Sunday, 27 July 2014

ग़ज़ल 38

ग़ज़ल 38

उसको अपनी सोच पर, फ़िज़ूल का अभिमान
लिख कर दिखाए मुझसे, बढ़िया कोई कलाम.

वह जाना चाहता है तो जाए बड़े शौक से
मिटा कर दिखाए, मेरे दिल से अपना नाम.

अपराध-पर-अपराध, किए जा रहा था वह
इतनी समझ नहीं थी, जो सोचता परिणाम.

कि उसके इरादों में, बुलंदी ही बुलंदी
सारी दुनिया उसकी, दंड-भेद-साम-दाम.

बहुत से भ्रम साफ़ हो जाते हैं खुद-ब-खुद
कामनाएँ स्वतः हो जाती हैं निष्काम.

मेरी हर कहानी में, ज़िक्र होगा उसका
हिम्मत है तो सच को, झुठलाए सरेआम.

वह नहीं बस उसकी छवि है मेरे ख्याल में
कविता की भीड़ में, हर कविता उसके नाम.

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