Sunday, 29 June 2014

कैदियों के हित में

कैदियों के हित में

मैंने जेल में सज़ायाफ्ता कैदियों पर कुछ शोध किए हैं, जिनसे उपजे जिज्ञासा और समाधान, जो मैंने सोचे, प्रस्तुत हैं.

1. जेलों में कैदियों के चरित्र को ऊँचा उठाने के लिए, उनमें अपने गुनाह को स्वीकार करने जैसा प्रायश्चित पैदा करने के लिए तथा सज़ा की अवधि पूरी होने पर बाहर की दुनिया में आकर एक अच्छे नागरिक बनने का प्रण लेने के लिए कुछ शिक्षाप्रद कक्षाएँ चलाने की आवश्यकता है. क्या सरकार की तरफ से यह आदेश देश की समस्त जेलों को भेजा जा सकता है कि वे इस दिशा में सार्थक कदम उठाएँ? किरण बेदी ने ज़रूर कुछ सार्थक कार्य किया है लेकिन पता नहीं, इस दिशा में कुछ किया है या नहीं?

2. जेलों में पुस्तकालय शायद होते ही होंगे, तो उनमें अंग्रेजी और हिन्दी, दोनों भाषाओँ में सद्साहित्य की आपूर्ति होनी चाहिए। कैदियों को पुस्तकें पढ़ने के लिए जागृत करना चाहिए। पुस्तकें पढ़ने के लिए उनका समय निश्चित हो. उनमें आत्मज्ञान जगाना, गुनाह का अहसास एवं प्रायश्चित की भावना जगाना बेहद ज़रूरी है, अन्यथा वे दोबारा या बार-बार गुनाह को अंजाम दे सकते हैं.

3. जेल के अंदर बैठ कर भी अपराधी हर तरह के अपराध करते हैं. पैसों से कोई भी चीज़ खरीदी जा सकती है. जेलों के छोटे-मोटे कर्मचारी ही खरीद लिए जाते हैं जो कैदियों के लिए मादक पदार्थ तक उपलब्ध करवाते हैं. इस गन्दगी से कैसे बचा जाए?

4. जेल में कैदियों से ही काम कराए जाते हैं, जो जिस लायक होता है. पढ़े-लिखे कैदी कंप्यूटर पर काम करते हैं, इस तरह वे अपने व्यक्तिगत हित के लिए भी सारी दुनिया से संपर्क साधे रखते हैं, जिस पर कोई अंकुश लगाना संभव नहीं है. फिर भी क्या इस पर अंकुश लगाया जा सकता है? या लगाया जाना चाहिए?

5. क्यों न जेलों में ऐसा प्रावधान हो कि अपराधी के पकडे जाने के शुरू में उसे बेशक प्रताड़ित किया जाए लेकिन बाद में कैदियों को रोज़मर्रा की आवश्यक सुख-सुविधाएँ दे कर हमेशा के लिए वहीँ रहने दिया जाए? कई साल वहाँ रहते-रहते वे वहाँ के जीवन के अभ्यस्त भी हो जाते हैं और धीरे-धीरे इस समाज के लिए अयोग्य हो जाते हैं. सालों बाद जब वे वापस इस समाज में लौटते हैं तो उन्हें वह आदर-सम्मान नहीं मिलता, जिसकी आवश्यकता और इच्छा एक आम नागरिक को होती है. इसलिए उनका हमेशा के लिए वहाँ रहना ऐसा ही होगा जैसे किसी दूसरे शहर में रहना। और इसमें कोई बुराई नहीं है. क्षमा करें यदि किसी को यह आखिरी बात पसंद न आई हो तो. मेरे कहने का तात्पर्य सिर्फ इतना है कि यदि जेलों में मानवीय व्यवहार हो और तमाम सुख सुविधाएँ हों तो आदमी  ज़िन्दगी आराम से काट सकता है, इस प्रकार उसे बाहरी दुनिया में आकर लोगों की घृणा का सामना भी नहीं करना पड़ेगा और बाहरी दुनिया के लोग भी एक अपराधी के साए से दूर रह सकेंगे। क्योंकि यह दाग धुलता नहीं है. लेकिन जेलों में उनके पुनर्वास के प्रबंध पुख्ता हों.

Saturday, 21 June 2014

या खुदा ! Kavita 199

या खुदा !

हाथ में बियर का मग
आँख में टप-टप आँसू
साथ में बजती बेग़म अख्तर की ग़ज़ल 
या खुदा !
इससे बेहतर वक़्त कौन सा होगा 
खुद से खुद की कहने-सुनने का?

