Thursday, 30 October 2014

Spirit यानि आत्मा

Spirit यानि आत्मा

क्या वाकई Spirit यानि आत्मा का अस्तित्व है? हर युग में, हर काल में यह प्रश्न उठता रहा है और इसका उत्तर खोजने के लिए वैज्ञानिक अनुसंधान करते रहे हैं. एक बार कुछ डॉकटरों ने इसका अनुसंधान करने के लिए एक तजुर्बा किया। अस्पताल में एक वृद्ध की मृत्यु की चंद घड़ियाँ शेष थीं. जब डॉक्टरों को यकीन हो गया कि बस, अब वह वृद्ध मरने ही वाला है और उसके बचने की कोई उम्मीद नहीं है तो उन्होंने उसे एक शीशे के बॉक्स में लिटा दिया और बॉक्स को ठीक से बंद कर दिया। कुछ क्षण बाद वृद्ध की मृत्यु हो गई. डॉक्टरों ने बॉक्स को खोला, बॉक्स की अच्छी तरह जाँच की तो पाया कि बॉक्स के ऊपर वाले ढक्कन में एक हलकी सी तरेड़ थी, जैसे आत्मा शीशे को तोड़ कर निकल गई हो. उन्हें यकीन हो गया कि आत्मा का अस्तित्व है, आत्मा होती है लेकिन नज़र नहीं आती. जब तक आदमी ज़िन्दा रहता है, आत्मा उसके भीतर रहती है. आदमी के मरने के बाद आत्मा उसके शरीर को छोड़ कर चली जाती है. यानि आदमी का अस्तित्व शरीर से नहीं, आत्मा से है. शरीर मरता है, आत्मा नहीं। शरीर सिर्फ कर्म के लिए है, सुख-दुःख, ख़ुशी-गम का उपभोग करने के लिए है, शैशव, यौवन, वृद्धावस्था में रूप बदलने के लिए है, नष्ट होने के लिए है. आत्मा नष्ट नहीं होती। अजीब है ना? जो नश्वर है, वह दिखता है, जो अजर-अमर है, वह दिखता नहीं। सच में अजीब है. 

Tuesday, 28 October 2014

धार्मिक पाखण्ड : देवी

धार्मिक पाखण्ड : देवी

मेरी बचपन की गली की मेरी हमउम्र दो लड़कियाँ पंजाब में कहीं ब्याही थीं. शायद दसवीं तक पढ़ाई की थी, माता-पिता की आर्थिक स्थिति साधारण थी. मुझे मालूम नहीं कि उनका वैवाहिक जीवन कैसा था? काफी सालों बाद पता चला कि एक के सिर पर नियमित देवी आती है. उस समय उसके घर पर सारा गली-पड़ोस इकट्ठा हो जाता है, सब कुछ न कुछ चढ़ावा लाते हैं, नकदी भी चढ़ाई जाती है, वह बाल बिखरा कर सिर ज़ोरों से चारों तरफ हिलाती रहती है, कोई कुछ पूछता है तो उसे सही-सही उसके बारे में बताती है, किसी को कोई समस्या हो तो उसे दूर करने का उपाय भी बताती है.

एक बार वह अपने पिता के घर दिल्ली आई हुई थी, मैं भी अपने पिता के घर गई तो मुझसे मिली। मैंने उससे पूछा कि 'यह देवी का क्या चक्कर है? क्या सचमुच तेरे ऊपर देवी आती है? कैसे आती है?' वह बोली, 'पता नहीं, कैसे आती है, पर आती है.' मैंने मज़ाक में कहा, 'यार, यह तो कमाई का अच्छा साधन है.' वह बोली, 'चल हट, तू तो नास्तिक है.' फिर बोली, 'कभी आ ना मेरे घर. सुना है, हर हफ्ते शिमला जाती है. हमारा शहर रास्ते में पड़ता है, कभी आ जा. पढ़-लिख कर इतनी बड़ी हो गई है कि बचपन की सहेलियों को भूल गई?'

मेरा पुत्र उस समय शिमला के बिशप कॉटन स्कूल में पढता था और मैंने उसके स्कूल से उससे हर हफ्ते मिलने की परमीशन ली हुई थी. मैं हर सप्ताह शनिवार की रात को दिल्ली से चल कर रविवार की सुबह शिमला पहुँचती, दिन भर बेटे के साथ बिताती और रविवार की रात को वहाँ से चल कर सोमवार सीधे अपने ऑफिस पहुँचती। मैंने बचपन की सहेली से वादा किया कि मैं उसके घर अवश्य आऊँगी।

जल्दी ही मैं उसके शहर में थी. उसके घर में उसके पति और बच्चों से मिली। ठीक-ठाक परिवार था. सास, ससुर, देवर, ननद का कोई झंझट नहीं। फिर सब उसके सिर पर देवी आने के किस्से सुनाने लगे. उसके पति ने कहा, 'जिस समय इसके सिर पर देवी आती है, इसमें गज़ब का जोश आ जाता है और शरीर में बहुत ताकत आ जाती है. यह देखो, एक बार उस समय इसने इस पलँग की पाटी पर हाथ मारा और पाटी टूट गई.' मैंने देखा, वाकई, लकड़ी की इतनी मोटी पाटी टूटना कोई आसान बात नहीं थी. फिर बोले, 'एक बार तो इसने घुमा के हाथ मेरे गाल पर थप्पड़ जड़ दिया।' वह बोली, 'अरे, एक बार नहीं, कई बार. उस समय होश थोड़े ही होता है.' मैंने हैरान होकर पूछा, 'और जीजा जी, आप पिट लिए?' वह बोले, 'अजी, यह उस समय किसी के बस में नहीं आती.' मैंने कहा, 'इसे कभी किसी डॉक्टर को दिखाया?' जीजा जी से पहले वह बोली, 'मोहिनी, तू नास्तिक है. देवी का ऐसे निरादर मत कर.'

