Wednesday, 10 September 2014

संत कवि सूरदास

संत कवि सूरदास

अँखियाँ हरि दरसन की प्यासी
देख्यौ चाहती कमल-नयन को
निसि दिन रहत उदासी।

संत कवि सूरदास नेत्रहीन थे, क्या इसीलिए इतने व्याकुल थे कृष्ण के सौंदर्य को निहारने के लिए? सूरदास को बी ए, एम ए में तो पढ़ा ही था, अब पुनः पढ़ा तो नए सिरे से यह सोचने पर विवश हुई कि जिन लोगों में कोई एक क्षति होती है, उसकी आपूर्ति अवश्य किसी अन्य बात से हो जाती है. सूरदास जन्म से नेत्रहीन थे, गरीब माता-पिता की संतान थे, बचपन में उन्हें इतना प्रताड़ित किया गया कि उन्होंने छह वर्ष की आयु में घर त्याग दिया। भगवान किसी न किसी भेज ही देता है आपकी रक्षा करने के लिए. उन्हें श्री वल्लभाचार्य का शिष्य बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ जिनके आशीर्वाद से उन्होंने हिन्दू दर्शन शास्त्र का ज्ञान हासिल किया। जन्मांध होने पर भी उन्होंने मन की आँखों से देख कर कल्पना के ज़रिये बाल कृष्ण के सौंदर्य का अद्भुत वर्णन किया, बाल कृष्ण की अनोखी अठखेलियों का चित्ताकर्षक वर्णन किया, जिसका मुकाबला कालिदास भी नहीं कर पाए. संभवतः इसलिए कि उनका अपना बचपन अत्यंत त्रासद रहा था. जीवन भर अकेले रहे लेकिन राधा-कृष्ण के प्रेम का बयान ऐसा जैसे उन्होंने सचमुच उस प्रेम को जिया हो. सूरदास द्वारा उकेरित कोमल भावनाएँ मन को छू जाती हैं.

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