Wednesday, 11 June 2014

सब है रुहानी Kavita 196

सब है रुहानी

न उसने यहाँ आना, न हमने वहाँ जाना
बेकार ही लिखी गई यह प्रेम कहानी।
अब कौन सी मिसाल दें नाकामयाबी को
कुछ भी नया नहीं है, हर एक बात पुरानी।

सूख गया वह अँधेरे में पड़ा पड़ा 
सूख गई मैं उमर के ताप से घिरी
कौन जलाएगा ये बुझते हुए दीये
न ही वह सयाना, न ही मैं हूँ सयानी।

खोया हुआ है जो जहाँ था वहीँ का वहीँ
मिलने की आस है कि कभी टूटती नहीं
वक़्त का काँटा रुका है एक ही पल पर
देखने को कुछ भी नहीं, सब है रुहानी।

एक खुशबु के सहारे चल रहे हैं हम
साथ में कुछ भी नहीं अहसास के सिवा
जब कोई मंज़िल नहीं तो पहुँचना कहाँ?
ठहरे हुए जल में नहीं है कोई रवानी।

उसको है उम्मीद कि वह जीत जाएगा
मुझको है यह डर कि कहीं हार न जाए
दहशतों के बीच जीना भी कोई जीना
मरती रगों में दौड़ता हर भाव बेमानी।

कितनी अजीब सी है यह राह प्यार की
कुछ भी नहीं निःशंक, निष्कंटक, निरापद
कोशिशें हैं व्यर्थ किसी अर्थ की तलाश की
कविता नहीं बन पाएगी सपाटबयानी।

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