Sunday, 27 July 2014

ग़ज़ल 38

ग़ज़ल 38

उसको अपनी सोच पर, फ़िज़ूल का अभिमान
लिख कर दिखाए मुझसे, बढ़िया कोई कलाम.

वह जाना चाहता है तो जाए बड़े शौक से
मिटा कर दिखाए, मेरे दिल से अपना नाम.

अपराध-पर-अपराध, किए जा रहा था वह
इतनी समझ नहीं थी, जो सोचता परिणाम.

कि उसके इरादों में, बुलंदी ही बुलंदी
सारी दुनिया उसकी, दंड-भेद-साम-दाम.

बहुत से भ्रम साफ़ हो जाते हैं खुद-ब-खुद
कामनाएँ स्वतः हो जाती हैं निष्काम.

मेरी हर कहानी में, ज़िक्र होगा उसका
हिम्मत है तो सच को, झुठलाए सरेआम.

वह नहीं बस उसकी छवि है मेरे ख्याल में
कविता की भीड़ में, हर कविता उसके नाम.

Thursday, 24 July 2014

कमाल है Kavita 204

कमाल है

वह आया और सब तहस-नहस कर गया
कमाल है
फिर भी उसने मुझे आँधी और तूफ़ान कहा.

क्या बात उसके धौंस और धमाकों की
कमाल है
हक़ ऐसा कि जैसे सब उसकी जायदाद रहा.

तेवर ऐसे ज्यों क़त्ल कर देगा अभी 
कमाल है
बातों में उसकी किरचें शब्दों में खून बहा.

सोचा था उसके आने से आएगी बहार
कमाल है
हवा का झोंका भी आया जैसे बदबू में नहा,

किताबों में पढ़ी थीं ईमान की बातें
कमाल है
सिर्फ वफादार दिखने को मैंने इतना सहा.

Wednesday, 23 July 2014

मेरा पुत्र, मेरा मित्र

मेरा पुत्र, मेरा मित्र

कभी मैंने उसे राह दिखाई, कभी उसने मुझे राह दिखाई। मुझे गर्व है कि मैंने अपने पुत्र को एक अच्छा इंसान बनाया। समय-समय पर उसका उचित मार्गदर्शन किया। कुछ उसकी अपनी बुद्धिमत्ता थी कि उसे दस-बारह साल की उम्र से ही अच्छाई-बुराई, सही-गलत का ज्ञान हो गया. जैसे जैसे वह बड़ा होता गया, मुझे भी अपने ज्ञान से और समृद्ध करता गया. मैं सोचती हूँ, यदि किसी के जीवन में कोई आदर्श है, तो वह दुनिया से अवश्य बाँटे ताकि उस आदर्श से कोई दूसरा कुछ सीखना चाहे तो सीख सके. मैं आपके साथ अपना यह अनुभव अवश्य बाँटूँगी।

मैंने उसकी छह साल की उम्र में उसे समझाया कि जानबूझ कर परेशानियों को आमंत्रित नहीं करना है. यानि 'आ बैल मुझे मार' से दूर रहो. आज भी उसे पचड़े पसंद नहीं। उसे एक सीधी-सादी, तनावमुक्त ज़िन्दगी जीना पसंद है.

मैंने उसे बताया कि दोस्ती हमेशा बुद्धिमान लोगों से करो, मूर्ख लोग कितने भी अपने हों, उनसे अंततः परेशानी मिलती है. An intelligent enemy is better than a foolish friend. (We both practice this in our lives.)

मैंने उसे बताया कि इंसान अपने मित्रों से पहचाना जाता है, जैसे तुम्हारे मित्र होंगे, वैसे ही तुम समझे जाओगे, इसलिए भले मित्र बनाना। आज भी उसके चुनींदा मित्र हैं.