आईना सामने है
लानतों का शब्दकोष खुला है
स्वयं को लांछित करने का दौर शुरू है.

दूसरा कोई नहीं चाहिए लड़ाई के लिए
खुद का युद्ध खुद से है
खुद को खुद से जीतना है
खुद हारता आया है अब तक खुद से.

खुद गलत होते हैं तो
खुद से छुपते फिरते हैं
क्या करें?
आत्मा के जागृत होने का भ्रम जो हैं.

खुली आँखों से सपने देखे थे
यह जुर्म कोई कम था क्या?
सज़ा हर जुर्म की होती है
चाहे छुप के करो.

आँसुओं के धोने से
आत्मा शुद्ध हो शायद।
अंदेशा यह भी है
कि आत्मा होती भी है या नहीं।

Thursday, 19 June 2014

ग़ज़ल 37

ग़ज़ल 37

मुझे देखे बिना वह सो नहीं पाएगा रात भर.
गिनेगा आसमानों में सितारे आज रात भर.

मुझे मालूम है, वह मेरी राह देखता होगा
पढ़ेगा इंतज़ार में पुराने पत्र रात भर.

मेरी आँखों में भी उसके नज़ारे जगमगाते हैं
जलूँगी मैं भी उसकी याद में जागूँगी रात भर.

लड़ाई की नहीं है हद, नहीं है चाह की भी हद
लड़ेंगे बात-बात पर, मनेंगे रात-रात भर.

बहाने जोड़ने के भी, बहाने तोड़ने के भी
करें तो क्या करें, हम जाग कर सोचेंगे रात भर.

नहीं हमको उखाड़ने के लिए आँधियाँ चलीं
हम खुद ही जड़ों से टूट कर रोते हैं रात भर.

हमारे बीच ऐसा कुछ नहीं जिसको छुपाएँ हम
खुली किताब हैं पढ़ने के लिए पढ़ लो रात भर.

जताने के लिए भी ख़ास कुछ रिश्ता बना नहीं
प्यार के नाम से डरते रहे हैं दिन और रात भर.

Monday, 16 June 2014

बातों में तहलके Kavita 198

बातों में तहलके

कभी हँसना
कभी बातें
कभी गुस्से के हिचकोले
बड़े जम-जम के लगते हैं
तुम्हारी याद के झटके।

कि डिब्बे में
तुम्हें मैं
बंद करके रख दूँ कहीं पर
कि जब चाहूँ तुम्हें खोलूँ
नहीं चोरी के कुछ खटके।

दिलों को जीतना
या हारना
सीखे कोई तुमसे
निभाने की कला आती नहीं
बातों में तहलके।

लगाई शर्त
जो मैंने
उसे तुम हार बैठे हो
कि अब बोलो, ना बोलो तुम
तुम्हारे मौन के सदके।

कहूँ अब क्या
कि करूँ क्या
बस इतना जानती हूँ मैं
तुम्हे जब काम पड़ेगा
तभी देखोगे पलट के.

Saturday, 14 June 2014

सुरक्षित वह Kavita 197

सुरक्षित वह

जब वह प्यार करने आया था
साथ में तलवार छुपा कर लाया था.
ज्यों-ज्यों पुचकारता रहा
दिल का एक-एक अंश काटता रहा.

वह बलात्कारी नहीं था पर
बलात्कारी भाव उसकी रग-रग में थे.
विचित्रता की हद तक अपना नाम
मन की भीतरी सतहों पर खोद गया.

दूर रहने का अभिनय करते हुए
घुस आया था हवा की मानिन्द
बरसों से खाली पड़े बंद महल में
रंगों-गंधों को लहराता हुआ.

वह एक महान कलाकार था
उसकी प्रतिभा अपरम्पार थी
हर तरह का चरित्र-चित्रण
खूबसूरती से निभा लेता था.

उम्रदराज़ों को बताता था
अपने मन के बूढ़े होने का राज़
अपाहिजों के साथ लँगड़ा कर चलता था
हर ज़रूरतमंद उसके भाव में विभोर।

सम्मोहित करने की कला में माहिर
दूर खड़ा फुसलाता था
मूर्ति बनने की चाह में उसके पास गया पत्थर
खंडित हो कर वापस आता था.

फूलों से उसे इतना ही प्यार था
कि खुशबु लेता था, फ़ेंक देता था
उसने घर में कभी नहीं सजाए गुलदस्ते
अपने सिर पर नहीं ओढ़ी कोई छत.

