Monday, 2 June 2014

प्रार्थनाओं में उठे हाथ Kavita 194

प्रार्थनाओं में उठे हाथ

मैं इतनी आसान नहीं
जिसे तुम आसानी से.भुला सको.
न ही तुम इतने आसान।

खुदी हुई हूँ तुम्हारे ह्रदय पटल पर
पत्थर पर लकीर की तरह.
जैसे तुम मेरे ह्रदय-पटल पर.

करिश्मे चल रहे हैं साथ-साथ.
फिर भी कैसा दुर्योग
न तुम समझ रहे, न मैं.

मैं खुली हुई हूँ शोर में
तुम बँधे हुए हो मौन में
अँधेरा है घुप रोशनी के बीच.

एक नई शुरुआत की कोशिश में हो तुम
एक नए बदलाव की उम्मीद में हूँ मैं
प्रार्थनाओं में उठे हैं हाथ.

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