उसकी दस वर्ष की उम्र में मैंने उसे यह समझाया, हॉस्टल में किसी के भी कहने पर अपनी नेकर मत उतारना। (डर सिर्फ लड़कियों के लिए नहीं, लड़कों के लिए भी होता है।)

एक ज्ञान मैंने उसकी सत्रह वर्ष की उम्र में उसे यह दिया कि जिस तरह हर उम्र के अपने रोग होते हैं, उसी तरह हर उम्र की अपनी इच्छाएँ और ज़रूरतें होती हैं. उम्र से पहले कोई ऐसा काम न करना जो उस उम्र को शोभा न देता हो. उसने कभी ऐसा नहीं किया जिसके लिए मुझे शर्मिंदा होना पड़ा हो.

एक बार मैंने उसके हॉस्टल के कमरे में उसके रूममेट की मेज़ पर बियर की बॉटल देखी तो उससे कहा था, 'कोई भी शौक, जब खुद कमाने लगो, तब पालना, मेरे बल पर नहीं।' उसने मेरी हर बात पर अमल किया। He said, 'Don't worry Mom, I don't drink, I don't smoke.'  उसके बाद इतनी बड़ी-बड़ी नौकरियाँ हो गईं, वह रुतबा-रुआब हो गया कि ड्रिंक्स ओहदे और हैसियत का प्रतीक बन गया.

मैंने उसकी छह-सात साल की उम्र से उसे समझाना शुरू किया था कि नीति क्या होती है और अनीति क्या होती है? नीति यह कि अपने लिए ख़ुशी चुनो लेकिन दूसरे का दिल दुखा कर नहीं। अनीति यह कि चाहे कुछ भी हो, मुझे यह चाहिए ही चाहिए, जोकि गलत है.

एक ज्ञान मैंने उसे दिया कि जीवन में कभी झूठ मत बोलो। यदि कभी बोलना ही पड़ जाए तो ऐसे बोलो कि तुम्हारा झूठ पकड़ा न जाए. सच है कि आज तक मेरे या किसी के भी सामने उसका कोई झूठ नहीं आया.

मैंने उसे समझाया था कि सुन्दर, सुशील, योग्य लड़कों पर बहुत लड़कियाँ फ़िदा होती हैं, फिर यह उम्र ऐसी होती है कि कदम-कदम पर लगता है कि प्यार हुआ, प्यार हुआ, तो पुत्र, किसी भी लड़की से कमिट मत करना, Dont hang with any girl, किसी लड़की से कोई वादा नहीं करना, वर्ना यदि निभा नहीं पाए तो उसका दिल टूटेगा और तुम्हें उसकी बद्दुआएँ मिलेंगी। जीवन साथी चुनने का निर्णय बुद्धि से करना, दिल से नहीं।

एक ज्ञान मैंने उसे यह दिया कि कभी किसी लड़की के साथ पहल मत करना, Let the girl take initiative. हाँ, यदि कोई महिला तुमसे प्यार माँगे तो उसे इंकार मत करना, but make it sure that she should not take it as your commitment, she should not take you for granted. क्योंकि ज़िन्दगी बहुत बड़ी है, ऐसे मौके हज़ार आएँगे, आप हरेक के साथ बँध नहीं सकते, पर यदि कोई औरत खुद पहल करके तुमसे प्यार की याचना करे तो must oblige her. (मुझे पता है, आप लोगों को मेरा यह ज्ञान पसंद नहीं आएगा, But Friends, be practical, these are the facts of life, we can not deny it.)

मैंने उसे कहीं भी ज़बरदस्ती बँध कर रहने की सलाह नहीं दी इसलिए मैंने उसे यह नहीं समझाया कि शादी एक ही बार होती है, बल्कि यह समझाया, 'देखो, पहली शादी परफेक्ट लड़की से होनी चाहिए। समझौते दूसरी-तीसरी शादियों में होते हैं, इसलिए एकदम तुम्हारे मुकाबले की ए-वन लड़की ढूँढेंगे।' वह खुद ढूँढ लाया। ए-वन परफेक्ट लड़की। (लोग इस बात से मुझे गलत कह सकते हैं लेकिन मैं व्यवहारिक होने के नाते जानती थी कि ज़माना किस रफ़्तार से बदल रहां है. व्यर्थ की लल्लो-चप्पो में मेरा विश्वास नहीं।)