अपनी नादानियाँ बिखरा कर जहाँ-तहाँ
वह अभेद्य दीवारों में बंद था
बाहर खड़े चिल्ला रहे थे पीड़ित मौन
वह भीतर के जंजाल में सुरक्षित था.

Wednesday, 11 June 2014

सब है रुहानी Kavita 196

सब है रुहानी

न उसने यहाँ आना, न हमने वहाँ जाना
बेकार ही लिखी गई यह प्रेम कहानी।
अब कौन सी मिसाल दें नाकामयाबी को
कुछ भी नया नहीं है, हर एक बात पुरानी।

सूख गया वह अँधेरे में पड़ा पड़ा 
सूख गई मैं उमर के ताप से घिरी
कौन जलाएगा ये बुझते हुए दीये
न ही वह सयाना, न ही मैं हूँ सयानी।

खोया हुआ है जो जहाँ था वहीँ का वहीँ
मिलने की आस है कि कभी टूटती नहीं
वक़्त का काँटा रुका है एक ही पल पर
देखने को कुछ भी नहीं, सब है रुहानी।

एक खुशबु के सहारे चल रहे हैं हम
साथ में कुछ भी नहीं अहसास के सिवा
जब कोई मंज़िल नहीं तो पहुँचना कहाँ?
ठहरे हुए जल में नहीं है कोई रवानी।

उसको है उम्मीद कि वह जीत जाएगा
मुझको है यह डर कि कहीं हार न जाए
दहशतों के बीच जीना भी कोई जीना
मरती रगों में दौड़ता हर भाव बेमानी।

कितनी अजीब सी है यह राह प्यार की
कुछ भी नहीं निःशंक, निष्कंटक, निरापद
कोशिशें हैं व्यर्थ किसी अर्थ की तलाश की
कविता नहीं बन पाएगी सपाटबयानी।

Friday, 6 June 2014

मुखौटों की संस्कृति Kavita 195

मुखौटों की संस्कृति

देश-कल की दूरियों में धुँधला गया है
सचाई का चेहरा
यूँ सचाई कोई ठोस पदार्थ नहीं
जो रोशनी या अँधेरे से प्रभावित हो
अत्यंत सूक्ष्म कणों में यह बिखरी रहती है
हर झूठ के इर्द-गिर्द
भीतर की ख़ामोशी बार-बार उठती है
करती है शोर.
कहने को बहुत कुछ है
पर लगता है, जैसे कुछ भी नहीं
क्या फर्क पड़ता है
कोई बैठे पास या चला जाए दूर
आवाज़ का चेहरा
ध्वनि की तरंगें
कोलाहल का उत्सव
सब मौन बन कर घुल गया है
मस्त-मगन मन में
श्वेत परतों में लिपटा हुआ स्याह सन्देश 
खाली मन के दरवाज़े पर दस्तक दे रहा है
दिखने को जो दिख रहा है
वह वैसा नहीं है
एक छद्म है छुपा हुआ खिलखिलाहटों के पीछे
मिलावटों के साथ मिलते हैं लोग
मुखौटों की संस्कृति सदैव जीवित है
दूसरे को छोटा करने के लिए
अभिमान की बड़ी-बड़ी लकीरें खींची जाती हैं
मीठी बातें यूँ ही सच नहीं लगतीं
झूठ के रस से सींची जाती हैं।

Tuesday, 3 June 2014

अन्वेषी (कहानी)

अन्वेषी (कहानी : मणिका मोहिनी)

और मैंने खून कर दिया। कैसे किया, याद नहीं। बस, अब वह मेरे सामने मरा पड़ा था और मैं जल्द से जल्द हर उस चिन्ह को समाप्त कर देने की हड़बड़ाहट में थी जो मेरे विरुद्ध कोई सबूत बन सके. एहतियातन मैंने उसके हाथ से दोनों अंगूठियाँ उतारीं और उसकी अलमारी अस्तव्यस्त कर दी ताकि खून का उद्देश्य चोरी या डाका समझा जाए और किसी को शक भी न हो. मुझे लगा, मैं कितनी बड़ी हत्यारन हूँ, जो इस योजनाबद्ध तरीके से उसकी हत्या कर पाई.

मैंने अपनी दोनों हथेलियाँ अपने सामने फैला दीं. मेरी आँखें मेरी हथेलियों पर गड़ गईं. कौन सी है वह रेखा जिसे देख कर एक बार एक नौसिखिये ज्योतिषी ने घबरा कर मुंह फेर लिया था. मेरे बहुत आग्रह करने पर उसने बताया था कि मेरे हाथ की रेखाओं में हत्या के लक्षण हैं.

