Monday, 6 October 2014

एक अपठनीय पोस्ट

एक अपठनीय पोस्ट

सन्दर्भ : स्त्री-पुरुष सम्बन्ध / आकर्षण। लड़कियाँ सामान्यतया अच्छी होती हैं, अपवाद स्वरुप खराब होती हैं. लड़के सामान्यतया खराब होते हैं, अपवादस्वरूप अच्छे होते हैं. (इस बात पर लड़के मेरी जान लेने पर उतारू हो सकते हैं, पर मैं क्या करूँ, अनुभव तो यही कहता है.) लड़कों में आमतौर पर रेपिस्ट प्रवृत्ति पाई है. हर औरत को छूना-छेड़ना वे अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझते हैं. रानी-महारानी से लेकर नौकरानी तक पर उनकी बुरी नज़र होती है. लड़की जब तक स्वयं अपनी रक्षा करने के काबिल न बने, तब तक वह असुरक्षित ही होती है. गरीब, लाचार और बिना पढ़ी-लिखी लड़कियाँ आसान-शिकार होती हैं. प्रेम-व्रेम नाम की भावना लड़कों में कम ही पाई जाती है (अपवादों को छोड़ कर. अपवादस्वरूप मैंने ऐसे लड़के भी देखे हैं जो अपने प्रेम को पाने के लिए या प्रेम के छिनने पर पागल से हो गए.) लड़के यदि किन्हीं लड़कियों को हाथ लगाने की जुर्रत नहीं कर पाते तो वे होती हैं ऐसी लड़कियाँ जो धाकड़ यानि मर्दमार तरीके से रहती हैं, सिगरेट-शराब पीती हैं, बेधडक हो कर लड़कों को अपनी बाहों में भर लेती हैं. ऐसी लड़कियों से लड़के डर जाते हैं. ये डरने वाले लड़के भी अच्छे नहीं होते, बस डरे हुए होते हैं, इसलिए अच्छे बने हुए होते हैं.

यदि पुरुषों की रेपिस्ट प्रवृत्ति ख़त्म करनी है तो लड़कियों, उनके साथ वही सलूक करो, जैसा वे लाचार लड़कियों के साथ करते हैं. यकीन मानो, वे उस स्थिति को कभी एन्जॉय नहीं कर पाएँगे, बल्कि आपसे दूर भागेंगे। समाज को बदलना है तो बने-बनाए खाँचे को पहले तोडना होगा, फिर उसे नए सिरे से गढ़ना होगा। सब कुछ एक बार तहस-नहस होगा, तभी ना नया बनेगा? नए पुरुष का निर्माण करना है तो नारी को भी तो नए रूप में सामने आना होगा। तो डर कैसा? झिझक कैसी? जैसे आज तक पुरुष करता आया है, इस्तेमाल किया और फेंका। अब लड़कियों, तुम भी यही करो. (यह कथन ऐसे पुरुषों के लिए नहीं है जो अपवादस्वरूप अच्छे हैं. अच्छे पुरुषों को गले से लगाओ, बुरों को ठीक करने के लिए मिसाल बनो, समाज के लिए मशाल बनो.)

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