Sunday, 31 August 2014

छोटी कविता 20

छोटी कविता 20

भीतर खामोशी इतनी बढ़ी
कि बाहर
शब्दों का सैलाब उमड़ आया।
यूँ मैं
बची मौन के आघात से।

छोटी कविता 19

छोटी कविता 19

इस मिलन को तुम मिलन का दर्जा न दो
तुम्हारा मिलना भी कोई मिलना था
अभी आए थे, लो अभी गए।

Tuesday, 19 August 2014

ग़ज़ल 39

ग़ज़ल 39


मेरे जज्बात किन्हीं नर्म खयालों की तरह
तुम्हारा अहम् हावी इन पे सवालों की तरह।

मैंने चाहा तुम्हें कुछ ख़ास ग़लतफ़हमी में
तुमने चाहा मुझे कुछ ख़ास मलालों की तरह।

तुम्हारे रास्ते में रोशनी ही रोशनी हो
मैंने खुद को ही जलाया था मशालों की तरह।

मेरी ख़ामोशी तुमसे मिल के हुई शर्मिन्दा
तुमने एक शोर मचाया था बवालों की तरह।

तुम्हारे सामने आईना कोई क्या रखे
तुम्हारे चेहरे पर धब्बे हैं धमालों की तरह।

तुम्हारे शातिरानापन की दाद देनी है
तुमने जो कुछ भी किया, किया कमालों की तरह।