"मेरी हत्या होने के या मेरे द्वारा हत्या किए जाने के?' मैंने पूछा था तो उसने अस्फुट सा कहा था, 'हत्या सा ही कुछ, हॉरिबल हैण्ड।' और मैं हँस दी थी, 'क्या हत्या शब्द लिखा है यहाँ?'

किसी ने मुझे यहाँ आते नहीं देखा है. फिर देख भी लेता तो जानता-पहचानता नहीं। कितनी तो औरतें आती थीं यहाँ। लड़कियाँ भी, कमसिन, क्वारी। आखिर क्या था उसमें ऐसा?

शुरू-शुरू में वह मुझसे कहा करता था, 'एक बार जो लड़की मुझसे मिलती है, वह कहीं और नहीं जा सकती। मेरे पास आएगी ही, आएगी।'

मैंने मन ही मन उसकी मर्दानगी को नमन किया था लेकिन ऊपर से कहा था, 'छोडो, अपने बारे में बहुत घमंड है तुम्हें।'

'आज़मा लेना, कोई दूसरा कभी ज़िन्दगी में पसंद आ जाए तो हमसे कहना, हम अपना नाम बदल देंगे। औरत को वश में करने की कला में निपुण हैं हम.'

कभी-कभी वह कहता, 'यही कलाकार की नियति है, उसे चाहने वाले किसी भी उम्र में कम नहीं होते। देखो पिकासो को, इकसठ वर्ष के थे, जब बाईस वर्ष की लड़की ने उनसे शादी की. कलाकार की कोई उम्र नहीं होती, वह चिर युवा होता है. और फिर हम तो लेखक हैं, शब्दों के बादशाह, शब्दों से ही लोगों के दिल जीत लेते हैं, मजाल है कि हमारे शब्दों के तीर से कोई घायल हुए बिना रह जाए.'

'शब्दों के नश्तर भी तो चुभो देते हो कभी-कभी. कोई भी अन्य मार इतनी पीड़ा नहीं देती, जितनी तुम्हारे शब्दों की मार.' मैं मान करती तो वह तुरंत मनौवल करता और उसका पुरुष मुझे एकदम निरुत्तर करके छोड़ता। लेकिन ये शुरू-शुरू के दिन थे. एकदम शुरू-शुरू के भी नहीं, उसके और मेरे सम्बन्ध की चरम संतुष्टि के दिन, जब हम संबंधों के प्रौढ़ सुख को झेलते हुए धीरे-धीरे प्रौढ़ हो रहे थे. 

'कभी तो बूढा होना ही है,' एक दिन उसके साथ बिस्तर पर लेटे हुए मैंने बेवजह कहा था. एकदम बेवजह भी नहीं। उसने उसी माह पड़ने वाले मेरे जन्मदिन का ज़िक्र किया तो मेरे मुंह से यही निकल पड़ा.

'अभी बूढ़ा कहाँ? अभी तो तुममें बहुत दम है. अभी तुम कई साल टिकोगी।'

मैं खुश होने को हुई थी कि तभी उसने मेरे कान में फुसफुसा कर कहा था, जब तुम में दम न रहे, तब तुम मेरे लिए कोई और प्रबंध कर देना। करना चाहो, अभी कर दो. भई मुंह का ज़ायका भी तो बदलना चाहिए।'

'क्या?' मैं एकदम चीख कर उससे दूर हट गई थी, 'तुम इस कदर गिरे हुए हो? मुझसे इस कदर गिरी हुई बात करते हो?'

'अरे रे रे, बुरा मान गईं? ज़रा सा मज़ाक भी बर्दाश्त नहीं कर सकतीं? उसने मुझे बाहों में खींच लिया था और इसे मैं सचमुच उसका मज़ाक समझ कर भूल गई थी.

फिर याद नहीं, कहाँ से शुरू हुआ था, मेरा उसके लिए ख़त्म होना या उसका मुझे ख़त्म कर देना। मेरे सामने रह गए थे उसके सात्विकता में ढले उपदेश। मेरा मन मचलता तो वह मन को निग्रह करने के तरीके बताता। मैं रंगीन कपड़ों के लिए ललकती तो वह मुझे सफ़ेद या धुँधले रंगों के कपडे पहनने की सलाह देता। मैं चाट-पकौड़ी खाने के लिए कहती तो वह मिर्च-मसालों से होने वाले नुकसान गिनाने लगता। मैं सिनेमा देखने के लिए कहती तो वह उपदेशात्मक लहज़े में कहता, 'क्या रखा है सिनेमा में?'

