Friday, 26 September 2014

एक बूढ़े का प्रलाप Kavita 209

एक बूढ़े का प्रलाप

वह है
लेकिन कोई मानता नहीं कि वह है.
वह गतिशील है
लेकिन रोज़ उसकी चाल निरस्त कर दी जाती है.
वह जीवित है
लेकिन उसे धीमा ज़हर देकर
मारने की साज़िशें रची जा रही हैं.

वह आत्म-रक्षा में जी रहा है.
वह आत्म-दया में जी रहा है.
वह आत्म-ग्लानि में जी रहा है.
वह आत्महीनता में जी रहा है.

सबको इंतज़ार है उसके मरने का.
मौत से पहले वह मर गया है
लेकिन दिख तो रहा है
उसका दिखना बंद हो
तभी वह मरा हुआ समझा जाएगा.

सबकी ख़ुशी के लिए ज़रूरी है उसका न होना.
वह कोशिश करता है
कि होते हुए भी वह न हो
लेकिन दिख तो रहा है.

उसकी आँखें चुँधियाने लगी हैं
उसके पाँव थकने लगे हैं
उसका सिर दुखने लगा है
उसकी साँस हाँफ़ने लगी है
लेकिन वह है तो
दिख तो रहा है.

वह सबको समझाना चाहता है
जो दिख रहा है, वह 'वह' नहीं है
वह उसका शरीर है 
कमज़ोर, निष्क्रिय, निष्प्राण
यह हलके से धक्के से ढह जाएगा.
इस शरीर से क्या डरना?
आगे बढ़ो, इसे धकेलो
इसमें जान नहीं है.

जान होती है उसमें जो दिखता नहीं.

जान होती है इरादों में
जान होती है मंसूबों में
जान होती है विचारों में
जान होती है जान से ज़्यादा प्यारों में.

उसकी जान उन सबमें है, जो नहीं चाहते, वह दिखे
लेकिन वह दिख तो रहा है
उन सबको दिख रहा है जो नहीं चाहते वह दिखे
उन सबको देख रहा है जो नहीं चाहते वह दिखे
पर वह कैसे न दिखे?
कहाँ जाकर छुपे?
कौन से पाताल में समाए?
कौन सा अदृश्य करने वाला फल खाए?

उसकी जान को खतरा है
वह दहशत के साए में जी रहा है.
जिए न तो क्या करे?
मरे भी तो कैसे मरे?

No comments:

Post a Comment