Wednesday, 24 September 2014

अंतिम बात

अंतिम बात

सपने चाहे कोई न देखे लेकिन एक सामान्य सुख की चाहना हरेक के मन में होती है. एक उम्रदराज़ व्यक्ति को मैं रोज़ उनके घर की ड्योढ़ी पर बैठा देखती थी. एक शाम वे मुझे पार्क में दिखे। मुश्किल से चल कर आए होंगे, मैंने सोचा, क्योंकि वे उम्र के कारण बहुत डगमगाते हुए लगे थे. वे टहल नहीं रहे थे, एक बेंच पर बैठे थे. मैं उनके पास जा कर बैठ गई. उन्होंने मेरी तरफ बड़ी बेचारी सी मुस्कराहट से देखा। मैंने बात शुरू की. बात करने में इतने ज़हीन लगे कि उनकी उम्र के साथ उनकी बातों का कोई मेल नहीं लगा. इस उम्र में भी दिमाग इतना सजग, सुलझा हुआ. शायद 80 वर्ष के हों. जिस तरह से वे लड़खड़ाते, डगमगाते लग रहे थे, 90 के भी हो सकते थे. मैं चौंक गई जब उन्होंने मुझ से ओल्ड एज होम के बारे में जानकारी चाही। धीरे-धीरे वे मुझसे खुल गए. अपने इकलौते बेटे और बहु की जो बदसलूकियाँ उन्होंने मुझे बताई, रो-रो कर बताईं, उसे सुन कर मेरी पीड़ा का अंत नहीं था. बेटा पहले उनके साथ ठीक था, बहु शुरू से ज़ालिम थी, उन्हें अपने पोते के साथ भी बोलने की इजाज़त नहीं थी. उन्होंने कहा, 'मैं तो सालों से जैसे किसी से बोला ही नहीं, आज बरसों बाद मेरे मुंह की हवा निकली है.' लगभग 30 साल पहले उनकी पत्नी का देहांत हुआ था. लगभग 25 साल पहले उन्होंने अपने बेटे की शादी की थी. ज़ाहिर है, उस वक़्त वे इतने बूढ़े नहीं थे, लेकिन घर में उनका होना, उनकी उपस्थिति ही उनकी बहु को बर्दाश्त नहीं थी, धीरे-धीरे उन पर जान छिड़कने वाला बेटा भी उनसे विमुख होता गया. मैंने उनके बारे में तड़प कर सोचा कि मैं उनके लिए क्या कर सकती हूँ? बाहर से इतनी शानोशौकत वाले परिवार की यह अंदरूनी असलियत? अगले दिन शाम घर लौटते हुए मैंने देखा कि उनके घर के आगे भीड़ लगी है. पता चला, वे मर गए. तो क्या अपने मुंह की हवा निकालने के लिए, अपनी अंतिम बात कहने के लिए, अपना दुःख-दर्द किसी एक को तो बता सकें, उस वक़्त तक के लिए मौत ने उन्हें वक़्त दिया था? नाश हो ऐसी बहुओं का जो ससुराल में मात्र एक बन्दे को भी बर्दाश्त नहीं कर सकतीं। ऐसी बहुओं से मैं यह कहना चाहती हूँ, जो अपमान वे अपने सास-ससुर का करती हैं, डिट्टो वही अपमान वे अपने माता-पिता का करें और देखें कि उसके बाद उन्हें अपने पैतृक घर में प्रवेश पाने की अनुमति मिलती है या नहीं?

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