Saturday, 14 June 2014

सुरक्षित वह Kavita 197

सुरक्षित वह

जब वह प्यार करने आया था
साथ में तलवार छुपा कर लाया था.
ज्यों-ज्यों पुचकारता रहा
दिल का एक-एक अंश काटता रहा.

वह बलात्कारी नहीं था पर
बलात्कारी भाव उसकी रग-रग में थे.
विचित्रता की हद तक अपना नाम
मन की भीतरी सतहों पर खोद गया.

दूर रहने का अभिनय करते हुए
घुस आया था हवा की मानिन्द
बरसों से खाली पड़े बंद महल में
रंगों-गंधों को लहराता हुआ.

वह एक महान कलाकार था
उसकी प्रतिभा अपरम्पार थी
हर तरह का चरित्र-चित्रण
खूबसूरती से निभा लेता था.

उम्रदराज़ों को बताता था
अपने मन के बूढ़े होने का राज़
अपाहिजों के साथ लँगड़ा कर चलता था
हर ज़रूरतमंद उसके भाव में विभोर।

सम्मोहित करने की कला में माहिर
दूर खड़ा फुसलाता था
मूर्ति बनने की चाह में उसके पास गया पत्थर
खंडित हो कर वापस आता था.

फूलों से उसे इतना ही प्यार था
कि खुशबु लेता था, फ़ेंक देता था
उसने घर में कभी नहीं सजाए गुलदस्ते
अपने सिर पर नहीं ओढ़ी कोई छत.

अपनी नादानियाँ बिखरा कर जहाँ-तहाँ
वह अभेद्य दीवारों में बंद था
बाहर खड़े चिल्ला रहे थे पीड़ित मौन
वह भीतर के जंजाल में सुरक्षित था.

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