'आखिर जीने में ही क्या रखा है?' मैं एक दिन भड़क उठी थी, 'क्या हुआ है तुम्हें? कहाँ तो हर घड़ी मुझमे लगे रहते थे, कहाँ अब हर घडी उपदेश?'

'हर चीज़ की एक उम्र होती है, सुजाता। आखिर हम कभी तो ख़त्म होंगे?' वह तर्क देता जो मुझे कतई पसंद न आता.

'मुझे तो नहीं लगता कि हमारी उम्र अभी से ख़त्म हो गई है. आखिर क्यों हम अभी से साधु-संत बन जाएँ?'

'साधु-संत बनना क्या कोई बुरी बात है? फिर इसके लिए किसी ख़ास उम्र की ज़रुरत नहीं होती।'

'लेकिन लोग तो …'

'लोग दुनियादारी में मरते दम तक लगे रहते हैं. क्या हम समझदार नहीं कि हमें जल्दी ज्ञान प्राप्त हो गया है?'

'ज्ञान? कैसा ज्ञान?'

'यही कि गहरे डूब कर कैसे बाहर आया जाता है? अपने से अतिरिक्त हर दूसरी वस्तु को कैसे बेज़रूरत किया जाता है?'

मैं उसे गौर से सुनती तो उसके चहरे पर संतुष्टि की एक लहर दौड़ जाती कि वह मुझे समझाने की दिशा में सफल हो रहा है. वह आगे कहता, मुझे और विश्वास दिलाता हुआ, 'हर मौसम के अपने रोग होते हैं, इसी प्रकार हर उम्र के अपने प्रलोभन होते हैं. समय और उम्र के साथ आदमी की विचारधारा बदलती है. मुझे लगता है, मेरे बदलने का समय आ गया है. तुम भी बदल जाओ. और फिर मैं तुम्हारा हूँ. तुमसे कहीं भाग थोड़े ही रहा हूँ? बस, हमें अपनी ज़रूरतें बदलनी हैं.'

मैं धीरे-धीरे सफ़ेद वस्त्रों में लिपटी सती-साध्वी देवी सी नज़र आने लगी. मिर्च-मसाले छोड़ कर सादा भोजन बनाने लगी. उसने कहां था, भड़कीले वस्त्र पहनने और तेज़ पदार्थों का सेवन करने से मन चंचल होता है. और मुझे अपने मन को चंचल होने से रोकना था. धीरे-धीरे स्वतः ही मेरा मन हर तरफ से हट गया और मैं गर्वोन्नत महसूस करते हुए यह सोचा करने लगी कि हम आम आदमी से ऊपर उठे हुए लोग हैं क्योंकि हमें सत्य का ज्ञान हो चुका है, हम बूढ़े नहीं हुए हैं, हमारी दिव्य दृष्टि खुल गई है कि मोह में डूबे रहना जीवन की सार्थकता नहीं है, हमने अमर प्रेम के दर्शन कर लिए हैं और अब मुक्ति को शिरोधार्य किया है.

उसने उसी शहर में एक कमरा ले लिया, पढ़ने के लिए, आत्मचिंतन के लिए. मैंने ऐतराज़ नहीं किया। क्यों करती? उसने कहा था, 'घर में भीड़ है, परिवार, रिश्तेदारियां, मेहमान। मुझे खुद से मिलने का समय ही नहीं मिलता। मैं अपने भीतर झांकना चाहता हूँ, अपने से मिलना चाहता हूँ. हम सारी उम्र दूसरों में ही डूबे रहते हैं. कभी झाँका है अपने मन के भीतर किसी ने? मैं आत्मरत हो जाना चाहता हूँ, आत्मलीन, अपने 'मैं' को तलाश करना चाहता हूँ, 'मैं' की तलाश में बाधा मत बनना, सुजाता।'

'कैसी बातें करते हैं आप? आप सिद्धि के चरम शिखर पर जा रहे हैं, और मैं घरेलु, गँवार औरत, क्या आपको इतना भी सहयोग नहीं दे सकती कि आपके रास्ते का अवरोधक न बनूँ? मैं स्वयं धीरे-धीरे आप जैसी हो रही हूँ, मन में सन्यासिनी, वैरागिनी। आपकी अर्धांगिनी हूँ, आपके पाप-पुण्य की सहभागी। महत लक्ष्य में आपको भ्रष्ट कैसे कर सकती हूँ?'

