Tuesday, 28 January 2014

ग़ज़ल 35

ग़ज़ल 35

मौसम है यूँ खराब कोई पुष्प न खिले।
अपने से भी मिलने का अब वक़्त न मिले।

बिखरे हुए पलों को सँभाला न जाए जब
होते हैं शुरू आत्म-विलासी के सिलसिले।

अपनी ही नाकामी थी गिरते चले गए
कि न कोई शिकवे किसी से न कोई गिले।

कौन सी दवा करें और कौन सा इलाज
नासूर बन के रिस रहे हैं ज़ख्म यूँ छिले।

डर के जी रहे हैं कहीं भेद न खुल जाए
उसकी बेरहमी छुपाने को अधर सिले।

सीढ़ियाँ-दर-सीढ़ियाँ उम्मीद की चढ़े 
मंज़िल पे जाके देखा बंद रास्ते मिले।

कोई कसर नहीं थी मिटने की चाह में
मिटटी में मिल गए कल्पनाओं के किले।

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