Friday, 28 March 2014

उतना दर्द Kavita 186

उतना दर्द

दिल में जितना प्यार है, उतना दर्द है
आँखों में जितने सपने हैं, उतने आँसू हैं
चेहरे पर जितनी आस है, उतना संत्रास है
अंतस में जितने भरम हैं, उतने ज़ख्म हैं
अहसास में जितनी जीत है, उतने सदमे हैं
होठों पर जितनी हँसी है, उतनी चुप्पी है
पाँव में जितनी गति है, उतना बोझ हैं
बातें जितनी चंचल हैं, उतनी ग़मगीन हैं
मौसम जितना खुशनुमा है, उतना दुखदायी है
शर्तों पर जितनी दोस्ती है, उतनी दुश्मनी है
जीवन जितना सरल दिखे, उतना जटिल है
मृत्यु जितनी मोहक दिखे, उतनी कठिन है.

Thursday, 20 March 2014

Its Platonic

Its Platonic

You are absorbed in my innermost heart.
Its a wonderful feeling
That we are together
In this journey.

Its platonic.
No worldly affair.
We'll never see each other.
We'll never meet in person.

Its magic of written words
Which create miracle.
We have nothing to hide.
Nothing to show.

Whatever happened
Happened to us naturally.
Its a godly feeling.
Its a generous feeling.

Love doesnt see benefits.
It doesnt lie in physical meeting.
Its soul to soul.
No other thing has any role.

Thursday, 13 March 2014

यह कविता नहीं Kavita 185

यह कविता नहीं

मैंने कहीं पढ़ा था
जो जाता है, उसे जाने दो
हाथ की लकीरों में होगा
तो खुद लौट आएगा.

और वह खुद लौट आया
जैसे, जो सपना मैंने देखा नहीं
वह सच होने के लिए
मेरे हाथ की लकीरों में लिखा था.

असम्भव सम्भव हो गया.
मिटा हुआ फिर से रचा गया.
अनहोनी होनी बन कर घटित हुई.
अन्धकार में एक लौ प्रस्फुटित हुई.

चमत्कार किसी ने न देखे हों
मैंने ज़रूर देखे हैं.
छप्पर फाड़ कहावत सबने बस सुनी हो
मेरे ऊपर छप्पर फटे हैं.

ओ प्रभु ! हे प्रभु !
ये सब कहने में मेरा अहंकार नहीं
आश्चर्य-मिश्रित हर्ष है
मुझ पर तेरे अद्वितीय स्नेह का स्पर्श है.

यह कविता नहीं
सस्वर आत्म-चिंतन है
भावों का उच्छ्वास है
ईश्वर पर आस्था और विश्वास है.

Friday, 7 March 2014

असमाप्त यात्रा में Kavita 184

असमाप्त यात्रा में

तुम आते हो तो सपने साथ लाते हो.
सजाते भी तुम हो, तोड़ते भी तुम हो.
सपने और आँसू एक-दूसरे का पर्याय हैं.
मत आया करो
या बताया करो
सपनों के ज़ख्म आँसुओं से कब तक भरूँगी?

मेरे तुम्हारे बीच जो रसायन पिघलता है
मैं डूबती हूँ, तुम पार लगते हो.
मुझे तैरना नहीं आता
तुम्हें डूबना नहीं आता
आत्मघाती दौर से गुज़रती हूँ मैं
मोह के जंजाल से कैसे मैं बचूँगी?

ऐसा क्या है जो हमारे बीच अनिवार्य है?
तुम मेरे कोई नहीं
मैं तुम्हारी कोई नहीं.
कभी चले आते हो अहाने-बहाने
कभी लड़ते हो जैसे पीछा छुड़ाने
डरूँगी तुमसे मैं, क्यों न डरूँगी?

लगते हो पागल कभी लगते हो सयाने
बेवजह आते हो
जाने की वजह ढूँढ लेते हो.
कितना मुझमें मर गया,
कितना जीवित है?
कब तक यह प्रश्न मैं खुद से करूँगी?

असमाप्त यात्रा में कब तक साथ चलेंगे?
एक पल में जीना, एक पल में मरना
एक पल में हँसना, एक पल में रोना।
अजीब सी कहानी लिख रहे हैं हम
उपसंहार लिख कर भी नहीं हुई ख़तम
मरूँगी अब मैं, बस मैं मरूँगी।