Friday, 17 October 2014

सरिता सिंह भदौरिया

सरिता सिंह भदौरिया

मुझे प्रेम कविताएँ लिखना भी पसंद है और पढ़ना भी, खासतौर से ऐसी कविताएँ जिनमे शब्द दर्द में डूब कर निकले हों. दर्द सबके साँझे जो होते हैं. इधर फेसबुक पर Sarita Singh Bhadoriya बहुत बढ़िया प्रेम कविताएँ लिख रही हैं. अभी हाल ही में उन्होंने अपनी दो बेहतरीन कविताएँ पोस्ट की हैं जिनकी मार्मिकता मुझे भीतर तक छू कर अत्यंत उद्वेलित कर गई. सरिता गज़ब की भावनाशील हैं, उनकी कविताओं में रोमैंटिसिज़्म अपने चरम पर होता है. वह बहुत ज़्यादा गहरी हैं, उनमें बहुत गहरे डूबने की क्षमता है. गहन प्रेम की कविता केवल वही लिख सकता है, जिसने प्रेम को दिल की गहराइयों में जिया हो. प्रेम के साथ उठा हो, प्रेम के साथ बैठा हो, प्रेम के साथ मरा हो, ऐसा प्रेम जो अंततः पूजा का रूप हो जाता है, जैसे भगवान की आराधना में प्रस्तुत हुआ हो. सरिता ने मेरी किसी कविता पर लिखा था, "आपका लिखा मुझसे जुड़ा सा लगता है, मैंम।" आज मुझे उसका लिखा मुझसे जुड़ा हुआ लग रहा है. सबके अहसास एक जैसे होते हैं शायद। जब मैंने सरिता की लिखी यह लघु कविता फेसबुक पर पढ़ी कि

उस आखिरी दिन
मैंने कहा, "तुम्हारी नाक बहुत याद आएगी,"
और
एक आँसू की बूँद
उसकी नाक से होते हुए मेरे होंठो पर आ गिरी।
और अब मुझे वो बूँद बहुत याद आती है..... 
तो मुझे लगा, इस लड़की में कुछ तो बात है. मैं आप को उनकी दो कविताएँ पढ़वाने का मोह संवरण नहीं कर पा रही. कृपया पढ़ें। अच्छी लगें तो सराहें, वरना रहने दें.
1.
अब तुम मेरे लिए सिर्फ एक विषय हो, जिसे मैं जीवन भर पढ़ना चाहती हूँ।
तुम्हारे एक तरफ़ा संवाद और अपनी एक तरफ़ा स्वीकृति के साथ!
मैं तुम्हे अपने भीतर जिंदा रखूंगी
ताकि बची रहूँ 'मैं'
क्यूंकि तुम मुझे खुद में मार चुके हो!
और मुझमें मारना चाहते हो खुद को!
मैं तुम्हें मरने नहीं दूंगी
हर्फ़-हर्फ़ खुद में भरूँगी.
तुम रोचक हो,
उत्तेजक हो,
त्रासद हो
अगर जीवन सिर्फ मनोरंजन ही है
तो तुम सार्थक हो मेरे लिए
फिर मैं किसी और विषय को क्यूँ चुनूँ?
मैं जो लिख रही हूँ वो तुम्हारे लिए नहीं
बे-शक वो तुमसे है।
तुम अब कभी रो नहीं सकते
क्यूंकि सुखा दिया है अहम् की धूप में तुमने अपना पानी, कट गए हो ज़मीं से
अब तिनके हो तुम
मैंने अपने आंसू मिला तुम्हारी लुगदी बना ली
हांथों से संवार कर मन पर बिछा दिया
सांसो की गर्मी से सुखाकर पन्ना बना लिया
अब मैं तुम पर लिख रही हूँ!
मैं कर रही हूँ एक तरफ़ा संवाद और,
तुम्हें देनी पड़ रही है बलात् स्वीकृति!
2. 
मैं हर रात मेरी मौत पर मर्सिया पढ़ती हूँ!
मैं हर रात उस पुरुष को भेजती हूँ मुझे दिया गया तोहफा,
मैं सोचती हूँ उसका और क्या है जो मेरे मरने के बाद मुझे उसका ऋणि बनाता हो!?े

उस घर का किराया जिसे भ्रम में अपना समझ स्वर्ग बनाने चल पड़ी थी!
बिजली, पानी, खाना, दूध, शराब और वीर्य!
हाँ! नहीं है मुझ पर प्रेमकर्ज़
जब तक हम साझा थे तब तक हमारी ख़ुशी-ओ-ग़म साझा थे े
मेरा मन-उसका खयाल, उसका स्पर्श-मेरा समर्पण, उसके चुम्बन-मेरा आलिंगन
उसके आंसू और.... मेरे प्राण!

मैं जाने से पहले उसके क़र्ज़ से मुक्त होउंगी
तब तक मैं अपनी मौत हर रोज़ मरूंगी
अपनी ही लाश पर हर रात रोउंगी!
मैं देखती हूँ मैं बैठी हूँ मेरे गाँव के मंदिर के बाएं कोने में
सोच रही हूँ तब भी "उसका कुछ बाकी तो नहीं"
लोग देख रहे हैं मेरी दशा
माँ जड़ होगई हैं और पिता कातर!
उनकी प्रतिष्ठा अब भी धूल में मिली जाती है
भले मैं, उन्हें मुक्ति दे रही हूँ मुझसे
दिन बीत रहे हैं रातें गुज़र रही हैं
मैं सोच रही हूँ क्या उसे पता चल गया होगा?
क्या वो पता कर रहा होगा कहीं से
मेरा कोई संपर्क न पाकर क्या वो सहज होगा?
मेरा जीर्ण होता शरीर और इसे त्यागने को आतुर आत्मा... उसके अंतिम स्पर्श की प्रतीक्षा में, मंदिर के बाएं कोने से एक दूसरे को विदा कह चल दिए!

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