Tuesday, 28 January 2014

ग़ज़ल 35

ग़ज़ल 35

मौसम है यूँ खराब कोई पुष्प न खिले।
अपने से भी मिलने का अब वक़्त न मिले।

बिखरे हुए पलों को सँभाला न जाए जब
होते हैं शुरू आत्म-विलासी के सिलसिले।

अपनी ही नाकामी थी गिरते चले गए
कि न कोई शिकवे किसी से न कोई गिले।

कौन सी दवा करें और कौन सा इलाज
नासूर बन के रिस रहे हैं ज़ख्म यूँ छिले।

डर के जी रहे हैं कहीं भेद न खुल जाए
उसकी बेरहमी छुपाने को अधर सिले।

सीढ़ियाँ-दर-सीढ़ियाँ उम्मीद की चढ़े 
मंज़िल पे जाके देखा बंद रास्ते मिले।

कोई कसर नहीं थी मिटने की चाह में
मिटटी में मिल गए कल्पनाओं के किले।

Thursday, 16 January 2014

छोटी कविता 18

छोटी कविता

जितने रहस्य मेंरे दिमाग में छुपे हैं
जितने विचार मेरे मन में कुलबुलाते हैं,
यदि वह सब मैं उजागर कर दूँ
तो न जाने कितने खून हो जाएँ।
और सबसे पहले तो खून मेरा ही हो.
इसलिए चुप्प।
एक चुप सौ को हराए।
एक चुप शान्ति बनाए।
एक चुप कितनी खलबलियाँ होने से बचाए।
(खुद के ख़िलाफ़ एक खतरनाक ख्याल)

Wednesday, 15 January 2014

सर्व धर्म हिताय Kavita 182

सर्व धर्म हिताय

वह मंदिर भी जाता है और मस्जिद भी
गुरुद्वारे भी जाता है और चर्च भी
परेशान आदमी का कोई मज़हब नहीं होता
दुखी आदमी हर धर्म को मानता है.
पता नहीं कौन सा पंडित-ग्यानी
कौन सा मुल्ला-मौलवी
कौन से वाहेगुरु-सतगुरु
कौन से फादर
कब रहम की बारिश कर दें.
पता नहीं कौन सी पूजा-हवन
कौन सा ताबीज
कौन सी कार-सेवा
कौन सी मोमबत्ती
जीवन के बुझे हुए दीये को रोशन कर दे.

Tuesday, 7 January 2014

'आप' को सलाह

'आप' को सलाह

आम आदमी पार्टी, आप हर बात पूछने के लिए जनता के पास न जाएँ क्योंकि जनता ने ही आपको चुन कर भेजा है, जनता जानती है कि आपमें सही निर्णय लेने की क्षमता है. आपका कॉंग्रेस के साथ गठबंधन सही है क्योंकि कॉंग्रेस स्वयं अपनी गलतियों को स्वीकार कर रही है और आपसे अच्छी बातें सीखने की बात कह रही है. ऐसा नहीं है कि गलत और बुरा आदमी कभी सही और भला नहीं हो सकता। आलोचनाओं से निरुत्साहित होने की अपेक्षा उन्हें सकारात्मक रूप में लिया जाना चाहिए। कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना।

अरविंद केजरीवाल जी, मुझे समझ नहीं आता कि आपके पाँच कमरों के मकान पर भी इतनी हाय-तौबा क्यों हुई? और आप आवश्यकतानुसार बड़े घर में रहने पर क्यों ऐतराज़ कर रहे हैं? क्या झुग्गी-झोंपड़ी के स्तर पर रह कर मुख्यमंत्रित्व निभाएंगे? मुख्यमंत्री बनने से पहले आपकी ज़रूरतें भिन्न थीं, आज बदल गई हैं. ओहदे के अनुसार ही रहन-सहन गरिमाशाली होना चाहिए। कल को आपके माता-पिता आपके साथ रहने आ गए तो उन्हें कहाँ रखेंगे? एक कमरा उनके लिए, एक आप पति-पत्नी के लिए, एक आपके अकेले के लिए चिंतन-मनन हेतु, आपके जितने बच्चे हैं (दो-तीन, मालूम नहीं), एक-एक उनके लिए, एक मेहमानों के लिए, तो यह छह-सात बेडरूम हो गए, इनके साथ ड्राइंग-डाइनिंग हाल, किचन, स्टोर रूम, हर बेडरूम के साथ अटैच्ड बाथरूम, सर्वेंट रूम, यानि इतना बड़ा घर तो आपको चाहिए ही चाहिए। यदि सब एक ही कमरे में घुस कर रहेंगे तो आपका दिमाग का बुरा हाल हो जाएगा। घर का अर्थ केवल 'सोना' और 'खाना' ही नहीं होता, बल्कि घर आपमें रचनात्मकता, सृजनात्मकता, ऊर्जा का संचार करने में भी सहायक होता है. घर का पूर्ण सुविधाजनक होना अनिवार्य है. इसलिए लोगों के कहने पर न जाएँ, अपने पद की गरिमा एवं आवश्यकता के अनुसार घर में रहें।