मुझे शाम को ही दिल्ली के लिए बस पकड़नी थी. वह बोली, 'चल, तुझे उससे भी मिलवा दूँ. पास ही रहती है. वह हमसे बहुत ऊँची है मोहिनी, वह ब्रह्मकुमारी हो गई है, रहती अपने परिवार में ही है लेकिन मोहमाया से मुक्त है, पता है, अपने पति को भाई कहती है?' यानि वह दूसरी सखी. 'हैं?' मेरे आश्चर्य की सीमा नहीं थी. उस अजनबी शहर में मेरी दिल्लीवालियों के रहस्य खुल रहे थे. हम उसके घर पहुँचे। बड़ी गर्मजोशी से स्वागत हुआ. भरा-पूरा परिवार था, सास, ससुर, देवर, ननद, पति, उसके बच्चे, सब. ज़ाहिर है, उसके ब्रह्मकुमारी होने की बात छिड़नी ही थी. उसके पति बोले, 'क्या बताएँ साली जी, यह अब हमें राखी बाँधती है.' मैंने सखी से कहा, 'अच्छी-खासी गृहस्थी है तुम्हारी। अपना पत्नी-धर्म निभाओ और आराम से रहो.' वह बोली, 'चुप कर, गन्दी बातें मत कर. यह मेरे भाई हैं.' मैं दोनों जीजाओं को सम्वेदना-सहानुभूति भरा नमन करके वापस लौट आई. रास्ते भर सोचती रही, आखिर इन जवान, सुन्दर, भोली महिलाओं को हुआ क्या है जो भरी जवानी में पतियों को यूँ छोड़ बैठी हैं? एक देवी बन कर पति को थप्पड़ मार रही है, दूसरी पति को राखी बाँध रही है? और आराम से उस घर में साधिकार रह भी रही हैं. कोई तो कष्ट है इन दोनों को, वरना सुख में ऐसे टेढ़े रास्ते कौन अपनाता है? पर पतियों से बदला लेने का कमाल का रास्ता ढूँढा है.

सर्र से मेरे दिमाग में एक कहानी दौड़ गई. मैंने दिल्ली पहुँचते ही 'देवी' शीर्षक से कहानी लिखी कि गरीब, दकियानूसी माँ-बाप की बेपढ़ी-लिखी लड़कियों को भी आखिर ज़िन्दा रहना है, तलाक लेना उनके बस में नहीं, पर धर्म तो है आसरा देने के लिए.

Saturday, 25 October 2014

मैं रहूँगी Kavita 218

मैं रहूँगी

धुँधला हो रहा है सब
अंगारे बुझ रहे हैं
दिल जल रहा है.
दिल के जलने से भी रोशनी होती है.

अँधेरे में भी दिखता है मुझे
ख़ामोशी को भी सुन लेती हूँ मैं
किसी का हाथ नहीं पकड़ा
फिर भी, देखो, चल रही हूँ मैं.

मैं सबसे आगे हूँ या पीछे हूँ?
नहीं जानती पर जहाँ भी हूँ
न कोई मेरे आगे है, न पीछे
न कोई इधर, न उधर.

शरीर घट रहा है, मैं बढ़ रही हूँ
उम्र बढ़ रही है, मैं घट रही हूँ.
मैं रहूँगी घटने के बाद भी
बढ़ने के बाद तो रहूँगी ही.

यादों के दीप जलाए रखना Kavita 217

यादों के दीप जलाए रखना

मैं ज़्यादा बोल रही हूँ
ज़ोर से बोल रही हूँ
बार-बार बोल रही हूँ.
शायद मेरा कोई शब्द
कोई ध्वनि 
तुम्हारे दिमाग में कहीं फँसा रह जाए
और मेरे चले जाने के बाद भी
तुम उस शब्द से याद करो मुझे।

मैं हँसती हूँ तो पहचानी जाती हूँ
मैं रोती हूँ तो पहचानी जाती हूँ
जोश से मिलूँ तो वह मैं
लड़ूँ-झगड़ूँ तो वह मैं
मुझमें बहुत कुछ ऐसा है
जो तुम चाहो तो तुम्हें याद आएगा
नहीं चाहोगे तब भी याद आएगा।

बरसों पहले तुमने एक दीप जलाया था
मेरे नाम का
हाय बुझा दिया
बरसों पहले मैंने एक दीप जलाया था
तुम्हारे नाम का
लो बुझा दिया।
इन दीपों का क्या
दीप तो होंगे यादों के
जो न तुम बुझा पाओगे
न मैं.

Friday, 24 October 2014

धार्मिक पाखण्ड : भूत

धार्मिक पाखण्ड : भूत 

अपने बचपन और किशोरावस्था तक मैंने धर्म के नाम पर बहुत पाखण्ड होते देखे। उस समय मेरा निवास मेरे पिता के घर में था, जो एक गन्दी गली में था, जहाँ पिछड़ापन, दकियानूसीपन अपने चरम पर था शायद यह गन्दी गलियों में पिछड़े वर्गों के बीच रहने का अभिशाप था कि रोज़ कीर्तन देखने-सुनने पड़ते थे, रोज़ भजन-मंडली घर-घर में भजन गा रही थी, रोज़ किसी के सिर पर देवी आ रही थी, रोज़ किसी पर भूत चढ़ जाता था, जिसका भूत उतारने के लिए मार-मार कर उसकी दुर्गति कर दी जाती थी. मुझे याद है, एक बार एक पंद्रह-सोलह साल की लड़की पर आया भूत उतारने के लिए एक तथाकथित साधु आया था, जिसके द्वारा उसके बाल पकड़ कर उसे आग में झोंकते हुए मैंने देखा था, लड़की को डंडों से पीटा गया, साथ में साधु के शब्द, 'जाता है या नहीं? छोड़ इस लड़की का पीछा। निकल इसके शरीर से. मैं तुझे पीट-पीट कर भगा दूंगा। तू कैसे नहीं जाएगा?' आदि आदि. (क्या यह किसी बलात्कार से कम था?) वह लड़की पिट-पिट कर मरगिल्ली हो गई थी, गली के सारे लोग उस ड्रामे को देखने के लिए एकत्र थे  किसी को उस लड़की पर तरस नहीं आया था, सब एक जैसे विचारों के थे और एक जैसे निर्दयी थे. इसलिए कौन उसे बचाता? मैं इस ड्रामे को देख रही थी, दहशत में थी, उस लड़की के लिए हमदर्द थी, भीतर ही भीतर रो रही थी, लेकिन मैं कुछ कर नहीं सकती थी. उसके बाद दिनों उस लड़की को निढाल लेटे देखा था. बाद में उसका क्या हुआ, कुछ पता नहीं।

धार्मिक पाखण्ड का यह स्वरुप मेरे पिता के परिवार में नहीं होता था पर वे दकियानूसी और पिछड़े विचारों के ज़रूर थे. मुझे याद है, मेरे माता-पिता इन ड्रामों में शामिल नहीं होते थे. मेरे माता-पिता तो अब नहीं है, लेकिन वह पुश्तैनी घर आज भी वहीँ है, जिसमे मेरे भाई और उनका परिवार रहता है. वह गली आज भी गन्दी है, वहाँ लोग आज भी दकियानूसी हैं, पर किस हद तक, मैं नहीं जानती। शुक्र कीजिए कि मैं उस माहौल में रह कर भी वहाँ की बातों से कभी सहमत नहीं हुई. उस गन्दी गली से मोह तो आज तक नहीं छूटा, आज भी सपने में जो भी देखूँ , घर वही होता है, लेकिन दिल से मुक्त हुई, इस अहसास को लेकर कि धार्मिकता, पिछड़ापन, दकियानूसीपन, ये सब इंसान को निर्दयी बनाते हैं.