मैंने उसे समझाया, अपनी समस्याएँ खुद हल करनी सीखो, कभी बाहर का कोई झगड़ा लेकर घर मत आना. उसके जीवन में शायद कभी उलझनें आई हों, मेरे जीवन में कितनी उलझनें आई होंगी, हमने घर में एक-दूसरे से बात तो की लेकिन कभी यह नहीं कहा कि चलो, तुम फलाँ से यह बात करो, फलाँ को यह समझाओ आदि. हमारे जीवन के कोई भी झगड़े, जिसे हम तमाशे कहते हैं, सुलझाने के लिए हम कभी एक-दूसरे के बीच में नहीं बोले। तू अपनी जान, मैं अपनी जानूँ।

अब आगे वो जो मेरे पुत्र-मित्र ने मुझे ज्ञान दिया।

अपनी छह-सात साल की उम्र में उसने मुझसे कहा, 'मॉम, मैं बड़ा होकर आपसे प्यार करूँगा।' (अपनी बाल-बुद्धि से सोचा होगा, शायद माँ को किसी 'बड़े' के प्यार की ज़रुरत है) और निभा कर दिखाया।

अपनी नौ-दस वर्ष की उम्र में उसने मुझे समझाया, 'मैं जल्दी पढ़ाई ख़त्म करके आपके पास आ जाऊँगा। मेरे पीछे से रोना नहीं।' हर बार जब भी मुझे रोना आता था, उसकी यह बात याद कर के हँस पड़ती थी. मेरा अकेलापन सिर्फ वह समझ पाया था, अन्य कोई नहीं।

अपनी सत्रह वर्ष की उम्र में उसने मुझे यह ज्ञान दिया कि जीवन में जो भी निर्णय लो, सोच समझ कर लो, और एक बार जो निर्णय ले लो, उस पर टिके रहो, चाहे जो भी हो, ताकि यदि तुम्हें अपने निर्णय द्वारा पछताना भी पड़े तो कम से कम आगे तो सही निर्णय करोगे।

हॉस्टल की पढ़ाई ख़त्म हुई तो आखिरी माँग, 'मॉम, मैं क्या करूँ, मैंने कुछ फ्रेंड्स से उधार लिए हुए हैं, प्लीज मुझे एक हज़ार रुपये भेज दो, मैं नौकरी करके आपको वापस दे दूँगा।' मैं बहुत दुखी कि लड़का बिगड़ गया है. संयोग से मैं उन दिनों जवाहर लाल नेहरू की आत्मकथा पढ़ रही थी, उन्होंने लिखा था कि अपने हॉस्टल के दिनों में वे फ्रेंड्स से उधार लिया करते थे, जो हॉस्टल छोड़ते समय उन्हें शर्मिन्दा होकर अपने घर से मँगाने पड़े थे. मुझे यह पढ़ कर तसल्ली हुई थी. मैंने पुत्र को हज़ार रुपये भेज दिए थे. (उसने एक हज़ार क्या, अब तक मुझे इतना दिया, जिसकी कोई मिसाल नहीं है.)

बड़े ख्वाब थे अमीर बनने के. अक्सर कहा करता था, 'I want to earn a lot of money. I want to be very rich.' मैंने कहा, 'क्या करेगा इतने पैसे का? पैसे से करप्शन आता है.' तो बोला, 'नहीं, मॉम, पैसे से चैरिटी भी आती है.' It was a great thought. उसका यह ख्वाब पूरा हो गया.

