Friday, 11 July 2014

पूर्वजों के कर्मों का फल

पूर्वजों के कर्मों का फल

परिवार की महत्ता इतनी होती है कि बैकग्राउंड अच्छा न हो तो बढ़िया से बढ़िया लोग भी धक्के खाते हैं और बैकग्राउंड बढ़िया हो तो मूर्ख से मूर्ख लोग भी मज़े करते हैं.

समय-समय पर मेरी दुकान पर काम करने वाली लड़कियों में कई सच में बहुत समझदार, सलीकापसंद और सुचारूरूप से घर-गृहस्थी चलाने वाली थीं, लेकिन उनके माता-पिता की दयनीय पारिवारिक स्थिति, कमज़ोर आर्थिक बैकग्राउंड के कारण उनके विवाह ऐसी जगह हुए कि उन्हें उम्र भर खपना पड़ता है.

उम्र भर तो खैर हम भी खप रहे हैं लेकिन अपनी इच्छा से किए गए काम और मजबूरी के किए गए काम के तनाव और तसल्ली में अंतर होता है.

सीता मेरे घर में सारा घरेलु काम करती है. कल मैं रसोई में गई तो उसे भिन्डी का ढेर काटते हुए देख कर मैंने कहा, 'यार, इतनी सारी भिन्डी क्यों काट रही हो?' वह तुरंत बोली, 'यार, भिन्डी आए कई दिन हो गए, फ्रिज में पड़े-पड़े खराब हो जाएगी।' मैं कुछ सोच पाती, कह पाती, इससे पहले ही वह बोली, 'सॉरी मैम, सॉरी।' 'सुधर जा, सीता,' मैंने कहा, साथ ही यह कहने वाली थी कि 'अपनी औकात में रह' कि तभी मुझे कुछ दिन पूर्व फेसबुक पर हुई 'औकात' शब्द की छीछालेदर याद आ गई.

पाँच महीने पहले सीता मेरी दुकान में काम ढूँढने आई थी. उस समय मुझे ज़रुरत नहीं थी, लेकिन वह कहते हैं ना, कई लोगों को देखते ही लगता है कि वे हमसे जुड़ने लायक हैं, सो मैंने बिना वजह उसे रख लिया, यह कह कर कि दुकान में तो मुझे ज़रुरत नहीं है, पर चलो, बाज़ार के कामों में मैं तुम्हें अपने साथ ले जाया करूँगी। सामान उठाने में मदद हो जाएगी।'

अगले दिन मैं उसे साथ लेकर गई, नॉएडा से कनॉट प्लेस। आधे रास्ते में ही वह बोली, 'मैम, गाड़ी रोकिए, मुझे उलटी आ रही है.' उसके कई दिन बाद फिर मुझे कहीं जाना था, तो बोली, 'मैम, बस से चलें? कार में ज़्यादा दूर जाने से मुझे उलटी आती है और मेरे सिर में दर्द हो जाता है.' मैंने कहा, 'सीता, मैंने ज़रुरत न होते हुए भी तुम्हें काम पर रखा. तुम्हें काम करना है तो अपनी कोई तो उपयोगिता सिद्ध करो.' बोली, 'मैम मैं आपके बुटीक में तुरपाई का काम कर सकती हूँ, साड़ी में फॉल लगा सकती हूँ.' 'पर उसके लिए तो लोग हैं,' मैंने कहा और उसे लेकर घर आ गई. घर आकर मैंने उससे पूछा, 'चाय बनानी आती है?' उसने खुश हो कर चाय बनाई, ढाबा टाइप, कम चाय पत्ती को कढ़ा-कढ़ा कर ज़्यादा दूध की. हमें लाइट चाय पीने की आदत थी, फिर भी अच्छी लगी. वह बोली, 'मैम, मैं आपके घर खाना बनाने का काम कर सकती हूँ.' घर में पूरा काम करने के लिए एक काम वाली थी जो संयोग से उस दिन छुट्टी पर थी. सीता ने खाना बनाया, बेहद स्वाद। बरखा और बच्चों को भी वह पसंद आई क्योंकि वह गुड लुकिंग, अच्छे कपडे, साफ़-सुथरी, बोलने में ठीक-ठाक थी. थी क्या, है. गाँव की है पर लगती नहीं, शान से कहती है, 'दसवीं पास हूँ.'

पहले से जो काम कर रही थी, वह बंगाली होने के कारण हमारी भाषा नहीं समझती थी और उसके साथ बहुत सिर खपाई थी, हालाँकि न उसके काम में कोई कमी थी, न हमने उसे हटाने का कभी सोचा था. सीता ने ही एक दिन कहा, 'मैम, मैं आपके घर का सारा काम कर लूँ तो?' उसे अपनी उपयोगिता सिद्ध करनी थी. घर में सबने उसकी बात पर मोहर लगा दी. अब कई बार मैंने उससे कहा कि दुकान में अब ज़रुरत है, तुम वहाँ काम कर लो, तो नहीं, उसे बर्तन माँजने ही पसंद हैं, झाड़ू-पोछा ही पसंद है और घर के बाकी सारे काम, यहाँ तक कि कपड़ों की अलमारियाँ सँवारना भी. सुबह आती है, रात को अपने घर चली जाती है. विवाहित है, बच्चे हैं. कुछ-कुछ दिन बाद याद दिलाती रहती है, 'मैम, मैं ज़रुरत की वजह से नौकरी कर रही हूँ, मेरे घर का कभी कोई आ जाए तो कहना नहीं कि मैं यह काम कर रही हूँ, कहना कि मैं आपकी दुकान में नौकरी करती हूँ.' साथ ही यह कहना भी ज़रूरी समझती है, 'मैं दसवीं पास हूँ मैम, मैं ब्राह्मण हूँ. मेरा पूरा नाम सीता शर्मा है.' मैं उसकी इस बात का जवाब देती हूँ, 'ठीक है, तुम ऊँची जात की हो, हम खत्री हैं, तुम ब्राह्मण हो. पर बार-बार क्यों बताती हो कि तुम ब्राह्मण हो? हमारे साथ हमारे पलंग पर बैठती हो, कुर्सी पर बैठती हो, डाइनिंग टेबल पर खाना खाती हो. सबसे बड़ी बात यह कि हम सब अब तुम्हारे काम के मोहताज हैं.'

सीता ऊँचे खानदान में जन्मी होती तो कम से कम बी ए तक तो पढ़ ही लेती और घर-वर भी बेहतर मिल जाता। (और हाँ, उसकामुझे मालूम है. यहाँ मैंने व्यंजना से  असली नाम सीता नहीं है, मीता, रीता, गीता, नीता, कुछ भी हो सकता है). पूर्वजों के कर्मों का फल भोगते हैं हम.

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