Wednesday, 22 October 2014

मैं छम्माछम नाचूँ गाऊँ kavita 216

मैं छम्माछम नाचूँ गाऊँ

मैं रानी महलों की रानी
तुम राजा जंगल के राजा
मैं महलों में राज करूँगी
तुम जंगल में काज करो।

मैं पहनूँ पाँवों में पायल
तुम पहनो हाथों में बेड़ी
मैं छम्माछम नाचूँ गाऊँ
तुम धम्माधम शोर करो।

मैं खुल्लमखुल्ला बोलूँ, हाँ
तुम सहमासहमी बोलो, ना
मेरे गीत रसीले सुर में
तुम बेसुरिया तान भरो।

मैं खुशियों के ढेर लगा दूँ
तुम खुशियों में आग लगा दो
मैं दूँ जीवनदान तुम्हें कि
तुम चुन-चुन कर वार करो।

मैं ना हारी किसी जंग में
तुमने कोई जंग न जीती
किसी चाह से पहले खुद को
अभिशापों से मुक्त करो.

मैं उड़ कर आकाश को छू लूँ
तुम सीमित धरती के वासी
सपनों में जीने से पहले
अपना बेड़ा पार करो।

Saturday, 18 October 2014

नहीं नहीं Kavita 215

नहीं नहीं

क्या मेरा जीवन मेरे लिए था?
फिर मैंने इसे जिया क्यों नहीं?
नहीं नहीं
यह जीवन मेरे शरीर में था
पर मुझमें नहीं
मैं इसे जीती कैसे
न यह मुझमें था, न मैं इसमें थी.

क्या ये रिश्ते मेरे लिए थे?
फिर निभे क्यों नहीं?
नहीं नहीं
न ये रिश्ते मेरे लिए थे
न मैं इन रिश्तों के लिए थी.
इनमें से कोई भी मेरा नहीं था
न मैं किसी की थी.

क्या ये त्यौहार मुझे हँसाने आए थे?
फिर मैं हँसी क्यों नहीं?
नहीं नहीं
त्यौहार की अपनी एक उजास होती है
किसी के लिए कुछ नहीं
तो किसी के लिए ख़ास होती है
कोई मनाए, न मनाए।

क्या ये मौसम मुझे लुभाने आए थे?
फिर मैं इनमे रमी क्यों नहीं?
नहीं नहीं
मौसम क्रमबद्ध आते हैं
क्रमबद्ध जाते हैं
इंतज़ार नहीं करते
किसी के रमने का.

चारों ओर ऊँचे-ऊँचे पहाड़ हों
उन पर हरियाली लताएँ लटकी हों
बीच घाटी में मैं होऊँ
और तुम्हारी याद हो
क्योंकि तुम तो हो नहीं सकते।
नहीं नहीं, यह भी नहीं होगा
क्योंकि चाहने से कुछ नहीं होता।

Friday, 17 October 2014

सरिता सिंह भदौरिया

सरिता सिंह भदौरिया

मुझे प्रेम कविताएँ लिखना भी पसंद है और पढ़ना भी, खासतौर से ऐसी कविताएँ जिनमे शब्द दर्द में डूब कर निकले हों. दर्द सबके साँझे जो होते हैं. इधर फेसबुक पर Sarita Singh Bhadoriya बहुत बढ़िया प्रेम कविताएँ लिख रही हैं. अभी हाल ही में उन्होंने अपनी दो बेहतरीन कविताएँ पोस्ट की हैं जिनकी मार्मिकता मुझे भीतर तक छू कर अत्यंत उद्वेलित कर गई. सरिता गज़ब की भावनाशील हैं, उनकी कविताओं में रोमैंटिसिज़्म अपने चरम पर होता है. वह बहुत ज़्यादा गहरी हैं, उनमें बहुत गहरे डूबने की क्षमता है. गहन प्रेम की कविता केवल वही लिख सकता है, जिसने प्रेम को दिल की गहराइयों में जिया हो. प्रेम के साथ उठा हो, प्रेम के साथ बैठा हो, प्रेम के साथ मरा हो, ऐसा प्रेम जो अंततः पूजा का रूप हो जाता है, जैसे भगवान की आराधना में प्रस्तुत हुआ हो. सरिता ने मेरी किसी कविता पर लिखा था, "आपका लिखा मुझसे जुड़ा सा लगता है, मैंम।" आज मुझे उसका लिखा मुझसे जुड़ा हुआ लग रहा है. सबके अहसास एक जैसे होते हैं शायद। जब मैंने सरिता की लिखी यह लघु कविता फेसबुक पर पढ़ी कि

