Friday, 6 June 2014

मुखौटों की संस्कृति Kavita 195

मुखौटों की संस्कृति

देश-कल की दूरियों में धुँधला गया है
सचाई का चेहरा
यूँ सचाई कोई ठोस पदार्थ नहीं
जो रोशनी या अँधेरे से प्रभावित हो
अत्यंत सूक्ष्म कणों में यह बिखरी रहती है
हर झूठ के इर्द-गिर्द
भीतर की ख़ामोशी बार-बार उठती है
करती है शोर.
कहने को बहुत कुछ है
पर लगता है, जैसे कुछ भी नहीं
क्या फर्क पड़ता है
कोई बैठे पास या चला जाए दूर
आवाज़ का चेहरा
ध्वनि की तरंगें
कोलाहल का उत्सव
सब मौन बन कर घुल गया है
मस्त-मगन मन में
श्वेत परतों में लिपटा हुआ स्याह सन्देश 
खाली मन के दरवाज़े पर दस्तक दे रहा है
दिखने को जो दिख रहा है
वह वैसा नहीं है
एक छद्म है छुपा हुआ खिलखिलाहटों के पीछे
मिलावटों के साथ मिलते हैं लोग
मुखौटों की संस्कृति सदैव जीवित है
दूसरे को छोटा करने के लिए
अभिमान की बड़ी-बड़ी लकीरें खींची जाती हैं
मीठी बातें यूँ ही सच नहीं लगतीं
झूठ के रस से सींची जाती हैं।

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