Wednesday, 17 September 2014

एक शब्द-चित्र…… Kavita 205

एक शब्द-चित्र…… 

खिलंदड़ा कहीं का.
प्रेम की कलाएँ तो कोई उसकी देखे।

गज़ब की पाचनशक्ति
तोड़नी तो हैं ही कसमें, चाहे जितनी खा लो.
गज़ब की ग्रहणशीलता
सिर्फ कलाकारी दिखाने के लिए ही प्रेम कर लेगा।
गज़ब का बुद्धि-विलास
चाल कौन सी ऐसी जो वह न जाने?
गज़ब का किताबी ज्ञान
जैसे अपराधों में दीक्षा लेने आया हो.
गज़ब की गणित-व्याख्या
सब कुछ उसकी इच्छा से परिभाषित होगा।

अनीति ही अनीति है 
सही होने की न कोई नीति है
न गलत होने की कोई रीति है.

दुनिया को जीतने की कसम खा कर पैदा हुआ है.
गलत हथकंडे अपनाता है, बार-बार हार जाता है.
उसे भ्रम है कि उसके आगे कुछ नहीं
सबसे आगे वह है।
दुर्योग पर दुर्योग
तूफ़ान आता है
उसे पीछे खदेड़ जाता है।
वह आज तक किसी तूफ़ान को रोक नहीं पाया।

फिर भी भरोसा करता है अपनी भुजाओं पर
हवा में तीर चलाता है
सोचता है, आकाश गिर पड़ेगा उसके पाँवों में
और चूर-चूर हो जाएगा
वह पकड़ लेगा सात रंगों को
चाँदनी को, रोशनी को
सूरज को अपने माथे पर चिपकाएगा
चाँदनी में नहाएगा
माथे से कालिख को हटा कर
चन्दन का तिलक लगाएगा
फिर सारी दुनिया उसकी मुट्ठी में होगी।

बावरा हुआ है?
धरती पर जीने के तौर-तरीके तो सीख
रिश्तों को ढंग से सींचना तो सीख।
पाप और पुन्य की पहचान तो कर
अच्छाई और बुराई का ज्ञान तो कर
सही और गलत का भेद तो जान.

गज़ब की ग़लतफ़हमी है
जो है बस वह है
गज़ब की अदूरदर्शिता है
जीतेगा वह जीतेगा ही
गज़ब का वहम है
वह पूर्ण ज्ञानी
गज़ब का विश्वास है
उसकी खींची हुई लकीर ही अंतिम लकीर होगी
गज़ब का भ्रम है
इस दुनिया का सही नक्शा वही बनाएगा।

अरे, बावरा हुआ है क्या?
पंख कट चुके हैं इसीलिए उड़ने की बातें सोचता है?
टाँगें टूट चुकी हैं इसीलिए दौड़ने के स्वप्न देखता है?
हाथ पसारे हुए हैं इसीलिए धन-दौलत के भण्डार चाहता है?
मन नपुंसक है इसीलिए सौंदर्य और यौवन को पुकारता है?
सच में बावरा हुआ है.

मन मूरख अज्ञानी
कोई नहीं है उसका सानी
अकेला खड़ा बाँच रहा है 
अपने ही लिखे पन्नों को.

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