उस आखिरी दिन
मैंने कहा, "तुम्हारी नाक बहुत याद आएगी,"
और
एक आँसू की बूँद
उसकी नाक से होते हुए मेरे होंठो पर आ गिरी।
और अब मुझे वो बूँद बहुत याद आती है..... 
तो मुझे लगा, इस लड़की में कुछ तो बात है. मैं आप को उनकी दो कविताएँ पढ़वाने का मोह संवरण नहीं कर पा रही. कृपया पढ़ें। अच्छी लगें तो सराहें, वरना रहने दें.
1.
अब तुम मेरे लिए सिर्फ एक विषय हो, जिसे मैं जीवन भर पढ़ना चाहती हूँ।
तुम्हारे एक तरफ़ा संवाद और अपनी एक तरफ़ा स्वीकृति के साथ!
मैं तुम्हे अपने भीतर जिंदा रखूंगी
ताकि बची रहूँ 'मैं'
क्यूंकि तुम मुझे खुद में मार चुके हो!
और मुझमें मारना चाहते हो खुद को!
मैं तुम्हें मरने नहीं दूंगी
हर्फ़-हर्फ़ खुद में भरूँगी.
तुम रोचक हो,
उत्तेजक हो,
त्रासद हो
अगर जीवन सिर्फ मनोरंजन ही है
तो तुम सार्थक हो मेरे लिए
फिर मैं किसी और विषय को क्यूँ चुनूँ?
मैं जो लिख रही हूँ वो तुम्हारे लिए नहीं
बे-शक वो तुमसे है।
तुम अब कभी रो नहीं सकते
क्यूंकि सुखा दिया है अहम् की धूप में तुमने अपना पानी, कट गए हो ज़मीं से
अब तिनके हो तुम
मैंने अपने आंसू मिला तुम्हारी लुगदी बना ली
हांथों से संवार कर मन पर बिछा दिया
सांसो की गर्मी से सुखाकर पन्ना बना लिया
अब मैं तुम पर लिख रही हूँ!
मैं कर रही हूँ एक तरफ़ा संवाद और,
तुम्हें देनी पड़ रही है बलात् स्वीकृति!
2. 
मैं हर रात मेरी मौत पर मर्सिया पढ़ती हूँ!
मैं हर रात उस पुरुष को भेजती हूँ मुझे दिया गया तोहफा,
मैं सोचती हूँ उसका और क्या है जो मेरे मरने के बाद मुझे उसका ऋणि बनाता हो!?े

उस घर का किराया जिसे भ्रम में अपना समझ स्वर्ग बनाने चल पड़ी थी!
बिजली, पानी, खाना, दूध, शराब और वीर्य!
हाँ! नहीं है मुझ पर प्रेमकर्ज़
जब तक हम साझा थे तब तक हमारी ख़ुशी-ओ-ग़म साझा थे े
मेरा मन-उसका खयाल, उसका स्पर्श-मेरा समर्पण, उसके चुम्बन-मेरा आलिंगन
उसके आंसू और.... मेरे प्राण!

मैं जाने से पहले उसके क़र्ज़ से मुक्त होउंगी
तब तक मैं अपनी मौत हर रोज़ मरूंगी
अपनी ही लाश पर हर रात रोउंगी!
मैं देखती हूँ मैं बैठी हूँ मेरे गाँव के मंदिर के बाएं कोने में
सोच रही हूँ तब भी "उसका कुछ बाकी तो नहीं"
लोग देख रहे हैं मेरी दशा
माँ जड़ होगई हैं और पिता कातर!
उनकी प्रतिष्ठा अब भी धूल में मिली जाती है
भले मैं, उन्हें मुक्ति दे रही हूँ मुझसे
दिन बीत रहे हैं रातें गुज़र रही हैं
मैं सोच रही हूँ क्या उसे पता चल गया होगा?
क्या वो पता कर रहा होगा कहीं से
मेरा कोई संपर्क न पाकर क्या वो सहज होगा?
मेरा जीर्ण होता शरीर और इसे त्यागने को आतुर आत्मा... उसके अंतिम स्पर्श की प्रतीक्षा में, मंदिर के बाएं कोने से एक दूसरे को विदा कह चल दिए!

प्यार अनजान Kavita 214

प्यार अनजान

प्यार को क्या पता था
तुम गोरे हो या काले
छोटे हो या बड़े
अच्छे हो या बुरे?
प्यार को तो बस होना था
जो मुझसे पूछे बिना
तुमसे हो गया.

प्यार को क्या पता था
किससे होना है
कैसे होना है
क्यों होना है?
प्यार को तो बस होना होता है
जो अनजाने में
तुमसे हो गया.

प्यार को क्या पता था
आगे क्या होगा
होगा तो कैसे होगा
होगा भी या नहीं होगा?
प्यार को तो बस होना था
तुम्हारे सम्मोहन में
बिन कोशिश के हो गया.

प्यार को क्या पता था
रास्ते की धुंध का
मौसमों की मार का
टूटते ऐतबार का?
प्यार को तो बस होना था
बिना किसी योजना के
गलत जगह हो गया.

Wednesday, 15 October 2014

मुझसा कोई नहीं Kavita 213

मुझसा कोई नहीं

मुझसा मूरख कोई नहीं
जो कद्रदान को ठुकरा दे.

मुझसा न कोई बेईमान
जो हँस-हँस कर गुमराह करे.

मुझसा झूठा कोई नहीं
मैं खुश हू, जो हर वक़्त कहे.

मुझसा दम्भी कोई नहीं 
जो दीन-हीन हो कर इठलाए.

मुझसा कोई कंजूस नहीं
जो ना खर्चें ग़म की दौलत.

मुझसा कोई बेतुका नहीं
जो मुश्किल को पाना चाहे.

मुझसा कातिल कोई नहीं
जो अपने सपनों का खून करे.

मुझसा पागल कोई नहीं
जो दुःख में भी हँसता जाए.

मुझसा कोई बेसुरा नहीं
जो आशा के गाने गाए.

मुझसा न कोई भाग्यवान
जो फिर भी अच्छा फल पाए.

Tuesday, 14 October 2014

और वह सचमुच मर गया

और वह सचमुच मर गया.

