Sunday, 21 September 2014

ज़िद Kavita 207

ज़िद

उसके दिल में
ज़हरीले साँप लहराते हैं
क्या तुम रहोगी
उन साँपों के साथ?

उसके दिमाग में
बहुत सारे खलल हैं
क्या तुम सहोगी
उन खलल के दंश?

उसकी आँखों में
कोई सपना नहीं है
तुम डरोगी तो नहीं
उन खाली आँखों से?

उसके होठों पर
अपशब्दों की बौछार है
क्या तुम भीगोगी
उस बारिश में?

उसके हाथों में
ढेर सारे दाग हैं
तुम्हारी सफेदी को छू कर
काला कर देंगे.

फिर भी तुम्हें ज़िद है
तो जाओ
बुराइयों से लड़ने का
शऊर सीख कर आओ.

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