ओर से आपको लिख रहा हूँ. मेरा मित्र इंजिनियर है, अच्छी नौकरी में है, तलाकशुदा है, कोई ज़िम्मेदारी नहीं है, अमीर परिवार से है, बस एक बात यह है कि वह कुछ साल पहले पागलखाने में रहा है, वह पागल नहीं था, उसकी पत्नी के घरवालों ने उसे झूठा पागल साबित करके पागलखाने भिजवा दिया था। पागलखाने के प्रमाणपत्र के अनुसार वह मानसिक रूप से एकदम स्वस्थ है. मैं सिर्फ यह जानना चाहता हूँ कि क्या मेरे मित्र की परिस्थिति में उसके विवाह की सम्भावना हो सकती है? क्या आप अपने लिए उस पर विचार कर सकती हैं?"

मेरे नाम की आई डी होने के कारण वह मुझे ही संभावित कन्या समझ रहा था. खैर, इसकी तो कोई बात नहीं पर मुझे अजीब इस बात का लगा कि हिम्मत तो देखो इस पागल की, इतने आलीशान विवरण वाली महिला के लिए विवाह का प्रस्ताव रख रहा है. मैंने कोई उत्तर नहीं दिया। एक महीने बाद जब सारी मेल छानबीन के बाद रिजेक्ट हो गईं और मुझे थोड़ा समय मिला तो मैंने सोचा, इस आदमी को डाँटा जाए कि तेरी हिम्मत कैसे हुई लिखने की? मैंने उसे अंग्रेजी में लिखा।।।।।।

"महोदय, वह विज्ञापन मेरे लिए नहीं था, किसी परिचित के लिए था. आय'म अ सीनियर पर्सन। बहरहाल, मैं आपकी हिम्मत की दाद देती हूँ जो आप एक पागल का प्रस्ताव लेकर आए."

बन्दे ने तुरंत जवाब दिया, "मैडम, क्षमा चाहता हूँ. क्या आपकी कोई मैट्रीमोनियल एजेंसी है?"

मैंने लिखा, "महोदय, मैट्रीमोनियल एजेंसी होती तो आपसे पचास हज़ार रुपये लिए बिना बात नहीं करती, क्योंकि आपका केस बहुत बिगड़ा हुआ है."

उसने फिर से क्षमा माँगी और लिखा, "मैडम, बड़ी बहन होने के नाते आप मेरे मित्र की मदद करें। वह एक अच्छा, भलामानस, बुद्धिमान व्यक्ति है. बस किस्मत का मारा है."

लो जी, मैंने सोचा, मदद कर देते हैं.

धीरे-धीरे बातचीत में वह खुलता गया और एक दिन उसने यह रहस्योद्घाटन किया कि वह 'मित्र' नहीं, वही 'वह' है. उसने अपना छायाचित्र भेजा। आकर्षक व्यक्तित्व था. उम्र लगभग पैंतालीस वर्ष। उसने अपनी कहानी सुनाई कि वह इलाज के लिए एक पागलखाने में भर्ती हुआ था, सब उसके ससुरालियों का किया-धरा था. वह ठीक हो गया लेकिन उसके घर का कोई भी सदस्य उसे वापस घर ले जाना नहीं चाहता था और वह इस स्थिति में नहीं था कि अकेले कहीं मकान आदि खोज कर रह सके. उसकी खुशकिस्मती यह हुई कि शिक्षित होने के कारण उसे पागलखाने के कार्यालय में ही नौकरी दे दी गई (प्रशासन में कम्प्यूटर पर काम करता है), तथा वहीँ रहने के लिए एक कमरा मिल गया. उसकी इच्छा थी कि हर हाल में उसकी शादी हो, उसके बच्चे हों. एक आम आदमी की ख्वाहिश। मेरे पास उसकी बताई बातों को सच समझने के अलावा न कोई साधन था, न कोई ज़रूरत। उसने कंप्यूटर पर स्काइप में मुझसे बात करके मुझे खुद को दिखाया और अपना कार्यालय का कमरा दिखाया। बस.

