Sunday, 29 June 2014

कैदियों के हित में

कैदियों के हित में

मैंने जेल में सज़ायाफ्ता कैदियों पर कुछ शोध किए हैं, जिनसे उपजे जिज्ञासा और समाधान, जो मैंने सोचे, प्रस्तुत हैं.

1. जेलों में कैदियों के चरित्र को ऊँचा उठाने के लिए, उनमें अपने गुनाह को स्वीकार करने जैसा प्रायश्चित पैदा करने के लिए तथा सज़ा की अवधि पूरी होने पर बाहर की दुनिया में आकर एक अच्छे नागरिक बनने का प्रण लेने के लिए कुछ शिक्षाप्रद कक्षाएँ चलाने की आवश्यकता है. क्या सरकार की तरफ से यह आदेश देश की समस्त जेलों को भेजा जा सकता है कि वे इस दिशा में सार्थक कदम उठाएँ? किरण बेदी ने ज़रूर कुछ सार्थक कार्य किया है लेकिन पता नहीं, इस दिशा में कुछ किया है या नहीं?

2. जेलों में पुस्तकालय शायद होते ही होंगे, तो उनमें अंग्रेजी और हिन्दी, दोनों भाषाओँ में सद्साहित्य की आपूर्ति होनी चाहिए। कैदियों को पुस्तकें पढ़ने के लिए जागृत करना चाहिए। पुस्तकें पढ़ने के लिए उनका समय निश्चित हो. उनमें आत्मज्ञान जगाना, गुनाह का अहसास एवं प्रायश्चित की भावना जगाना बेहद ज़रूरी है, अन्यथा वे दोबारा या बार-बार गुनाह को अंजाम दे सकते हैं.

3. जेल के अंदर बैठ कर भी अपराधी हर तरह के अपराध करते हैं. पैसों से कोई भी चीज़ खरीदी जा सकती है. जेलों के छोटे-मोटे कर्मचारी ही खरीद लिए जाते हैं जो कैदियों के लिए मादक पदार्थ तक उपलब्ध करवाते हैं. इस गन्दगी से कैसे बचा जाए?

4. जेल में कैदियों से ही काम कराए जाते हैं, जो जिस लायक होता है. पढ़े-लिखे कैदी कंप्यूटर पर काम करते हैं, इस तरह वे अपने व्यक्तिगत हित के लिए भी सारी दुनिया से संपर्क साधे रखते हैं, जिस पर कोई अंकुश लगाना संभव नहीं है. फिर भी क्या इस पर अंकुश लगाया जा सकता है? या लगाया जाना चाहिए?

5. क्यों न जेलों में ऐसा प्रावधान हो कि अपराधी के पकडे जाने के शुरू में उसे बेशक प्रताड़ित किया जाए लेकिन बाद में कैदियों को रोज़मर्रा की आवश्यक सुख-सुविधाएँ दे कर हमेशा के लिए वहीँ रहने दिया जाए? कई साल वहाँ रहते-रहते वे वहाँ के जीवन के अभ्यस्त भी हो जाते हैं और धीरे-धीरे इस समाज के लिए अयोग्य हो जाते हैं. सालों बाद जब वे वापस इस समाज में लौटते हैं तो उन्हें वह आदर-सम्मान नहीं मिलता, जिसकी आवश्यकता और इच्छा एक आम नागरिक को होती है. इसलिए उनका हमेशा के लिए वहाँ रहना ऐसा ही होगा जैसे किसी दूसरे शहर में रहना। और इसमें कोई बुराई नहीं है. क्षमा करें यदि किसी को यह आखिरी बात पसंद न आई हो तो. मेरे कहने का तात्पर्य सिर्फ इतना है कि यदि जेलों में मानवीय व्यवहार हो और तमाम सुख सुविधाएँ हों तो आदमी  ज़िन्दगी आराम से काट सकता है, इस प्रकार उसे बाहरी दुनिया में आकर लोगों की घृणा का सामना भी नहीं करना पड़ेगा और बाहरी दुनिया के लोग भी एक अपराधी के साए से दूर रह सकेंगे। क्योंकि यह दाग धुलता नहीं है. लेकिन जेलों में उनके पुनर्वास के प्रबंध पुख्ता हों.

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