वह धीरे-धीरे मुझसे दूर होता गया था और मैं परिवार की ज़िम्मेदारियों को उठाते हुए मन में दुनियादारी से विरक्त होती गई थी. सबके बीच भी एकदम अकेली, अपने एकांतवास में मस्त, रमी हुई लेकिन पूर्ण सामाजिक भी, सामाजिक धर्म-कर्म में सक्रिय। और जब आप सामाजिक होते हैं तो समाज की बातें भी सुननी पड़ती हैं. पहले लोगों की गुपचुप बातें इधर-उधर से कानों में पड़ती रहीं, जिन्हें मैंने अनसुना कर दिया। धीरे-धीरे लोग साहसी हो गए और मेरे मुंह पर खुली भाषा में बताने काज कि उसके पास आज यह आई थी, कल वह. आज उसके साथ कोई रह रही है, कल कोई. लोग यहाँ तक कहने से भी बाज़ न आए कि 'अजी उसने अलग कमरा लिया ही इसलिए है. पढ़ने का तो बहाना है. पढ़ाई-लिखाई की आड़ में ही तो यह सब चल रहा है.'

मैंने लोगों को तो डाँट कर भगा दिया लेकिन मेरे मन में एक शक जन्म लेने लगा. मैं तरह-तरह से दिल को समझाती।

'लोग उसकी प्रसिद्धि से जलते हैं.'

'इतने बड़े आदमी के पास आखिर मिलने-जुलने वाले तो आएँगे ही. स्त्री हो या पुरुष, क्या अंतर पड़ता है?'

'नहीं … नहीं … वह ऐसा नहीं है. उसने तो मुझे बदल दिया है. जहाँ से मुझे निकाला है, वहाँ क्या खुद डूबेगा?'

'और फिर डूबे तो डूबे। मैं संसार छोड़ चुकी हूँ. मोहमाया का त्याग कर चुकी हूँ. मुझमें अब ईर्ष्या और लगाव जन्म क्यों ले? वह अपने कर्म का खुद जवाबदेह है. मैं जो हर दुःख-मुसीबत में, अपने अकेलेपन में अचल, अडिग रही हूँ, इस बात से क्यों विचलित होऊँ?'

लेकिन मन तो मन है. मैं सांसारिक प्राणी कहाँ इतना आत्मबल जुटा पाई थी अभी तक कि पूर्ण साधुता ग्रहण कर लेती? हर ओर से पूर्ण विरक्त हो जाती? क्रोध, लोभ, मद, मोह में डूबी हुई एक दिन पहुँच गई उसके कमरे के दरवाज़े पर. दरवाज़ा खुला हुआ था. वह कागज़ों को छितराने-समेटने में व्यस्त था. दरवाज़े की ओर उसकी पीठ थी. मैं वापस लौट आई, बिना उससे कुछ कहे, क्षुद्र मनस्थिति को झेलते हुए. अपना छोटा मन लेकर कैसे आँखें मिला पाती? कहाँ वह आत्मखोज, आत्मशोध में लीन सच्चा अन्वेषी, कहाँ मैं तुच्छ सी मानसिकता लेकर चली आई उससे मुकाबला करने? छिः .... मैंने अपने को धिक्कारा और फिर से वैरागी होने के लिए अपने परिवार में लौट आई.

लेकिन यह मुझे क्या हुआ? मैं क्यों हर घड़ी एक अनदेखी आग में जलने लगी? मेरा मन इतना छोटा क्यों है? क्यों शक का सर्प बार-बार फन उठता रहता है? मुझे फिर जाना होगा, बार-बार जाना होगा उसी दरवाज़े पर, जब तक कि वह बंद न मिले और भीतर लोगों की बातों को सच करता हुआ खेल न चल रहा हो. क्या मैं यही चाहती हूँ, उसे झूठा साबित करना? लोगों को सच साबित करना? मेरे लिए लोग बड़े हैं या वह? नहीं, सिर्फ मेरा शक बड़ा है और उस पर नियंत्रण पाने का मेरे पास कोई साधन नहीं है, कोई शक्ति नहीं है.

