Friday, 30 May 2014

कैसा प्यार? Kavita 193

कैसा प्यार?

जब तक अनजान थे
खुश थे
कहर ढा गया
किसी का समझ में आ जाना।
आश्चर्य है
अजनबियत
कैसे अपनेपन के
अहसास से भर देती है
जिज्ञासा आकर्षण की जननी जो है.
जैसे आदमी खुला नहीं
कि उसके भीतर की गन्दगी भी
खुल कर बिखर गई.
आवरण के नीचे क्या है?
यह जिज्ञासा ही तो बाँधे रखती है.
ढके-छुपे का एक तिलिस्म होता है
तिलिस्म को जानने का एक जुनून होता है
जुनून में और-और पास जाने का खिंचाव होता है
खिंचाव से पैदा होता है लगाव का सिलसिला।
वह और पास क्या आया
लगाव का सिलसिला भंग हो गया.
अनजाने में करते थे हम प्यार
अब जान गए तो कैसा प्यार?

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