Friday, 18 April 2014

काँटों का कारोबार Kavita 191

काँटों का कारोबार

फूल एक-एक कर कुम्हलाने लगे
सारा सौन्दर्य दहशत से छुप गया
जब शुरू किया उसने
काँटों का कारोबार
धू-धू कर जलने जगे
मन के दरो-दीवार।

चारों तरफ कैक्टस ही कैक्टस थे
आकार बेशक भिन्न थे
पर एक जैसी पीड़ा
एक जैसी चुभन।
कैक्टस में भी फूल खिलते हैं.
पर वे भी चुभते हैं.

बाग़ों में बहारें न आनी थीं
न आईं
बारिश की फुहारें न छानी थीं
न छाईं।
जलते रहे बचे-खुचे अपनत्व के अंश
डसते रहे स्वप्न-दंश.

कहानी सा लग रहा था सब कुछ
कैसे क्या हुआ, समझ से परे था
जबरन घुस आया था जो
खुद ही निकल गया दरवाज़े तोड़.
अभाव में भी सब्र था
मन अब ज़रा भी न बेसब्र था.

No comments:

Post a Comment