जिसके बारे में मैंने कल पोस्ट किया था, "This is written in good faith…… कि लड़के भी पागलपन की हद तक प्यार करते हैं." संयोग या दुर्योग कहिए, मुझे कल रात पता चला कि उस 28 वर्षीय मेधावी लड़के की पिछले माह मृत्यु हो गई. कैसे हुई, कुछ पता नहीं। बस मैंने उसकी फेसबुक प्रोफाइल खोली, यह देखने के लिए कि देखूँ, वह क्या लिख रहा है और उससे पूछूँ कि उसकी समस्या का कोई हल निकला या नहीं, तो देखती गई, उसकी लिखी कोई पोस्ट नहीं, सब टैग्ड पोस्ट थीं. पिछले महीने में एक मित्र ने उसे टैग करके उसकी फोटो के साथ यह पोस्ट डाली थी कि ये अब हमारे बीच नहीं रहे. कमेंट्स में लोगों ने पूछा कि क्या हुआ था तो मित्र ने लिखा कि एक दिन पहले लोकल अखबार में उनकी मृत्यु की खबर छपी थी. अप्राकृतिक मृत्यु रही होगी, शायद आत्महत्या की होगी, तभी तो अखबार में खबर छपी. उसने सच कहा था. अनजाने ही मैंने कल उस दोस्त को याद किया और पोस्ट लिख दी. मुझे पता ही नहीं था कि अब वह इस दुनिया में नहीं है. बहुत दुखी महसूस कर रही हूँ, पूरी रात सो नहीं पाई. रात को अकेले रोने की बजाय दो मित्रों से शेयर किया। वाकई, इस खबर से मैं हिल गई हूँ. जैसे वह मेरा ही पुत्र हो.......
उसे ह्रदय से श्रद्धांजलि देते हुए उसके कुछ चुनींदा मैसेज आप सब को पढ़वाना चाहती हूँ. उसे बदनाम करना मेरा उद्देश्य नहीं, बस, सच्चे भावुक लोगों से मेरा यही कहना है (खुद मुझसे भी) कि प्रेम बेशक अंधा कहा गया है लेकिन सच्चे लोग आँख खोल कर ही प्रेम-पात्र का चुनाव करें। सबको अपने बारे में पता होता है कि कौन भावनाओं में जुड़ कर कितना टूट सकता है. अतः खुदगर्ज़ और कमीने लोगों की पहचान करें, जिन्हें दूसरे की भावनाओं से खेलने में कोई फर्क नहीं पड़ता और उन्हें अपने से दूर रखें। मृत्यु किसी समस्या का हल नहीं है. प्रेम के सिवा और भी ज़िम्मेदारियाँ हैं, जिनके लिए आपको ज़िंदा रहना है.
Conversation started ......
08:49
hello ma'm i want to contact you just now
pls ma'm i'm in trouble just guide me
08:51
Manika Mohini
Write your problem here.
08:53
i was happy in the morning but now i'm feeling very bad
08:54
Manika Mohini
Write the whole thing.
08:56
i'm in love with a married woman she is approx 9 years older than me
i'm 28 years old
08:56
Manika Mohini
Are you unmarried?
08:57
i'm weeeping too much
08:57
Manika Mohini
Is she also in love with you?
08:57
i'm unmarried
she also loves me
08:58
Manika Mohini
Who took the initiative?
08:58
I
I need your help ma'm, pls guide me
08:59
Manika Mohini
You both agree then what is the prob?
And this is going for how long?
09:01
i love her too much
it started when her husband scolded her very badly
with any reason
sorry without any reason
just 1 year
she was going to die two days before
just guide me pls
09:23
Manika Mohini
You must be doing some job or business.
09:23
i'm ......
09:23
Manika Mohini
Do you love her so much that u can even marry her?
09:24
yes
she also ready
09:24
Manika Mohini
If yes, ask her 2 take divorce and marry her or leave her on her fate.
09:25
but samaj ka dar
09:26
Manika Mohini
Divorce is so common these days. And samaj ka kya darr when u both r ready.
09:27
but if her husband doesn't divorce?
09:27
Manika Mohini
Decide and choose one, either samaj or love.
09:28
ok thanks ma'm
i'll chose love
09:28
Manika Mohini
pahle divorce initiate to karen. She can tell her husband some solid reason for divorce.
Does she have children?
09:29
yes, ......
09:29
Manika Mohini
R u ready 2 accept them?
09:30
but they also do not love her
yes
09:31
Manika Mohini
Just find out in ur heart whether its love or just physical thing.
If u marry her, u may have problems after marriage. U may not like her later.
09:32
love because whenever she is in front of me i will feel relaxed
09:33
Manika Mohini
What is d age of her kids?
Does her husband not love her, doesnt care for her & kids?
09:35
he care her kids but not her
ok thanks ma'm
09:36
I'll contact you later
09:36
Manika Mohini
Ok
God bless u. If kids r not very young, she can go ahead for divorce. Bye
09:47
sorry ma'm, i was in dilemma. just now when i asked her for divorce then she refused
now feeling good
thanks ma'm
10:31
Manika Mohini
Kamaal hai, aapki problem ka hal itni jaldi ho gaya jaise koi problem thi hi nahi.
Same day
20:14
ma'm problem ka hal to nahi hua but thoda relax feel kar raha hun
21:46
Manika Mohini
If you think rationally, you will find that you are not the only one whe could not get his love. You can get a very good wife. Bhagwan ek darwaza band karta hai to doosara apne aap khul jata hai. If you are able to continue in this relationship, continue, but this will not lead you any where. Find out some other outlet. Remain alone for sometime, and then search for a suitable life partner. God is always there to help everybody. Give some time to yourself. You are only 28. There must be someone better for you existing in this world. Keep your mind cool. Log mar bhi jaate hain, tab bhi to ham unke bina jeete hain. Its a long life. You will find many good people. I wish all the happiness for you.
3 days later
19.49
Thanks ma'm
L

Monday, 13 October 2014

छोटी सी चिंगारी

छोटी सी चिंगारी 

मुझसे फेसबुक पर बहुत लोग निकटता महसूस करते हैं और अपनी समस्याएँ डिस्कस करते हैं. अपनी कितनी गुप्त बातें भी बता देते हैं. मेरी रचनाओं से, मेरी पोस्ट से लोगों को लगता है कि मैं प्रेम के मसले सुलझाने में पारंगत हूँ. (यह बात उन्हें नहीं पता कि मैं अपने ही मसले नहीं सुलझा पाती।) एक मित्र से जब मैंने पूछा कि आपने मुझ अनजान पर कैसे भरोसा किया तो उन्होंने कहा, "आपकी रचनाओं से, आपके चेहरे से, आपकी मुस्कराहट से, आपकी आँखों से मुझे यह विश्वास हुआ कि मैं अपना यह रहस्य आपने साथ बाँट सकता हूँ." तो कई बार ऐसा होता है कि दूर बैठे भी किसी के साथ हमारी हृदयतन्त्री मिल जाती है और हम अपना दुःख-सुख बाँट लेते हैं.

कुछ समय पूर्व एक 28 वर्षीय पुरुष ने मुझे लिखा, "यदि आपने मेरी समस्या का समाधान नहीं किया तो मैं आत्महत्या कर लूँगा।" मैंने समस्या बताने के लिए कहा. पूरा दिन मैसेज करके उन्होंने बताया कि वे अविवाहित हैं और अपने से सात वर्ष बड़ी एक विवाहित महिला से उनका प्रेम सम्बन्ध है, तथा शारीरिक सम्बन्ध भी है. उस महिला के तीन या चार? बड़े बच्चे हैं. वह महिला भी उनसे उतना ही प्रेम करती है, उसके पति का व्यवहार उसके साथ ठीक नहीं है. मैंने कहा, "जब आप दोनों ही एक-दूसरे से इतना प्रेम करते हैं तो समस्या कहाँ है? यूँ ही चलाते रहिए।" वे बोले, "नहीं, अब मुझसे यह बर्दाश्त नहीं होता कि वह एक गैर मर्द के साथ रहे."

