Wednesday, 2 April 2014

मन मूरख अज्ञानी Kavita 187

मन मूरख अज्ञानी

मन मूरख अज्ञानी.
चार कदम चल के, ऐसे थके, न कोई सानी.

जड़मति होत सुजानी
तैरना न जानें, डूबेंगे अब, सर तक पानी.

अद्भुद खेल खिलानी
शब्दों की माया, वह भी ज्ञानी, यह भी ज्ञानी.

बुद्धि और नादानी.
कौन इसे बाँचे, जीवन की यह अजब कहानी.

अलख निरंजन गानी
ज़िन्दा है क्यों कर, मरते-मरते यह मरजानी.

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