Saturday, 13 September 2014

कैसा हिन्दी दिवस?

कैसा हिन्दी दिवस?

14 सितम्बर। हमारे देश में मनाया जाने वाला हिन्दी का एक दिन. शुक्र है, एक दिन तो मुक़र्रर है. बहुत हो चुका हिन्दी-हिन्दी का नाटक। पिछले 66 वर्षों से यह तमाशा चल रहा है. सरकारी कार्यालयों में हिन्दी अधिकारी हिन्दी के नाम पर रोटी खा रहे हैं. कर क्या रहे हैं? पर उनका क्या कसूर? उनके किए से हो क्या रहा है? क्या होने वाला है?

हमसे ज़्यादा लगन विदेशों में बैठे भारतीय मूल के निवासियों में है. बल्कि यह कहना अधिक सही होगा कि भारत के कतिपय अहिन्दी भाषी राज्यों से अधिक सम्मान हिन्दी को विदेशों में.प्राप्त है.

मैं लगभग 20 वर्ष पूर्व गयाना में भारतीय उच्चायोग (भारतीय दूतावास) में शिक्षा एवं संस्कृति अधिकारी के पद पर तीन वर्ष के लिए कार्यरत थी. उस दौरान वहाँ के एक आर्यसमाज मंदिर के पंडित एक हवन समारोह के बाद यह बताते हुए रो पड़े थे कि उन्होंने गयानावासियों को हिन्दी सिखाने का प्रण लिया था जिसे वे शतशः पूरा नहीं कर पाए. हिन्दी के प्रति उनके मन में इतनी निष्ठा, प्रतिबद्धता एवं उत्तरदायित्वपूर्ण अनुराग देख कर मैं भावविह्वल हो उठी थी. मैंने वहाँ रहते हुए यह महसूस किया था कि गयानावासी हिन्दी भाषा सीखने-सिखाने के लिए अपनी सीमाओं में जो भी कर सकते थे, ईमानदारीपूर्वक कर रहे थे.

गयानावासियों में भारतीय मूल के लोग भी हैं जो लगभग पौने दो सौ वर्ष पूर्व वहाँ इन्डेन्चर्ड कुलियों के रूप में गए थे और फिर वहीँ बस गए. गयाना की राष्ट्रीय भाषा इंग्लिश है लेकिन अपने मूल देश की भाषा 'हिन्दी' सीखने के प्रति गयानावासियों में लगन और उत्साह, प्रयत्न और श्रम बाकायदा नज़र आते थे, जिसके फलस्वरूप व्यक्तिगत और सामूहिक प्रयासों में जहाँ मंदिर तथा धार्मिक संस्थानों में हिन्दी की कक्षाएँ चलाई जाती हैं, वहीँ गयाना विश्वविद्यालय में भी छात्र-छात्राओं को हिन्दी का प्रशिक्षण देने की.व्यवस्था है. भारत सरकार द्वारा भी वहाँ हिन्दी भाषा का प्रचार-प्रसार करने हेतु हिन्दी प्राध्यापक की नियुक्ति की जाती है. गयाना की अनेक संस्थाएँ हिन्दी की दिशा में प्रयत्नशील हैं. गयाना में हिन्दी की पुस्तकें भारत सरकार अपने उच्चायोग के ज़रिये उपलब्ध कराती है. यह भी सही है कि इस सबके बावजूद विद्यार्थी हिन्दी लिखने-पढ़ने तक ही सीमित रह जाते हैं, हिन्दी बोलने-समझने में प्रवीण नहीं हो पाते। लेकिन यही क्या कम है कि सदियों से अंग्रेजी बोलते चले जाने के बावजूद इस मामले में किसी ने हार नहीं मानी है. हिन्दी के प्रति सबके मन में श्रद्धा है.

हमारे देश का तो हाल ही निराला है. यहाँ हिन्दी के नाम पर लोग नाक-भौंह सिकोड़ते हैं. शर्म की बात तो यह है कि हम भारतवासियों के मन में अपनी भाषा के प्रति न कोई प्रेम है, न सम्मान। फिर कैसा हिन्दी दिवस? और क्यों हिन्दी के नाम पर खर्चीले आयोजन?

(word 450, Page 1)

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