जब वह अभी बड़ा हो रहा था तो हम विदेश में थे, लेट नाइट पार्टीज, रात-रात भर डिस्को, दो लड़के इसके दोस्त थे जिनके साथ हर बार अलग लड़की हुआ करती थी. एक दिन मुझसे बोला, 'मॉम, पता नहीं, क्या मज़ा आता है, न जान, न पहचान, ख़ास फ्रेंड भी नहीं है, फिर भी ये लोग उन पर इतने पैसे क्यों खर्च करते हैं? कोई ख़ास फ्रेंड हो तो उसके साथ जाने में और बात है.' He had a pure and uncorrupted mind. कोई अनैतिक बात आज भी उसके दिमाग में नहीं आती।

मेंरे दोस्त-सहेलियाँ, सगे-सम्बन्धी, सब कहा करते थे, आजकल लड़कों का कोई भरोसा नहीं, इधर शादी हुई, उधर नज़रें बदलीं, अपने को mentally prepared रखो शादी के बाद बेटे को खोने के लिए. बेटा ये बातें सुनता तो कहा करता था, 'मॉम, अगर ऐसा होता है तो लोग शादी ही क्यों करते हैं?' विवाह के लिए शुरू में जो एकाध लड़की देखी तो उसने उनसे सबसे पहली बात यही की, 'देखो, अगर कभी ऐसी नौबत आई तो घर छोड़ कर अकेली तुम जाओगी, मैं तुम्हारे साथ नहीं जाऊँगा।'

हम विदेश में जहाँ थे, वहाँ लन्दन और यूएसए गुज़र कर जाया जाता था. कनाडा भी समीप था। मेरे कुलीग कहा करते थे, 'यहाँ तक आकर कोई इंजीनियर लड़का वापस भारत नहीं लौटता। तुम अपने बेटे को यहीं कहीं रहने देना, उसकी ज़िन्दगी बन जाएगी।' मैं कहती, 'नहीं, में अपने देश में ही रहना चाहती हूँ, और बॉबी मेरे साथ ही रहेगा।' तो कहते, 'कैसी माँ हो तुम, अपने बेटे की तरक्की में बाधा बनोगी?' मैंने बेटे से कहा, 'दुनिया में दो चीज़ें हैं, पैसा और प्यार। तो प्यार के लिए हमारे पास कौन है? मेरे लिए तुम, तुम्हारे लिए मैं. तो बेटा, पैसा थोड़ा भी हो, गुज़ारा कर लेंगे लेकिन एक परदेस में तुम्हें सच्चा प्यार कहाँ से मिलेगा? और फिर, जो पढ़ाई की है, उसका उपयोग अपने देश के लिए करो.' बोला, 'मॉम, मैं अपने देश में ही रहूंगा।' अब कहता है, 'जितने ठाठ-बाट से हम यहाँ रह रहे हैं, अपने देश में, अमेरिका में नहीं रह पाते।'

आप में से कुछ यह ज़रूर कहेंगे कि मैंने अपने पुत्र को बिगाड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ी, फिर भी मित्रों, वह बिगड़ा नहीं। जिसे बिगड़ना कहते हैं, यानि झूठ, छल-फरेब, बेईमानी, लालच, स्वार्थ, धोखाधड़ी, अनाचार, अत्याचार जैसे नकारात्मक गुण उसमें नहीं हैं. आप में से कुछ यह भी कह सकते हैं कि हमारे द्वारा ये सब बातें समझाए बिना ही हमारे बच्चे बढ़िया चल रहे हैं. तो भई आप सौभाग्यशाली हैं. आपकी कहानी आपके साथ, मेरी कहानी मेरे साथ.

