Monday, 8 September 2014

ग़ज़ल 40

ग़ज़ल 40


हुई हैं कोशिशें नाकाम सब हमको हँसाने में
नहीं होती है दिल्लगी कोई दिल को लगाने में.

यह उस ने खेल सा खेला बहुत ही होशियारी से
कि सच में वाह-वाह था वह करामातें दिखाने में.

कुछ अपने खोखलेपन को सजाया इस तरह उसने
कि रौनकें ही रौनकें मेरे इस आशियाने में.

कि चालें बहुत आती थीं उसे दिल जीत लेने की
हमें आनंद ही आनंद था दिल हार जाने में.

हम आज़ाद हैं सहमे हुए डर-डर के जी रहे
वह पिंजरे में बंद पंछी मस्त चहचहाने में.

हमारे आसपास अब बड़ा बदरंग मौसम है
कहीं कोई कसर छोड़ी नहीं नीचा दिखाने में.

2 comments:

  1. कि चालें बहुत आती थीं उसे दिल जीत लेने की
    हमें आनंद ही आनंद था दिल हार जाने में.

    Well said..Bahut achche..Oomda Gazal.

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    1. धन्यवाद हरिवंश शर्मा जी.

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