Monday, 28 April 2014

तुम Kavita 192

तुम

मैं शरीर नहीं
मैं सिर्फ मन
और उस मन में
सिर्फ तुम ही तुम.

मेरी उम्र नहीं
मेरा रूप नहीं
मेरे भावों में तुम
मेरे अभावों में तुम.

मेरे आँसुओं में तुम
मेरी आहों में तुम
मेरे पास ख़ुशी होती
तो उसमे भी होते तुम.

मैंने जो भी कहा
उस सम्बोधन में तुम
मैंने जो भी सुना
उच्चारित थे तुम.

न होने पर भी दिखाई देते हो तुम
खामोशी में भी सुनाई देते हो तुम
तुम्हारे होने में तो होते ही हो तुम
तुम्हारे न होने पर भी होते हो तुम.

स्मृति में तुम
विस्मृति में तुम
हज़ारों में तुम
प्रार्थनाओं के गलियारो में तुम.

देखूँ तो तुम
बंद आँखों में तुम
भीड़ में तुम
बंद दीवारों में तुम.

मन के अँधेरों में तुम
उम्मीद के उजालों में तुम
जिधर भी देखूँ
बस तुम ही तुम.

Saturday, 26 April 2014

ग़ज़ल 36

ग़ज़ल 36

जो छुपा था दर्द कभी चुप्पी के तहखानों में
गरल बन के निकला वही, अपनों की ज़ुबानों में.

जिसको रक्खा था हिफाज़त से बिठा के शीर्ष पर
यहाँ-वहाँ बिखरा दिखा वह निम्न पायदानों में.

बहुत ऊँचे थे नहीं उड़ने के खयालात कभी
तीर छोड़े जा रहे थे फिर भी आसमानों में.

कटते-कटते कैसे न कटता ख़ुशी का तार यह
कई तलवारें रखी थीं लोगों की मियानों में.

दोस्त किसको मानिए और कौन है दुश्मन यहाँ
कोई नहीं है फर्क इन दोनों के बयानों में.

था अभावों से ग्रसित जो महल जैसा दिखता था
सूखा पड़ा था शहर में, ठनठन थी ख़ज़ानों में.

Friday, 18 April 2014

काँटों का कारोबार Kavita 191

काँटों का कारोबार

फूल एक-एक कर कुम्हलाने लगे
सारा सौन्दर्य दहशत से छुप गया
जब शुरू किया उसने
काँटों का कारोबार
धू-धू कर जलने जगे
मन के दरो-दीवार।

चारों तरफ कैक्टस ही कैक्टस थे
आकार बेशक भिन्न थे
पर एक जैसी पीड़ा
एक जैसी चुभन।
कैक्टस में भी फूल खिलते हैं.
पर वे भी चुभते हैं.

बाग़ों में बहारें न आनी थीं
न आईं
बारिश की फुहारें न छानी थीं
न छाईं।
जलते रहे बचे-खुचे अपनत्व के अंश
डसते रहे स्वप्न-दंश.

कहानी सा लग रहा था सब कुछ
कैसे क्या हुआ, समझ से परे था
जबरन घुस आया था जो
खुद ही निकल गया दरवाज़े तोड़.
अभाव में भी सब्र था
मन अब ज़रा भी न बेसब्र था.

Monday, 7 April 2014

बेवजह Kavita 190

बेवजह

आज उसने मुझे पुकारा
बिना किसी विशेषण के
बदल गया है वह.

न उसकी आवाज़ में थरथराहट
न आँखों में पानी
जैसे सूख गया हो बिना पतझर के.

हँसने को हँसता है
कहता है, खुश है
पर गर्म राख भर गरमाई है.

उजालों में बरसता अँधेरा
शोर में चुप्पियों जैसा
मुरझाने की कोई वजह तो है.

रंगों में रंग प्यार का
सम्बन्ध राग का
उसके बस का नहीं था.

थोड़ी देर का था उसका आना.
जाकर छुप गया वह
सुरक्षित अपने दड़बे में.

बेवजह है मेरा रोना
मुझे शुरू से पता था
वह कभी नहीं मेरा होना.

Sunday, 6 April 2014

रिश्ते की खूबी Kavita 189

रिश्ते की खूबी

रिश्ते में खूबसूरती हो
बस छुपी हुई बदसूरती हो..

कि भीतर सब ख़त्म हो
बाहर निभने की रस्म हो.

कि अंदर ठंडी साँसें हों
बाहर ढकी फाँसें हों.

कि अंदर चकनाचूर हो
बाहर बादस्तूर हो.

कि अंदर चीख-चिल्लाहट हो
बाहर खिलखिलाहट हो.

कि अंदर सूना जंगल हो
बाहर मंगल ही मंगल हो.

कि अंदर पानी छलछल हो
बाहर पानी में कलकल हो.

कि अंदर बुझी अंगारी हों
बाहर दहकती चिंगारी हों.

कि अंदर हाय-हाय हो
बाहर सुखद-सुखाय हो.

कि अंदर भाव-क्रान्ति हो
बाहर पवित्र शान्ति हो.

यह भी रिश्ते की खूबी है
जो नाव किनारे डूबी है.

Thursday, 3 April 2014

मैं हूँ Kavita 188

मैं हूँ

मैं हूँ
क्योंकि तुमने सोचा, मैं हूँ.

मैं हूँ
क्योंकि तुमने चाहा, मैं हूँ.

मैं हूँ
क्योंकि तुमने जाना, मैं हूँ.

तुम न होते
तो मैं अब कहाँ होती?

तुम नहीं थे
तो मैं तब कहाँ थी?

तुम नहीं होंगे
तो मैं तब कहाँ होंगी?

तुम्हारे होने में मेरा होना
तुम्हारे न होने में मेरा न होना.

Wednesday, 2 April 2014

मन मूरख अज्ञानी Kavita 187

मन मूरख अज्ञानी

मन मूरख अज्ञानी.
चार कदम चल के, ऐसे थके, न कोई सानी.

जड़मति होत सुजानी
तैरना न जानें, डूबेंगे अब, सर तक पानी.

अद्भुद खेल खिलानी
शब्दों की माया, वह भी ज्ञानी, यह भी ज्ञानी.

बुद्धि और नादानी.
कौन इसे बाँचे, जीवन की यह अजब कहानी.

अलख निरंजन गानी
ज़िन्दा है क्यों कर, मरते-मरते यह मरजानी.