Thursday, 13 March 2014

यह कविता नहीं Kavita 185

यह कविता नहीं

मैंने कहीं पढ़ा था
जो जाता है, उसे जाने दो
हाथ की लकीरों में होगा
तो खुद लौट आएगा.

और वह खुद लौट आया
जैसे, जो सपना मैंने देखा नहीं
वह सच होने के लिए
मेरे हाथ की लकीरों में लिखा था.

असम्भव सम्भव हो गया.
मिटा हुआ फिर से रचा गया.
अनहोनी होनी बन कर घटित हुई.
अन्धकार में एक लौ प्रस्फुटित हुई.

चमत्कार किसी ने न देखे हों
मैंने ज़रूर देखे हैं.
छप्पर फाड़ कहावत सबने बस सुनी हो
मेरे ऊपर छप्पर फटे हैं.

ओ प्रभु ! हे प्रभु !
ये सब कहने में मेरा अहंकार नहीं
आश्चर्य-मिश्रित हर्ष है
मुझ पर तेरे अद्वितीय स्नेह का स्पर्श है.

यह कविता नहीं
सस्वर आत्म-चिंतन है
भावों का उच्छ्वास है
ईश्वर पर आस्था और विश्वास है.

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