Tuesday, 22 July 2014

साहित्य

साहित्य

साहित्य (यानि साहित्यकार) अब अपनी ज़िम्मेदारी वैसे नहीं निभाता जैसे युगों पहले निभाता था. पुरातन साहित्य में समाज को शिक्षित करने की दिशा में कथा के अंत में एक नीति वाक्य होता था जिसे हम Moral of the story कहते हैं. आज अंत में या बीच में, कहीं भी ऐसी कोई शिक्षाजनक बात नहीं कही जाती। शिक्षा-सन्देश मुखर हुआ तो ऐसी रचना को सस्ता साहित्य कह कर खारिज कर दिया जाता है. आज ज़्यादा ज़ोर रचना के शिल्प-कौशल की ओर दिया जाता है इसीलिए पिछले कुछ साल पहले कविता अकविता हो गई थी और कहानी अकहानी। धीरे-धीरे कविता में सपाट-बयानी आती गई और कहानी भी घटनाओं का खूबसूरत बयान भर बन कर रह गई. कहीं इसीलिए तो समाज विश्रृंखलता की ओर नहीं बढ़ रहा कि जो कुछ पढ़ने के शौकीन लोग बचे भी हैं, उन्हें साहित्य में फंतासी के अतिरिक्त कुछ नहीं मिल रहा? साहित्य में कोई राह तो दिखे, कोई दिशा-निर्देश तो हो, चाहे छद्म रूप में ही हो. आज समाज जिस गर्त की ओर जा रहा है, साहित्यकारों को अपनी ज़िम्मेदारी समझने एवं निभाने की अत्यंत आवश्यकता है. फिर से आ जाओ, उसी पुराने दौर में और कबीर, तुलसी की तरह समाज का सही मार्गदर्शन करने वाला साहित्य रचो और हर कथा के अंत में एक नीतिवाक्य अवश्य हो 

Monday, 21 July 2014

मन की आँखें खोल Kavita 203

मन की आँखें खोल

मन की आँखें खोल बबुआ, मन की आँखें खोल.

बहुमूल्य अर्थ खो गए
मृत्यु है अनमोल बबुआ।

पल में 'हाँ' और पल में 'ना' है
बातों में है झोल बबुआ।

मेरा सब तेरा हो जाए
वाणी ऐसी बोल बबुआ।

इस जग परउपदेश घनेरे
निज कर्मों को तोल बबुआ।

सहज सरल सीधी चालें चल
झंझट मत ले मोल बबुआ।

मुड़-मुड़ कर वापस जाना है
यह दुनिया है गोल बबुआ।

पावन है रिश्तों की माया
कहीं ज़हर मत घोल बबुआ।

मुक्ति पर्व में आँसू कैसे
ढम ढम बाजे ढोल बबुआ।

Friday, 11 July 2014

पूर्वजों के कर्मों का फल

पूर्वजों के कर्मों का फल

परिवार की महत्ता इतनी होती है कि बैकग्राउंड अच्छा न हो तो बढ़िया से बढ़िया लोग भी धक्के खाते हैं और बैकग्राउंड बढ़िया हो तो मूर्ख से मूर्ख लोग भी मज़े करते हैं.

समय-समय पर मेरी दुकान पर काम करने वाली लड़कियों में कई सच में बहुत समझदार, सलीकापसंद और सुचारूरूप से घर-गृहस्थी चलाने वाली थीं, लेकिन उनके माता-पिता की दयनीय पारिवारिक स्थिति, कमज़ोर आर्थिक बैकग्राउंड के कारण उनके विवाह ऐसी जगह हुए कि उन्हें उम्र भर खपना पड़ता है.

उम्र भर तो खैर हम भी खप रहे हैं लेकिन अपनी इच्छा से किए गए काम और मजबूरी के किए गए काम के तनाव और तसल्ली में अंतर होता है.

सीता मेरे घर में सारा घरेलु काम करती है. कल मैं रसोई में गई तो उसे भिन्डी का ढेर काटते हुए देख कर मैंने कहा, 'यार, इतनी सारी भिन्डी क्यों काट रही हो?' वह तुरंत बोली, 'यार, भिन्डी आए कई दिन हो गए, फ्रिज में पड़े-पड़े खराब हो जाएगी।' मैं कुछ सोच पाती, कह पाती, इससे पहले ही वह बोली, 'सॉरी मैम, सॉरी।' 'सुधर जा, सीता,' मैंने कहा, साथ ही यह कहने वाली थी कि 'अपनी औकात में रह' कि तभी मुझे कुछ दिन पूर्व फेसबुक पर हुई 'औकात' शब्द की छीछालेदर याद आ गई.