इसी भावना में उतराते मैंने एक दिन दोपहर में उसका दरवाज़ा भड़भड़ा दिया। दरवाज़ा खुलने में देर क्यों लगी? कुछ देर पश्चात दरवाज़ा खुला। दरवाज़ा उसने नहीं खोला। जिसने खोला, उसके अभूतपूर्व सौंदर्य से मैं ठगी सी रह गई. सुंदरता की प्रतिमा थी वह, संगमरमरी बदन, नीली आँखें, सुगठित शरीर …

'किस से मिलना है?' उसकी मृदुल आवाज़ मेरे कानों में रस घोल गई. सामने दृष्टि गई, वह पलंग पर लेटा हुआ था. मुझे देखते ही अचकचा कर उठ बैठा और सँभलने की कोशिश करते हुए बोला, 'आओ ना, भीतर आओ.'

नीली आँखों वाली ने मेरे लिए रास्ता छोड़ दिया। मैं धीरे-धीरे उसके पलंग तक पहुंची। नीली आँखों वाली दरवाज़ा बंद कर शीघ्रता से आकर पत्नी की तरह उसके पास पलंग पर बैठ गई. मैं पास पड़ी कुर्सी पर बैठी। एक क्षण के लिए जैसे सब गड़बड़ हो गया हो. फिर मैंने संभाला, मैं असली पत्नी जो थी, पति की मर्यादा मुझे ही रखनी थी. जो वह अनबोला हो गया था, उसे उस अनबोलेपन से बाहर निकालना मेरा ही फ़र्ज़ था.

'आप उधर आए नहीं बहुत दिनों से? इन्होने कहलवाया है, कभी आइए.'

'इन्होने?' उसने मुझे सकपका कर देखा। नीली आँखों वाली ने जिज्ञासु दृष्टि मुझ पर डाली। मैंने नीली आँखों में झाँक कर कहा, 'ये मेरे पति के मित्र हैं.' फिर उसकी ओर मुखातिब हुई होठों पर हँसी चिपका कर, 'अरे, परिचय तो कराइए।' मैंने उसे उबारने के लिए कहा था लेकिन इतनी आसानी से वह उबर नहीं पाया।

'मैं आपके लिए चाय लाती हूँ, अभी बनाई है, हम लोग पीने ही लगे थे,' वह बोली।

'नहीं, अभी चलूंगी, आप इनके साथ कभी घर आइए.'

उन दोनों ने मुझे रुकने के लिए आग्रह नहीं किया। मैं चली आई अपना सा मुंह लेकर।

आते ही मैंने उसे पत्र लिखा। पत्र लिखते समय मैं थोड़ी आदर्शवादी हो गई. अपनी ईर्ष्याग्नि को संभाल-संभाल कर ज़ाहिर किया

प्रियतम।

नहीं, नहीं, अब वह प्रियतम नहीं रहा. पहला कागज़ मैंने फाड़ दिया। पुनः लिखा।

प्रिय,
मैं तुम्हारे पास आई थी लेकिन मैंने देखा, अब तुम्हें मेरी सेवा की आवश्यकता नहीं है. अब मैं तुम्हारी ज़रुरत नहीं रही, किसी भी रूप में. यह जान कर मैं स्वयं को हल्का महसूस कर रही हूँ क्योंकि अब तुम्हारे लिए किसी भी रूप में परेशान होने की मेरी ज़रुरत ख़त्म हो गई. अब मुझे तुम्हारा ख्याल नहीं रखना। तुम्हारे विषय में नहीं सोचना। तुम्हें लेकर कोई स्वप्न नहीं देखना। मैं मुक्त हुई. किसी को प्यार करना बेहद यातनापूर्ण होता है. आज मुझे इस यातना से छुटकारा मिल गया. तुम्हारे बारे में बहुत सुना था, आज अपनी आँखों से देख लिया। मैं आश्चर्यचकित हूँ कि तुम आज भी दुनियावी चीज़ों में रमे हुए हो. तुम इस सबसे ऊबे नहीं। ज़िन्दगी को पूर्ण जीकर भी अभी तुममें इच्छाएं शेष हैं. तुम अभी भी भौतिक सुखों के पीछे भाग रहे हो. औरत अभी भी तुम्हारी कमज़ोरी है. आखिर इस यात्रा का कभी तो कोई अंत होना चाहिए? मुझे हर चीज़ की, हर सम्बन्ध की निरर्थकता का अहसास हो चुका है. लेकिन तुम अभी भी आखिर कौन से सुख की तलाश में भटक रहे हो? मुझे सात्विकता की ओर मोड़ कर तुम स्वयं कामुकता में डूबे रहे. मुझे इतनी नसीहतें और उपदेश क्या सिर्फ अपने रास्ते से हटाने के लिए दिए थे? तुम निश्चिन्त रहो. आज तुम्हारा असली रूप सामने आ जाने से मैं पूरी तरह तुम्हारे रास्ते से हट गई हूँ. तुम भोग-विलास में डूबे रहो, मैं अर्थ की तलाश में जा रही हूँ, सबसे दूर, अब मुझसे कभी न मिलना।
सुजाता

लेकिन मैं कहाँ जा सकी? उस पर अपने पत्र की प्रतिक्रिया देखने जितना भी सब्र मुझमे नहीं था. और मैं पुनः उसके कमरे में आई और उसकी हत्या कर दी.

