Monday, 7 April 2014

बेवजह Kavita 190

बेवजह

आज उसने मुझे पुकारा
बिना किसी विशेषण के
बदल गया है वह.

न उसकी आवाज़ में थरथराहट
न आँखों में पानी
जैसे सूख गया हो बिना पतझर के.

हँसने को हँसता है
कहता है, खुश है
पर गर्म राख भर गरमाई है.

उजालों में बरसता अँधेरा
शोर में चुप्पियों जैसा
मुरझाने की कोई वजह तो है.

रंगों में रंग प्यार का
सम्बन्ध राग का
उसके बस का नहीं था.

थोड़ी देर का था उसका आना.
जाकर छुप गया वह
सुरक्षित अपने दड़बे में.

बेवजह है मेरा रोना
मुझे शुरू से पता था
वह कभी नहीं मेरा होना.

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