Sunday, 2 February 2014

वह समझदार हो गई Kavita 183

वह समझदार हो गई

टुकड़े-टुकड़े कर दी उसने आज एक तस्वीर
और फ़ेंक दी कूड़ेदान में
लगता है, आज वह समझदार हो गई.

डायरी में जहाँ-जहाँ लिखा था प्रिय का नाम
उस पर बनाए स्याही से धब्बे
टूटते-टूटते वह अनगढ़ चित्रकार हो गई.

खालीपन मन में ही नहीं, चारों तरफ व्याप्त
द्वन्द में निर्द्वन्द में
हर कहने वाली बात बेकार हो गई.

पूछने को क्या पूछे, कहने को किससे कहे
अपना कोई रहा नहीं
बेगानों के बीच हास्यास्पद समाचार हो गई.

सारी दिशाएँ सहम कर खामोशियों में
ढूँढती थीं सार्थक शब्दों के कोष
तभी अपशब्दों की बौछार हो गई.

प्रेम का होना क्या और खोना क्या
मिलने को कुछ न मिला
बदनामी लेकिन धुआँधार हो गई.