अरविंद केजरीवाल बहुत आस्थावादी हैं, हर बात में भगवान पर विश्वास करते हैं, अपनी पार्टी की जीत को भी भगवान का चमत्कार बताते हैं, तो वे यह भी समझें कि राखी बिरला की कार पर एक बच्चे की बॉल का गिरना (राखी बिरला द्वारा उसे आपराधिक तत्वों से जोड़ना बहुत स्वाभाविक था) भगवान की ओर से दिया गया संकेत है कि आप पर कभी भी विपदा आ सकती है, इसलिए आप को सुरक्षा लेने से इंकार नहीं करना चाहिए। जिस समय आपने यह ऐलान किया कि आप पुलिस की सुरक्षा नहीं लेंगे, उस समय आप आम आदमी थे जिसे किसी से कोई डर नहीं होता। अब सरकार में आते ही आप ख़ास बन चुके हैं जिससे ईर्ष्या करने वाले बहुत लोग हैं, अन्य पार्टियाँ आप से जल रही हैं, ऐसे में आप को कोई भी नुक्सान पहुंचा सकता है. आपको सुरक्षा के घेरे में रहना/चलना चाहिए। जब तक आप सत्ता में नहीं थे, तब तक आपके बुलंद हौसले आप को आदर्शवादी होने की सलाह दे रहे थे लेकिन सता में आने के बाद आप को व्यवहारिक दृष्टि से इन बातों पर गौर करना है. सब जानते हैं कि आप इन बाहरी चीज़ों पर न गर्व करेंगे, न इनकी लालसा रखेंगे। सुरक्षा, बड़ा मकान, सरकारी गाड़ी, ये सब ऐश्वर्य का प्रतीक नहीं है बल्कि आपकी पोस्ट (पद) की डिमांड (माँग) है, जिसकी ज़रुरत का अहसास आप को पद पर आने से पहले नहीं पता था.

ग़ज़ल 34

ग़ज़ल 34

गुलमोहर के फूल खिले मेरे आँगन
झूम-झूम के बरसेगा अब के सावन।

उम्मीदों की ऊँचाई से फिसल पड़ा
डूब रहा सूरज फिर भी लगता पावन।

अपने ही भीतर तलाशना है सुख को
खुद को खुद समझा लेता है पगला मन.

कहीं न कोई चाह बची तरसाने को
जंगल में मंगल कर देगा उजड़ा वन.

दूर-दूर तक आँख बिछा देखा करती
मैं ही खुद की दीवानी, मैं ही साजन।

साफ़-सफा पन्नों पर लिखना शुरू करूँ
मैं अपनी ही लिखूँ कहानी मनभावन।

Sunday, 5 January 2014

एक रिश्ता बेनाम सा (भगवंत अनमोल)

एक रिश्ता बेनाम सा (भगवंत अनमोल)

भगवंत अनमोल का उपन्यास 'एक रिश्ता बेनाम सा' इतना रोचक है कि एक बार पढ़ना शुरू कर दें, तो बीच में छोड़ने को मन नहीं करता, फिर भी अपनी व्यस्तता के चलते मुझे इसे किश्तों में पढ़ना पड़ा. उपन्यास की व्याख्या करते हुए लेखक ने स्वयं इसे 'सच्ची मित्रता की झलक दिखाता उपन्यास' कहा है, लेकिन वस्तुतः यह एक प्रेम कहानी ही है, आत्मिक प्रेम की कहानी, जिसमें भौतिक प्रेम की झलक उस समय नज़र आती है जब प्रेम भौतिकता का रूप लेने से पहले ही न्यौछावर हो जाता है. उपन्यास के अंत में बहुत सारी उलझनें एक साथ प्रस्तुत कर दी गई हैं, वैसे उपन्यास का अंत कुछ भी हो सकता था, इस कहानी में बहुत सारे 'अंत' होने की सम्भावनाएं थीं. लेखक ने हकलाने की समस्या का भी बहुत बारीकी से अध्ययन करके हकलाने वाले व्यक्ति की राह में आने वाली मुश्किलों का सच्चा बयान किया है और उसका सटीक उपचार सुझाया है. 

एकाध अश्लील अभिव्यक्तियाँ भी हैं जो मुझे कतई पसंद नहीं आईं जैसे 'मेरी तो फट गई'. अनेक स्थलों पर इस वाक्य का प्रयोग किया गया है जो अत्यंत घटिया लगता है. यह सस्ती मानसिकता की ओर संकेत करता है. बोलने में इस तरह के ग्राम्य प्रयोग चल जाते हैं लेकिन लिखने की भाषा बोलने कि भाषा से भिन्न होती हाई, अधिक सुसंस्कृत एवं सुगठित होती है. इस प्रकार के अर्थ को ध्वनित करने के लिए 'मैं तो मर गया' या 'मेरी तो जान निकल गई' या 'मैं तो कहीं का नहीं रहा' आदि प्रयोग किए जा सकते थे।

उपन्यास का प्रस्तुतीकरण, छपाई आदि बेहद सुन्दर है. बढ़िया कागज़, आकर्षक कवर. पूरे उपन्यास में अनेक भावोक्तियाँ हैं जो प्रवचन की शक्ल में हैं. अच्छा लगा यह देख कर कि अनमोल ने यह ज्ञान चाहे किताबों में पढ़ा हो या अन्य लोगों के अनुभव में सुना हो, उसे उन्होंने अंदर तक ग्रहण किया है, व्यर्थ नहीं जाने दिया। उन्होंने उद्घाटित भी किया है कि वे एक मोटिवेशनल पुस्तक 'कामयाबी के अनमोल रहस्य' भी लिखने वाले हैं.

अभी अनमोल की उम्र ही क्या है? वे अभी केवल 24-25 वर्ष के हैं. उनका पहला उपन्यास था 'द परफेक्ट लव'. इतनी छोटी उम्र में दो उपन्यासों की उपलब्धि कोई कम नहीं है. अनमोल में प्रतिभा है, जो उनके लेखन में स्वतः लक्षित है. मेरी शुभकामना उनके साथ है.

उपन्यास : एक रिश्ता बेनाम सा
लेखक : भगवंत अनमोल
प्रकाशक : साहित्य संचय, सोनिया विहार, दिल्ली - 110094 
प्रकाशन वर्ष : 2014
 पृष्ठ : 144
आकार : डिमाई
मूल्य : 300 रुपये