पाँच महीने पहले सीता मेरी दुकान में काम ढूँढने आई थी. उस समय मुझे ज़रुरत नहीं थी, लेकिन वह कहते हैं ना, कई लोगों को देखते ही लगता है कि वे हमसे जुड़ने लायक हैं, सो मैंने बिना वजह उसे रख लिया, यह कह कर कि दुकान में तो मुझे ज़रुरत नहीं है, पर चलो, बाज़ार के कामों में मैं तुम्हें अपने साथ ले जाया करूँगी। सामान उठाने में मदद हो जाएगी।'

अगले दिन मैं उसे साथ लेकर गई, नॉएडा से कनॉट प्लेस। आधे रास्ते में ही वह बोली, 'मैम, गाड़ी रोकिए, मुझे उलटी आ रही है.' उसके कई दिन बाद फिर मुझे कहीं जाना था, तो बोली, 'मैम, बस से चलें? कार में ज़्यादा दूर जाने से मुझे उलटी आती है और मेरे सिर में दर्द हो जाता है.' मैंने कहा, 'सीता, मैंने ज़रुरत न होते हुए भी तुम्हें काम पर रखा. तुम्हें काम करना है तो अपनी कोई तो उपयोगिता सिद्ध करो.' बोली, 'मैम मैं आपके बुटीक में तुरपाई का काम कर सकती हूँ, साड़ी में फॉल लगा सकती हूँ.' 'पर उसके लिए तो लोग हैं,' मैंने कहा और उसे लेकर घर आ गई. घर आकर मैंने उससे पूछा, 'चाय बनानी आती है?' उसने खुश हो कर चाय बनाई, ढाबा टाइप, कम चाय पत्ती को कढ़ा-कढ़ा कर ज़्यादा दूध की. हमें लाइट चाय पीने की आदत थी, फिर भी अच्छी लगी. वह बोली, 'मैम, मैं आपके घर खाना बनाने का काम कर सकती हूँ.' घर में पूरा काम करने के लिए एक काम वाली थी जो संयोग से उस दिन छुट्टी पर थी. सीता ने खाना बनाया, बेहद स्वाद। बरखा और बच्चों को भी वह पसंद आई क्योंकि वह गुड लुकिंग, अच्छे कपडे, साफ़-सुथरी, बोलने में ठीक-ठाक थी. थी क्या, है. गाँव की है पर लगती नहीं, शान से कहती है, 'दसवीं पास हूँ.'

पहले से जो काम कर रही थी, वह बंगाली होने के कारण हमारी भाषा नहीं समझती थी और उसके साथ बहुत सिर खपाई थी, हालाँकि न उसके काम में कोई कमी थी, न हमने उसे हटाने का कभी सोचा था. सीता ने ही एक दिन कहा, 'मैम, मैं आपके घर का सारा काम कर लूँ तो?' उसे अपनी उपयोगिता सिद्ध करनी थी. घर में सबने उसकी बात पर मोहर लगा दी. अब कई बार मैंने उससे कहा कि दुकान में अब ज़रुरत है, तुम वहाँ काम कर लो, तो नहीं, उसे बर्तन माँजने ही पसंद हैं, झाड़ू-पोछा ही पसंद है और घर के बाकी सारे काम, यहाँ तक कि कपड़ों की अलमारियाँ सँवारना भी. सुबह आती है, रात को अपने घर चली जाती है. विवाहित है, बच्चे हैं. कुछ-कुछ दिन बाद याद दिलाती रहती है, 'मैम, मैं ज़रुरत की वजह से नौकरी कर रही हूँ, मेरे घर का कभी कोई आ जाए तो कहना नहीं कि मैं यह काम कर रही हूँ, कहना कि मैं आपकी दुकान में नौकरी करती हूँ.' साथ ही यह कहना भी ज़रूरी समझती है, 'मैं दसवीं पास हूँ मैम, मैं ब्राह्मण हूँ. मेरा पूरा नाम सीता शर्मा है.' मैं उसकी इस बात का जवाब देती हूँ, 'ठीक है, तुम ऊँची जात की हो, हम खत्री हैं, तुम ब्राह्मण हो. पर बार-बार क्यों बताती हो कि तुम ब्राह्मण हो? हमारे साथ हमारे पलंग पर बैठती हो, कुर्सी पर बैठती हो, डाइनिंग टेबल पर खाना खाती हो. सबसे बड़ी बात यह कि हम सब अब तुम्हारे काम के मोहताज हैं.'

