Sunday, 6 July 2014

पर था तो Kavita 202

पर था तो

तुम्हारा प्यार चाहे झूठा था
पर था तो.
मुझ पर भारी है क़र्ज़ उसी प्यार का
जिसे कि कण-कण उतार रही हूँ
आँसुओं में ढाल कर.

तुम्हारा प्यार चाहे क्षणिक था
पर था तो
छोड़ गया मुझ में अहसासों के अंश
जिसे पल-पल सँवार रही हूँ
स्मृतियों में पाल कर.

तुम्हारा प्यार चाहे स्वार्थी था
पर था तो
मुझ में ज़िंदा है नश्तर के दंश सा
जिसे मैं रोज़ दुलार रही हूँ
सम्वेदना में डाल कर.

तुम्हारा प्यार चाहे सापेक्ष था
पर था तो
मुझ में रिसता है घाव नासूर बन
दुआओं से पछार रही हूँ
मन-गंगा में उछाल कर.

तुम्हारा प्यार चाहे कालबद्ध था
पर था तो
मुझ में बस गया है कई-कई युग बन
कालातीत, समयातीत
रखूँगी मैं सँभाल कर.

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