Friday, 24 October 2014

धार्मिक पाखण्ड : भूत

धार्मिक पाखण्ड : भूत 

अपने बचपन और किशोरावस्था तक मैंने धर्म के नाम पर बहुत पाखण्ड होते देखे। उस समय मेरा निवास मेरे पिता के घर में था, जो एक गन्दी गली में था, जहाँ पिछड़ापन, दकियानूसीपन अपने चरम पर था शायद यह गन्दी गलियों में पिछड़े वर्गों के बीच रहने का अभिशाप था कि रोज़ कीर्तन देखने-सुनने पड़ते थे, रोज़ भजन-मंडली घर-घर में भजन गा रही थी, रोज़ किसी के सिर पर देवी आ रही थी, रोज़ किसी पर भूत चढ़ जाता था, जिसका भूत उतारने के लिए मार-मार कर उसकी दुर्गति कर दी जाती थी. मुझे याद है, एक बार एक पंद्रह-सोलह साल की लड़की पर आया भूत उतारने के लिए एक तथाकथित साधु आया था, जिसके द्वारा उसके बाल पकड़ कर उसे आग में झोंकते हुए मैंने देखा था, लड़की को डंडों से पीटा गया, साथ में साधु के शब्द, 'जाता है या नहीं? छोड़ इस लड़की का पीछा। निकल इसके शरीर से. मैं तुझे पीट-पीट कर भगा दूंगा। तू कैसे नहीं जाएगा?' आदि आदि. (क्या यह किसी बलात्कार से कम था?) वह लड़की पिट-पिट कर मरगिल्ली हो गई थी, गली के सारे लोग उस ड्रामे को देखने के लिए एकत्र थे  किसी को उस लड़की पर तरस नहीं आया था, सब एक जैसे विचारों के थे और एक जैसे निर्दयी थे. इसलिए कौन उसे बचाता? मैं इस ड्रामे को देख रही थी, दहशत में थी, उस लड़की के लिए हमदर्द थी, भीतर ही भीतर रो रही थी, लेकिन मैं कुछ कर नहीं सकती थी. उसके बाद दिनों उस लड़की को निढाल लेटे देखा था. बाद में उसका क्या हुआ, कुछ पता नहीं।

धार्मिक पाखण्ड का यह स्वरुप मेरे पिता के परिवार में नहीं होता था पर वे दकियानूसी और पिछड़े विचारों के ज़रूर थे. मुझे याद है, मेरे माता-पिता इन ड्रामों में शामिल नहीं होते थे. मेरे माता-पिता तो अब नहीं है, लेकिन वह पुश्तैनी घर आज भी वहीँ है, जिसमे मेरे भाई और उनका परिवार रहता है. वह गली आज भी गन्दी है, वहाँ लोग आज भी दकियानूसी हैं, पर किस हद तक, मैं नहीं जानती। शुक्र कीजिए कि मैं उस माहौल में रह कर भी वहाँ की बातों से कभी सहमत नहीं हुई. उस गन्दी गली से मोह तो आज तक नहीं छूटा, आज भी सपने में जो भी देखूँ , घर वही होता है, लेकिन दिल से मुक्त हुई, इस अहसास को लेकर कि धार्मिकता, पिछड़ापन, दकियानूसीपन, ये सब इंसान को निर्दयी बनाते हैं.

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