Friday, 7 March 2014

असमाप्त यात्रा में Kavita 184

असमाप्त यात्रा में

तुम आते हो तो सपने साथ लाते हो.
सजाते भी तुम हो, तोड़ते भी तुम हो.
सपने और आँसू एक-दूसरे का पर्याय हैं.
मत आया करो
या बताया करो
सपनों के ज़ख्म आँसुओं से कब तक भरूँगी?

मेरे तुम्हारे बीच जो रसायन पिघलता है
मैं डूबती हूँ, तुम पार लगते हो.
मुझे तैरना नहीं आता
तुम्हें डूबना नहीं आता
आत्मघाती दौर से गुज़रती हूँ मैं
मोह के जंजाल से कैसे मैं बचूँगी?

ऐसा क्या है जो हमारे बीच अनिवार्य है?
तुम मेरे कोई नहीं
मैं तुम्हारी कोई नहीं.
कभी चले आते हो अहाने-बहाने
कभी लड़ते हो जैसे पीछा छुड़ाने
डरूँगी तुमसे मैं, क्यों न डरूँगी?

लगते हो पागल कभी लगते हो सयाने
बेवजह आते हो
जाने की वजह ढूँढ लेते हो.
कितना मुझमें मर गया,
कितना जीवित है?
कब तक यह प्रश्न मैं खुद से करूँगी?

असमाप्त यात्रा में कब तक साथ चलेंगे?
एक पल में जीना, एक पल में मरना
एक पल में हँसना, एक पल में रोना।
अजीब सी कहानी लिख रहे हैं हम
उपसंहार लिख कर भी नहीं हुई ख़तम
मरूँगी अब मैं, बस मैं मरूँगी।

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