"गैर मर्द? मैं समझी नहीं।" मैंने पूछा।

"उसका पति. न जाने रात में वह उसके साथ क्या करता होगा। सोच कर ही मेरा खून खौल उठता है। मेरे लिए अब यह बात बर्दाश्त के बाहर होती जा रही है कि वह प्यार मुझसे करती है और रहती किसी और के साथ है. मैं मर जाऊँगा, मणिका जी, आप कुछ कीजिए।"

मैं कहना चाहती थी कि गैर मर्द तो आप हैं, लेकिन उस समय यह कहना उन मित्र का दिल तोडना होता। मैंने पूछा, "आप मुझसे क्या सहयोग चाहते हैं?"

"आप मुझे बताएँ कि मैं उसके आदमी को रास्ते से कैसे हटाऊँ? मैं उसके बिना ज़िंदा नहीं रह सकता। मैं ज़हर खा लूँगा।" प्यार वाकई जुनूनी होता है.

"क्या आप उस औरत से शादी कर सकते हैं?" मैंने पूछा।

"ज़रूर कर सकता हूँ, करना चाहता हूँ पर कैसे करूँ?"

"क्या आप उसके बच्चों को, जो आपसे दस-बारह साल छोटे हैं, अपने बच्चों की तरह अडॉप्ट करेंगे? उनके पिता बनेंगे?" मैंने पूछा।

"हाँ, ज़रूर बनूँगा, लेकिन बच्चे शायद माँ के साथ आना पसंद न करें क्योंकि वे अपने पिता से ज़्यादा प्यार करते हैं." यहाँ मुझे लगा कि बच्चों के लिए उनके मन में पूर्ण स्वीकार नहीं है.

"फिर भी, आप अपनी बताएँ कि बच्चों को अपनाने में आपको कोई ऐतराज़ तो नहीं?" मैंने फिर पूछा।

"नहीं, मुझे कोई ऐतराज़ नहीं।"

"आपके घरवालो को ....… "

"मुझे किसी की कोई परवाह नहीं।"

"तो ऐसा कीजिए, उन महिला से कहिए कि आप उनसे शादी करना चाहते हैं, वे अपने पति से तलाक लेने की तैयारी करें।" मैंने उन्हें सुझाव दिया।

"मैं अभी उनसे यह पूछता हूँ, और आपसे रात को फिर बात करता हूँ." उन्होंने कहा. मैंने सोचा, फोन पर पूछ रहे होंगे या उनसे मिलने चले गए होंगे।

रात को उनका मैसेज आया, "मणिका जी, वे अपने पति से तलाक लेने के लिए तैयार नहीं हैं. मैंने बहुत कहा, उनके आगे रोया, गिड़गिड़ाया कि मैं उनके बिना जी नहीं सकता लेकिन वे नहीं मानीं। कहने लगीं, इतने बड़े बच्चे हैं, ये सब बातें शोभा नहीं देतीं, उनका पति जैसा भी है, वह उसी के साथ गुज़ारा कर लेंगी।"

"अब आप सोचिए कि आपको क्या करना है? यूँ ही अधर में लटके रहना है या move on करना है? यह सोच कर अपने दिल को समझाइए कि आपने प्यार तो सच्चा किया लेकिन पात्र सही नहीं चुना।" मैंने पूछा।

"पता नहीं, मैं मर जाना चाहता हूँ. एकदम से उसे नहीं छोड़ पाऊँगा।"

"एक झटके से तोड़ दीजिए, कष्ट एक ही बार होगा। रोज़ थोड़ा-थोड़ा तोड़ेंगे तो कष्ट रोज़ होगा।" मैंने कहा और मैसेज बॉक्स बंद कर के सो गई.

सुबह उठी तो आधी रात को आया हुआ उन मित्र का मैसेज देखा, लिखा था, "आपसे बात करके बहुत तसल्ली मिली। मैं रोज़ उसके साथ भागने के ख्वाब देखता था, सोचता था, जब कहूँगा, वह मेरे साथ भाग चलेगी, सब कुछ छोड़-छाड़ कर. उसे तलाक दिलवा कर शादी करने की बात कभी सोची ही नहीं थी. आपने सुझाया तो अच्छा हुआ, उसका जवाब पता चल गया. अब अपने को समेटूँगा। फिलहाल, बड़ा हल्का महसूस कर रहा हूँ. आपका शुक्रिया।"

मुझे हैरानी हुई, लो, यह तो जैसे कोई समस्या ही नहीं थी, इतना चटपट इसका समाधान भी निकल आया. कई बार एक छोटी सी चिंगारी ही रोशनी दे जाती है. लेकिन यह भी मानना पड़ेगा दोस्तों कि लड़के भी पागलपन की हद तक प्यार करते हैं.

(Words 813 / Pages 3)

Wednesday, 8 October 2014

जीवे तेरा भाई, गली-गली भौजाई

जीवे तेरा भाई, गली-गली भौजाई

(31.10.2014 को 'जनसत्ता' में पृष्ठ 6 पर 'समांतर' कॉलम में "मुहावरों का दंश" शीषक से प्रकाशित)

सन्दर्भ : स्त्री-पुरुष सम्बन्ध / आकर्षण। लड़कियाँ सामान्यतया अच्छी होती हैं, अपवादस्वरूप खराब होती हैं. लड़के सामान्यतया खराब होते हैं, अपवादस्वरूप अच्छे होते हैं. लड़कों में आमतौर पर रेपिस्ट प्रवृत्ति पाई है. हर औरत को छूना-छेड़ना वे अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझते हैं. रानी-महारानी से लेकर नौकरानी तक पर उनकी बुरी नज़र होती है. गरीब, लाचार और बिना पढ़ी-लिखी लड़कियाँ आसान-शिकार होती हैं. प्रेम-व्रेम नाम की भावना लड़कों में कम ही पाई जाती है (अपवादों को छोड़ कर. अपवादस्वरूप मैंने ऐसे लड़के भी देखे हैं जो अपने प्रेम को पाने के लिए या प्रेम के छिनने पर पागल से हो गए.) लड़के यदि किन्हीं लड़कियों को हाथ लगाने की जुर्रत नहीं कर पाते तो वे होती हैं ऐसी लड़कियाँ जो धाकड़ यानि मर्दमार तरीके से रहती हैं. ऐसी लड़कियों से लड़के डर जाते हैं. ये डरने वाले लड़के भी अच्छे नहीं होते, बस डरे हुए होते हैं, इसलिए अच्छे बने हुए होते हैं.

