Friday, 5 September 2014

वह बड़ी हो गई Kavita 205

वह बड़ी हो गई

उसके चेहरे पर अब बच्चों-सी खिलखिलाहट नहीं
आँखों में जल-बुझ जल-बुझ होते सपनों की जगमगाहट नहीं
होठों पर गीत-ग़ज़ल नहीं, बातों में मनचले शगल नहीं
उसकी चंचलता कहीं गायब हो गई
दिल की चोटों ने उसे बड़ा बना दिया।
वह गंभीर चेहरा लिए घूमती है
लापरवाह सी दिखती है
फैशन का कोई शऊर नहीं
शब्दों में कोई सवाल नहीं, मन में कोई बवाल नहीं
बड़ी जो हो गई है.
अब मज़े-मज़े से वो बहकने के दिन गए
बिना वजह हँसती नहीं है अब वह
मुस्कुराने से पहले भी वजह तलाशती है
पहले की तरह बिना वजह कुछ भी नहीं करती
मौसम तक को महसूस करने से डरती है.
अब तक वह नासमझी में रह रही थी
इसीलिए बिन्दास हँसती थी
चिड़ियों-सी चहचहाती थी
बादलों-सी इठलाती थी
ढेर सारी बारिश की तरह जहाँ-तहाँ बरस जाती थी.
उसकी इन्द्रियाँ शून्य हो गई हैं
अहसास मर गए हैं, हँसना भूल गई है
कम बोलती है, अकेले में ख़ामोशी को सुनती है
आँसू सूख गए हैं, भाव मर गए हैं
अब वह समझदार हो गई है.



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