Thursday, 19 June 2014

ग़ज़ल 37

ग़ज़ल 37

मुझे देखे बिना वह सो नहीं पाएगा रात भर.
गिनेगा आसमानों में सितारे आज रात भर.

मुझे मालूम है, वह मेरी राह देखता होगा
पढ़ेगा इंतज़ार में पुराने पत्र रात भर.

मेरी आँखों में भी उसके नज़ारे जगमगाते हैं
जलूँगी मैं भी उसकी याद में जागूँगी रात भर.

लड़ाई की नहीं है हद, नहीं है चाह की भी हद
लड़ेंगे बात-बात पर, मनेंगे रात-रात भर.

बहाने जोड़ने के भी, बहाने तोड़ने के भी
करें तो क्या करें, हम जाग कर सोचेंगे रात भर.

नहीं हमको उखाड़ने के लिए आँधियाँ चलीं
हम खुद ही जड़ों से टूट कर रोते हैं रात भर.

हमारे बीच ऐसा कुछ नहीं जिसको छुपाएँ हम
खुली किताब हैं पढ़ने के लिए पढ़ लो रात भर.

जताने के लिए भी ख़ास कुछ रिश्ता बना नहीं
प्यार के नाम से डरते रहे हैं दिन और रात भर.

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