अतीत के गर्भ में दबी एक बात अचानक मेरे स्मृतिपटल पर कौंध गई है, जिसे यहाँ बताना संगत लग रहा है.

मेरे पिता यानि दादा-दादी का घर पुरानी दिल्ली की एक गन्दी गली में एक बहुत बड़ी हवेली टाइप था. उसके आसपास भी हमारे मकान थे, जिन सब मे दादा का पूरा खानदान (तीन बेटों का) मिल-जुल कर रहता था. सबकी रसोई अलग-अलग थी लेकिन हर घडी का साथ था, मतलब एक-दूसरे में पूरी दखलंदाज़ी थी, जिसमे खूब आनंद आता था. मेरे एक तहेरे भाई थे यानि ताऊ जी के बेटे। हम इस वाले हिस्से में रहते थे, वो अपनी पत्नी सहित सामने वाले हिस्से में. सामने वाले हिस्से में ही दो और तहेरे भाई अपने परिवार सहित ऊपर-नीचे रहते थे. मुझसे सबका ख़ास प्यार था. भाइयों के साथ भी मेरी खूब पटती थी और भाभियों के साथ भी.

मेरे यह सामने वाले भाई बहुत ही हँसी-मज़ाकिया एवं प्रत्युत्पन्नमति थे. उनकी पत्नी से अच्छी बनती थी. दोनों के बीच कभी कोई मनमुटाव नहीं हुआ था। भाभी ज़्यादातर खीज कर, झुँझला कर ही बोलतीं थीं, लेकिन कोई बुरा नहीं मानता था और वो वैसे बोलते हुए अच्छी भी लगती थीं. सभी को चाय का बड़ा शौक था, हर घंटे चाय चाहिए थी. छुट्टी के दिन बस चाय-चाय. शाम को चाय बनते ही भाई की आवाज़ आती, 'मोहिनी, आ जा.' मैं जब अपने छज्जे पर खड़ी हो कर अपनी चाय पीती तो भाई भाग कर आते और मेरे कप में से एक घूँट ज़रूर पीते। हमें एक-दूसरे की जूठी चाय पीने में बड़ा मज़ा आता था. मुझे अपने सारे भाई बहुत पसंद थे और सारी भाभियाँ भी

बस, मैं कोई कहानी नहीं लिख रही, न सुना रही. यह थी मेरी आगे की बात की भूमिका।

मैं उस वक़्त बहुत छोटी थी, दस-बारह, तरह-चौदह, ऐसे ही कुछ. सारे भाई शाम को छत पर गुड्डी उड़ाते (हम पतंग को गुड्डी कहते थे). मैं चरखी पकड़ती। आसपास की सभी छतों पर गुड्डियाँ उड़तीं। भाभियों की अठखेलियाँ, वो काटा, वो काटा। मैंने एक शाम भाभियों से कहा, 'वो देखो सामने की छत वाला लड़का, उसकी कोई गुड्डी अभी तक नहीं कटी.'

तीनों भाभियों ने मेरा मुँह बंद कर दिया और एक कोने में ले जा कर फुसफुसा कर बोलीं, 'चुप. खबरदार जो किसी लड़के की बात की, तेरे भाई, बाप, ताऊ सुनेंगे तो तुझे यहीं गाड़ देंगे।'

मैं हैरान। मुझे समझ नहीं आया कि हुआ क्या?

फिर एक दिन मेरे चहेते भाई वाली भाभी भाई से खीज कर बोलीं, 'मेरे बस का नहीं है हर वक़्त चाय बनाना। अभी तो पी थी, अभी फिर बनाओ।'

मैं पास ही खड़ी थी. मैंने मज़ाक में कहा, 'भाई, आप भाभी को इतना तंग करेंगे तो भाभी आपसे बात करना बंद कर देंगी।'

भाई नाटकीय अंदाज़ में बोले, 'मोहिनी, तू फ़िक्र न कर. जीवे तेरा भाई, गली-गली भौजाई।'

क्या यह कोई मुहावरा था या भाई ने खुद ही बनाया था? लेकिन क्या कोई बहन अपने भाई से यह कह सकती है, भाई, जीवे तेरी बहना, गली-गली.......  छिः छिः वह लड़की तो वेश्या ही हो गई जिसके गली-गली में…… यदि ऐसी बात लड़की के लिए घृणित है, त्याज्य है, तो लड़कों के लिए क्यों नहीं? लड़के मज़ाक में अपने साथ अनेक लड़कियों को जोड़ कर गौरवान्वित होते हैं या कम से कम दिखाते हैं. मेरा कहने का अभिप्राय यह नहीं कि लड़कियाँ भी ऐसे बोलें बल्कि यह है कि लड़के इस तरह का बतरस आम लेते हैं और इसमें कुछ गलत नहीं समझा जाता, उन्हें कोई बुरा नहीं कहता। तो ऐसा क्यों है?

