Monday, 16 June 2014

बातों में तहलके Kavita 198

बातों में तहलके

कभी हँसना
कभी बातें
कभी गुस्से के हिचकोले
बड़े जम-जम के लगते हैं
तुम्हारी याद के झटके।

कि डिब्बे में
तुम्हें मैं
बंद करके रख दूँ कहीं पर
कि जब चाहूँ तुम्हें खोलूँ
नहीं चोरी के कुछ खटके।

दिलों को जीतना
या हारना
सीखे कोई तुमसे
निभाने की कला आती नहीं
बातों में तहलके।

लगाई शर्त
जो मैंने
उसे तुम हार बैठे हो
कि अब बोलो, ना बोलो तुम
तुम्हारे मौन के सदके।

कहूँ अब क्या
कि करूँ क्या
बस इतना जानती हूँ मैं
तुम्हे जब काम पड़ेगा
तभी देखोगे पलट के.

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