सीता ऊँचे खानदान में जन्मी होती तो कम से कम बी ए तक तो पढ़ ही लेती और घर-वर भी बेहतर मिल जाता। (और हाँ, उसकामुझे मालूम है. यहाँ मैंने व्यंजना से  असली नाम सीता नहीं है, मीता, रीता, गीता, नीता, कुछ भी हो सकता है). पूर्वजों के कर्मों का फल भोगते हैं हम.

Sunday, 6 July 2014

पर था तो Kavita 202

पर था तो

तुम्हारा प्यार चाहे झूठा था
पर था तो.
मुझ पर भारी है क़र्ज़ उसी प्यार का
जिसे कि कण-कण उतार रही हूँ
आँसुओं में ढाल कर.

तुम्हारा प्यार चाहे क्षणिक था
पर था तो
छोड़ गया मुझ में अहसासों के अंश
जिसे पल-पल सँवार रही हूँ
स्मृतियों में पाल कर.

तुम्हारा प्यार चाहे स्वार्थी था
पर था तो
मुझ में ज़िंदा है नश्तर के दंश सा
जिसे मैं रोज़ दुलार रही हूँ
सम्वेदना में डाल कर.

तुम्हारा प्यार चाहे सापेक्ष था
पर था तो
मुझ में रिसता है घाव नासूर बन
दुआओं से पछार रही हूँ
मन-गंगा में उछाल कर.

तुम्हारा प्यार चाहे कालबद्ध था
पर था तो
मुझ में बस गया है कई-कई युग बन
कालातीत, समयातीत
रखूँगी मैं सँभाल कर.

Friday, 4 July 2014

जन्मों के मित्र Kavita 201

जन्मों के मित्र

पुरानी याद के खज़ानों में
अब बेहिचक धुँधले से चित्र होते हैं.

जहाँ निःशब्द परेशानी है
अजीबोग़रीब बहके चरित्र होते हैं.

दुखों की बात भी क्या खूब है
कई बिन बुलाए सदमे विचित्र होते हैं.

बार-बार सामने आते हैं
जो जन्म-जन्म-जन्मों के मित्र होते हैं.

मिलन के श्राप से पगलाए हुए
एक दूसरे को छू कर पवित्र होते हैं.

Tuesday, 1 July 2014

इत्मीनान है Kavita 200

इत्मीनान है

मुझे न कोई भय है, न संदेह.
मैं हर भय से मुक्त हूँ
मैं हर संदेह से परे हूँ
हल्की होकर उड़ रही हूँ.

मुझे न कोई अपेक्षा है, न प्रतीक्षा.
मुझमें किसी मोह का वास नहीं
मैं उम्मीदों से ऊपर हूँ
मैं स्वयं में सुरक्षित हूँ.

मुझमें न कोई बेसब्री है, न अधैर्य
सब कुछ छूट गया है
खालीपन भरा-भरा है
ग़रीबी में बादशाहत है.

मुझमें न कोई आस है, न त्रास
न मैं बदहवास हूँ
दुःख हो गए हैं नियंत्रित
बस, अपने बस में हूँ.

अब मुझमें स्वप्न जन्म नहीं लेते
आकांक्षाओं के पुष्प नहीं पनपते
उदासियों की शान है
इत्मीनान ही इत्मीनान है.