Monday, 6 October 2014

एक अपठनीय पोस्ट

एक अपठनीय पोस्ट

सन्दर्भ : स्त्री-पुरुष सम्बन्ध / आकर्षण। लड़कियाँ सामान्यतया अच्छी होती हैं, अपवाद स्वरुप खराब होती हैं. लड़के सामान्यतया खराब होते हैं, अपवादस्वरूप अच्छे होते हैं. (इस बात पर लड़के मेरी जान लेने पर उतारू हो सकते हैं, पर मैं क्या करूँ, अनुभव तो यही कहता है.) लड़कों में आमतौर पर रेपिस्ट प्रवृत्ति पाई है. हर औरत को छूना-छेड़ना वे अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझते हैं. रानी-महारानी से लेकर नौकरानी तक पर उनकी बुरी नज़र होती है. लड़की जब तक स्वयं अपनी रक्षा करने के काबिल न बने, तब तक वह असुरक्षित ही होती है. गरीब, लाचार और बिना पढ़ी-लिखी लड़कियाँ आसान-शिकार होती हैं. प्रेम-व्रेम नाम की भावना लड़कों में कम ही पाई जाती है (अपवादों को छोड़ कर. अपवादस्वरूप मैंने ऐसे लड़के भी देखे हैं जो अपने प्रेम को पाने के लिए या प्रेम के छिनने पर पागल से हो गए.) लड़के यदि किन्हीं लड़कियों को हाथ लगाने की जुर्रत नहीं कर पाते तो वे होती हैं ऐसी लड़कियाँ जो धाकड़ यानि मर्दमार तरीके से रहती हैं, सिगरेट-शराब पीती हैं, बेधडक हो कर लड़कों को अपनी बाहों में भर लेती हैं. ऐसी लड़कियों से लड़के डर जाते हैं. ये डरने वाले लड़के भी अच्छे नहीं होते, बस डरे हुए होते हैं, इसलिए अच्छे बने हुए होते हैं.

यदि पुरुषों की रेपिस्ट प्रवृत्ति ख़त्म करनी है तो लड़कियों, उनके साथ वही सलूक करो, जैसा वे लाचार लड़कियों के साथ करते हैं. यकीन मानो, वे उस स्थिति को कभी एन्जॉय नहीं कर पाएँगे, बल्कि आपसे दूर भागेंगे। समाज को बदलना है तो बने-बनाए खाँचे को पहले तोडना होगा, फिर उसे नए सिरे से गढ़ना होगा। सब कुछ एक बार तहस-नहस होगा, तभी ना नया बनेगा? नए पुरुष का निर्माण करना है तो नारी को भी तो नए रूप में सामने आना होगा। तो डर कैसा? झिझक कैसी? जैसे आज तक पुरुष करता आया है, इस्तेमाल किया और फेंका। अब लड़कियों, तुम भी यही करो. (यह कथन ऐसे पुरुषों के लिए नहीं है जो अपवादस्वरूप अच्छे हैं. अच्छे पुरुषों को गले से लगाओ, बुरों को ठीक करने के लिए मिसाल बनो, समाज के लिए मशाल बनो.)

Sunday, 5 October 2014

इतना कि बस Kavita 212

इतना कि बस

कल्पनाओं के महल ऊँचे
महल ऊँचे इतने
इतने कि बस.
पल में खंडहर हुए
खंडहर हुए इतने
इतने कि बस.
दिल में उठे झंझावात
झंझावात इतने
इतने कि बस.
सवाल रहे अनसुलझे
अनसुलझे इतने
इतने कि बस.

आँखों से खून झरा
खून झरा इतना
इतना कि बस.
सीने में शूल चुभा
शूल चुभा इतना
इतना कि बस.
बजता-बजता गीत रुका
गीत रुका इतना
इतना कि बस.
अकड़ा हुआ शीश झुका
शीश झुका इतना
इतना कि बस.

रोशनी की आभ घटी
आभ घटी इतनी
इतनी कि बस.
फूलों की गंध छँटी
गंध छँटी इतनी
इतनी कि बस.
उम्मीदें डूब गईं
डूब गईं इतनी
इतनी कि बस.
अँधियारी साँय-साँय
साँय-साँय इतनी
इतनी कि बस.

बहुत कहा, बहुत कहा
इतना कहा, इतना कहा
इतना कि बस.
बहुत सुना, बहुत सुना
इतना सुना, इतना सुना
इतना कि बस.
बहुत हुआ, बहुत हुआ
इतना हुआ, इतना हुआ
इतना कि बस.
बहुत सहा, बहुत सहा
इतना सहा, इतना सहा
इतना कि बस.

Saturday, 4 October 2014

एक व्यक्तिगत क्षण Kavita 211

एक व्यक्तिगत क्षण

वह ख़ास शख्स बहुत आम था
हवा के एक हल्के से झोंके में बह गया.
मज़बूत दरख़्त की तरह
उसकी जड़ें जमी होंगी ज़मीन में,
मेरा वहम था.
उसे टूटने के लिए
सिर्फ एक बहाने का इंतज़ार था.
इतनी भव्य इमारत की नींव
क्या इतनी खोखली थी
जो एक ज़रा से झटके से ढह गई?
पुख्ता नहीं थे उसके पाँव
कमज़ोर थे उसके मन के शिकंजे
भावुक नहीं था वह
पर मन पर कोई लगाम भी नहीं कसी थी.
मैं भी ढह गई
जब मैंने उसे गिरते हुए देखा
ख़ास से आम बनते हुए देखा.
मेरे सब्र के लिए
बस एक सकारात्मक भाव था
वह पूरा नहीं गिरा था
वह पूरा नहीं टूटा था.
मेरी शर्म के लिए इतना काफी था.

Friday, 3 October 2014

राम की पाती रावण के नाम Kavita 210

राम की पाती रावण के नाम

तुम्हारे मरने का एक दिन नियत है
लेकिन मैं रोज़ मर रहा हूँ
तिल-तिल जल रहा हूँ
क्योंकि मैं मर्यादा पुरुषोत्तम हूँ.

मर्यादा में रहना कोई आसान काम नहीं
नियमों का पाबन्द होना सरल नहीं होता
संस्कारों का निर्वहन हरेक के बस की बात नहीं
सहनशीलता को अर्जित किया है मैंने।

तुम विद्वान थे पर अहंकारी भी
तुम ज्ञानी थे पर अज्ञानी भी
तुम सर्वज्ञ थे पर अल्पज्ञ भी
इसीलिए सिद्ध होने पर भी निष्फल हुए.

काश ! तुमने भी बाँधा होता खुद को
तुमने भी खींची होती अपने लिए कोई रेखा
तुमने भी मारा होता अपने मन को
काश ! तुम्हें गुरूर न होता अपने होने पर.

तो इस तरह न मरते तुम सरेआम
इस तरह न फूँके जाते तुम्हारे पुतले।
इस तरह गली--गली चौराहे-चौराहे
न होता तुम्हारे होने पर हाहाकार।

सब कुछ पाने की धुन में कौन जीता है?
सब कुछ छोड़ने पर भी कौन रीता है?
एक दिन मर कर तुम हमेशा के लिए मरे
रोज़-रोज़ मर कर मैं हमेशा के लिए जिया।

(आओ, श्राद्ध के दिनों में रावण का श्राद्ध करें।)