Saturday, 26 April 2014

ग़ज़ल 36

ग़ज़ल 36

जो छुपा था दर्द कभी चुप्पी के तहखानों में
गरल बन के निकला वही, अपनों की ज़ुबानों में.

जिसको रक्खा था हिफाज़त से बिठा के शीर्ष पर
यहाँ-वहाँ बिखरा दिखा वह निम्न पायदानों में.

बहुत ऊँचे थे नहीं उड़ने के खयालात कभी
तीर छोड़े जा रहे थे फिर भी आसमानों में.

कटते-कटते कैसे न कटता ख़ुशी का तार यह
कई तलवारें रखी थीं लोगों की मियानों में.

दोस्त किसको मानिए और कौन है दुश्मन यहाँ
कोई नहीं है फर्क इन दोनों के बयानों में.

था अभावों से ग्रसित जो महल जैसा दिखता था
सूखा पड़ा था शहर में, ठनठन थी ख़ज़ानों में.

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