Saturday, 21 June 2014

या खुदा ! Kavita 199

या खुदा !

हाथ में बियर का मग
आँख में टप-टप आँसू
साथ में बजती बेग़म अख्तर की ग़ज़ल 
या खुदा !
इससे बेहतर वक़्त कौन सा होगा 
खुद से खुद की कहने-सुनने का?

आईना सामने है
लानतों का शब्दकोष खुला है
स्वयं को लांछित करने का दौर शुरू है.

दूसरा कोई नहीं चाहिए लड़ाई के लिए
खुद का युद्ध खुद से है
खुद को खुद से जीतना है
खुद हारता आया है अब तक खुद से.

खुद गलत होते हैं तो
खुद से छुपते फिरते हैं
क्या करें?
आत्मा के जागृत होने का भ्रम जो हैं.

खुली आँखों से सपने देखे थे
यह जुर्म कोई कम था क्या?
सज़ा हर जुर्म की होती है
चाहे छुप के करो.

आँसुओं के धोने से
आत्मा शुद्ध हो शायद।
अंदेशा यह भी है
कि आत्मा होती भी है या नहीं।

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