Tuesday, 22 July 2014

साहित्य

साहित्य

साहित्य (यानि साहित्यकार) अब अपनी ज़िम्मेदारी वैसे नहीं निभाता जैसे युगों पहले निभाता था. पुरातन साहित्य में समाज को शिक्षित करने की दिशा में कथा के अंत में एक नीति वाक्य होता था जिसे हम Moral of the story कहते हैं. आज अंत में या बीच में, कहीं भी ऐसी कोई शिक्षाजनक बात नहीं कही जाती। शिक्षा-सन्देश मुखर हुआ तो ऐसी रचना को सस्ता साहित्य कह कर खारिज कर दिया जाता है. आज ज़्यादा ज़ोर रचना के शिल्प-कौशल की ओर दिया जाता है इसीलिए पिछले कुछ साल पहले कविता अकविता हो गई थी और कहानी अकहानी। धीरे-धीरे कविता में सपाट-बयानी आती गई और कहानी भी घटनाओं का खूबसूरत बयान भर बन कर रह गई. कहीं इसीलिए तो समाज विश्रृंखलता की ओर नहीं बढ़ रहा कि जो कुछ पढ़ने के शौकीन लोग बचे भी हैं, उन्हें साहित्य में फंतासी के अतिरिक्त कुछ नहीं मिल रहा? साहित्य में कोई राह तो दिखे, कोई दिशा-निर्देश तो हो, चाहे छद्म रूप में ही हो. आज समाज जिस गर्त की ओर जा रहा है, साहित्यकारों को अपनी ज़िम्मेदारी समझने एवं निभाने की अत्यंत आवश्यकता है. फिर से आ जाओ, उसी पुराने दौर में और कबीर, तुलसी की तरह समाज का सही मार्गदर्शन करने वाला साहित्य रचो और हर कथा के अंत में एक नीतिवाक्य अवश्य हो 

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