Tuesday, 7 January 2014

ग़ज़ल 34

ग़ज़ल 34

गुलमोहर के फूल खिले मेरे आँगन
झूम-झूम के बरसेगा अब के सावन।

उम्मीदों की ऊँचाई से फिसल पड़ा
डूब रहा सूरज फिर भी लगता पावन।

अपने ही भीतर तलाशना है सुख को
खुद को खुद समझा लेता है पगला मन.

कहीं न कोई चाह बची तरसाने को
जंगल में मंगल कर देगा उजड़ा वन.

दूर-दूर तक आँख बिछा देखा करती
मैं ही खुद की दीवानी, मैं ही साजन।

साफ़-सफा पन्नों पर लिखना शुरू करूँ
मैं अपनी ही लिखूँ कहानी मनभावन।

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