Monday, 28 April 2014

तुम Kavita 192

तुम

मैं शरीर नहीं
मैं सिर्फ मन
और उस मन में
सिर्फ तुम ही तुम.

मेरी उम्र नहीं
मेरा रूप नहीं
मेरे भावों में तुम
मेरे अभावों में तुम.

मेरे आँसुओं में तुम
मेरी आहों में तुम
मेरे पास ख़ुशी होती
तो उसमे भी होते तुम.

मैंने जो भी कहा
उस सम्बोधन में तुम
मैंने जो भी सुना
उच्चारित थे तुम.

न होने पर भी दिखाई देते हो तुम
खामोशी में भी सुनाई देते हो तुम
तुम्हारे होने में तो होते ही हो तुम
तुम्हारे न होने पर भी होते हो तुम.

स्मृति में तुम
विस्मृति में तुम
हज़ारों में तुम
प्रार्थनाओं के गलियारो में तुम.

देखूँ तो तुम
बंद आँखों में तुम
भीड़ में तुम
बंद दीवारों में तुम.

मन के अँधेरों में तुम
उम्मीद के उजालों में तुम
जिधर भी देखूँ
बस तुम ही तुम.

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