मुझे उससे हमदर्दी हुई. मैं भी गज़ब हूँ. मुझे हर ऐसे-वैसे से, हर ऐरे-गैरे से हमदर्दी हो जाती है, सिवाए भिखमंगों के।

मैंने अपने परिचय की कई ऐसी महिलाओं को, जिन्हें जीवन साथी की तलाश थी, उसके बारे में बताया। सबने एक सुर में उसे रिजेक्ट कर दिया, साथ ही मुझे उलाहना भी दिया, "मणिका, हमीं रह गए थे क्या इस पागल के लिए?" या "मणिका जी, क्या यह पागल ही रह गया था हमारे लिए?"

उसने शादी डॉट कॉम में रजिस्टर कराया और मुझसे चाहा कि मैं उसकी मदद करूँ लेकिन मेरे बस का नहीं था. मैंने मना कर दिया। मैंने उसे समझाया, हर आदमी को सब कुछ नहीं मिलता, हर आदमी की शादी नहीं होती, इस दुनिया में बहुत लोग अकेले जीते हैं, अकेले मरते हैं. लेकिन उसका प्रयास जारी है.

मुझे उसकी बातों से अंदाज़ा हुआ है कि उसमें अभी भी पागलपन के कुछ तत्व हैं. मसलन, वह सिर्फ अपने बारे में बात करता है, दुनिया, समाज, इधर-उधर की कोई बात नहीं। उसके मन में हर वक़्त एक डर रहता है कि दूसरे उसे नुकसान पहुँचा सकते हैं. उसे पागलखाने के दूसरे पागलों से डर रहता है कि वे उसे मार सकते हैं क्योंकि पागलखाने ने उसे नौकरी दी. उसे लगता है कि वह इस दुनिया में एकमात्र बुद्धिमान व्यक्ति है और कोई बुद्धिमत्ता में उसके आगे टिक नहीं सकता। उसे यह भी अभिमान है कि वह एक अत्यन्त सुन्दर और आकर्षक व्यक्तित्व का मालिक है और कोई भी लड़की उस पर आसानी से फ़िदा हो सकती है. उसे यह डर रहता है कि किसी को उसके अतीत में पागल होने का पता न चल जाए. वह सोचता है कि जिससे उसकी शादी तय हो जाए, उसे ही वह अपनी असलियत बताए (और चाहे न भी बताए). अपने डर के कारण वह अपने पासवर्ड हर हफ्ते बदलता है. उसे जीवन साथी के रूप में जो लड़की यानि महिला चाहिए, वह एकदम गोरी और खूबसूरत होनी चाहिए, जिसकी उम्र 25 से 39 वर्ष के बीच हो. वैवाहिक स्तर कोई भी हो, एक-दो बच्चा हो, गरीब हो, गाँव की हो, कोई बात नहीं। (गज़ब है, ऐसों-ऐसों के भी नखरे तो देखो।)

मैं खासकर महिलाओं के हित में बता रही हूँ कि उसने अपनी कई मेल आई डी बनाई हुई हैं और कई फेसबुक अकाउंट खोले हुए हैं, अलग-अलग नामों से (A, D, K, M, R से शुरू होने वाले नामों के बारे में तो मुझे पता है). वह सिर्फ और सिर्फ महिलाओं से बात करता है, नेट से खोजता है, बात करने की कोई न कोई वजह बना लेता है. फेसबुक पर किसी विशिष्ट के बारे में लिखेगा तो वह भी किसी विशिष्ट महिला के बारे में, चाहे वह राजनीति से जुडी हो या खेलों से या साहित्य से या धर्म से. वह दोस्ती करता है तो केवल 25 से 39 वर्ष के बीच की महिलाओं से, इस उम्मीद में कि शायद कोई पट जाए. वह शालीन तरीके से बात करता है. उसके बात करने से उसके अतीत का अंदाज़ा नहीं होता। ठीक है, जीवन जीने, घर बसाने का हक़ हरेक को है, लेकिन अलग-अलग नामों से आई डी बना कर झूठ से, छल से किसी को फँसाना सही नहीं।

हाँ जी, वह मुझसे डरता है कि उसके द्वारा सारे भेद खोल देने के बावजूद मैं उसके लिए कुछ नहीं कर पाई. पर मुझसे किसी को डरने की ज़रुरत नहीं क्योंकि मैं किसी का बुरा नहीं करती।

और हाँ, किसी महिला को उस जैसे व्यक्ति का संदेह हो तो वह अधिक जानकारी के लिए मुझसे संपर्क कर सकती है. सबका मंगल हो.