कितनी आसानी से यह काम हो गया और कहीं कोई सबूत नहीं है. किसी भी हालत में मेरे खिलाफ तो नहीं। इस आदमी का मरना ही तय था, वह भी मेरे हाथों। जैसे बरसों के सुलगते अलाव पर आज घड़ों पानी पड़ गया हो. हाँ, मेरे मन की आग शांत हो चुकी थी. मैंने अपने मन के भीतर सुलगते हुए बवंडर को आज सुला दिया था पूरो तरह. अब मैं आराम से ज़िन्दगी के शेष दिन गुज़ार सकती हूँ अकेले।

मैं कमरे से निकलने के लिए दरवाज़े की ओर बढ़ी. बीच में यह क्या चीज़ पड़ी थी? मैं टकरा कर धम्म से गिर पड़ी. अरे, यह तो वही था जिसकी मैंने अभी-अभी हत्या की थी. वह मरने के बाद भी मेरी राह का रोड़ा बना हुआ था. मैंने उसे ठोकर मारी और किसी तरह वहाँ से भाग निकली और चैन की साँस ली.

अगला दिन होते-होते हंगामा मच गया लेकिन मैं यह जान कर हैरान रह गई कि उसकी हत्या हत्या नहीं समझी गई, ख़ुदकुशी मान ली गई. चलो, जो हुआ, ठीक हुआ. अखबारों में उसके नाम के चर्चे हुए, वह साहित्य का कितना बड़ा प्रणेता था, यह उसके मरने के बाद लोगों को पता चला. वही साहसी लोग, जो उसके काले कारनामे मुझ तक पहुँचाया करते थे, उसके लिए शोक सभाएं करने लगे. नीली आँखों वाली अनेक लड़कियाँ उसके साथ अपना नाम जुड़वाने के लिए सहर्ष तैयार हो गईं. वह आम आदमी नहीं था, इसलिए आम आदमी का जीवन उसने नहीं जिया। उसकी हर ऐयाशी उसके पक्ष में गई क्योंकि वह आम आदमी नहीं था, आम आदमी से ऊपर उठा हुआ कलाकार था.

मेरे पास लोग इंटरव्यू के लिए आए. 'उसकी साहित्य साधना में उसकी पत्नी का महान योगदान था,' हर समाचार पत्र-पत्रिका ने छापा, 'वह पति के साथ सती तो नहीं हो सकी लेकिन सती से भी ज़्यादा कठोर धर्म का पालन कर रही है. सती एक बार जलती है, वह पति की मृत्यु के गम में रोज़ जल रही है. उसने वैराग्य धारण कर लिया है, वह साध्वी हो गई है, पति सत्य की खोज में परलोक सिधार गया है, वह सत्य की खोज यहीं कर रही है.'

मैं इस सारे प्रपंच को देखती रही और एक दिन श्वेत-धवल वस्त्र धारण कर जंगलों की ओर भाग चली. जो लोगों को नहीं पता, वह मुझे पता था, जिसका सामना करने के लिए मुझे नितांत अकेलेपन की ज़रुरत थी.

Monday, 2 June 2014

प्रार्थनाओं में उठे हाथ Kavita 194

प्रार्थनाओं में उठे हाथ

मैं इतनी आसान नहीं
जिसे तुम आसानी से.भुला सको.
न ही तुम इतने आसान।

खुदी हुई हूँ तुम्हारे ह्रदय पटल पर
पत्थर पर लकीर की तरह.
जैसे तुम मेरे ह्रदय-पटल पर.

करिश्मे चल रहे हैं साथ-साथ.
फिर भी कैसा दुर्योग
न तुम समझ रहे, न मैं.

मैं खुली हुई हूँ शोर में
तुम बँधे हुए हो मौन में
अँधेरा है घुप रोशनी के बीच.

एक नई शुरुआत की कोशिश में हो तुम
एक नए बदलाव की उम्मीद में हूँ मैं
प्रार्थनाओं में उठे हैं हाथ.