Tuesday, 28 October 2014

धार्मिक पाखण्ड : देवी

धार्मिक पाखण्ड : देवी

मेरी बचपन की गली की मेरी हमउम्र दो लड़कियाँ पंजाब में कहीं ब्याही थीं. शायद दसवीं तक पढ़ाई की थी, माता-पिता की आर्थिक स्थिति साधारण थी. मुझे मालूम नहीं कि उनका वैवाहिक जीवन कैसा था? काफी सालों बाद पता चला कि एक के सिर पर नियमित देवी आती है. उस समय उसके घर पर सारा गली-पड़ोस इकट्ठा हो जाता है, सब कुछ न कुछ चढ़ावा लाते हैं, नकदी भी चढ़ाई जाती है, वह बाल बिखरा कर सिर ज़ोरों से चारों तरफ हिलाती रहती है, कोई कुछ पूछता है तो उसे सही-सही उसके बारे में बताती है, किसी को कोई समस्या हो तो उसे दूर करने का उपाय भी बताती है.

एक बार वह अपने पिता के घर दिल्ली आई हुई थी, मैं भी अपने पिता के घर गई तो मुझसे मिली। मैंने उससे पूछा कि 'यह देवी का क्या चक्कर है? क्या सचमुच तेरे ऊपर देवी आती है? कैसे आती है?' वह बोली, 'पता नहीं, कैसे आती है, पर आती है.' मैंने मज़ाक में कहा, 'यार, यह तो कमाई का अच्छा साधन है.' वह बोली, 'चल हट, तू तो नास्तिक है.' फिर बोली, 'कभी आ ना मेरे घर. सुना है, हर हफ्ते शिमला जाती है. हमारा शहर रास्ते में पड़ता है, कभी आ जा. पढ़-लिख कर इतनी बड़ी हो गई है कि बचपन की सहेलियों को भूल गई?'

मेरा पुत्र उस समय शिमला के बिशप कॉटन स्कूल में पढता था और मैंने उसके स्कूल से उससे हर हफ्ते मिलने की परमीशन ली हुई थी. मैं हर सप्ताह शनिवार की रात को दिल्ली से चल कर रविवार की सुबह शिमला पहुँचती, दिन भर बेटे के साथ बिताती और रविवार की रात को वहाँ से चल कर सोमवार सीधे अपने ऑफिस पहुँचती। मैंने बचपन की सहेली से वादा किया कि मैं उसके घर अवश्य आऊँगी।

जल्दी ही मैं उसके शहर में थी. उसके घर में उसके पति और बच्चों से मिली। ठीक-ठाक परिवार था. सास, ससुर, देवर, ननद का कोई झंझट नहीं। फिर सब उसके सिर पर देवी आने के किस्से सुनाने लगे. उसके पति ने कहा, 'जिस समय इसके सिर पर देवी आती है, इसमें गज़ब का जोश आ जाता है और शरीर में बहुत ताकत आ जाती है. यह देखो, एक बार उस समय इसने इस पलँग की पाटी पर हाथ मारा और पाटी टूट गई.' मैंने देखा, वाकई, लकड़ी की इतनी मोटी पाटी टूटना कोई आसान बात नहीं थी. फिर बोले, 'एक बार तो इसने घुमा के हाथ मेरे गाल पर थप्पड़ जड़ दिया।' वह बोली, 'अरे, एक बार नहीं, कई बार. उस समय होश थोड़े ही होता है.' मैंने हैरान होकर पूछा, 'और जीजा जी, आप पिट लिए?' वह बोले, 'अजी, यह उस समय किसी के बस में नहीं आती.' मैंने कहा, 'इसे कभी किसी डॉक्टर को दिखाया?' जीजा जी से पहले वह बोली, 'मोहिनी, तू नास्तिक है. देवी का ऐसे निरादर मत कर.'

मुझे शाम को ही दिल्ली के लिए बस पकड़नी थी. वह बोली, 'चल, तुझे उससे भी मिलवा दूँ. पास ही रहती है. वह हमसे बहुत ऊँची है मोहिनी, वह ब्रह्मकुमारी हो गई है, रहती अपने परिवार में ही है लेकिन मोहमाया से मुक्त है, पता है, अपने पति को भाई कहती है?' यानि वह दूसरी सखी. 'हैं?' मेरे आश्चर्य की सीमा नहीं थी. उस अजनबी शहर में मेरी दिल्लीवालियों के रहस्य खुल रहे थे. हम उसके घर पहुँचे। बड़ी गर्मजोशी से स्वागत हुआ. भरा-पूरा परिवार था, सास, ससुर, देवर, ननद, पति, उसके बच्चे, सब. ज़ाहिर है, उसके ब्रह्मकुमारी होने की बात छिड़नी ही थी. उसके पति बोले, 'क्या बताएँ साली जी, यह अब हमें राखी बाँधती है.' मैंने सखी से कहा, 'अच्छी-खासी गृहस्थी है तुम्हारी। अपना पत्नी-धर्म निभाओ और आराम से रहो.' वह बोली, 'चुप कर, गन्दी बातें मत कर. यह मेरे भाई हैं.' मैं दोनों जीजाओं को सम्वेदना-सहानुभूति भरा नमन करके वापस लौट आई. रास्ते भर सोचती रही, आखिर इन जवान, सुन्दर, भोली महिलाओं को हुआ क्या है जो भरी जवानी में पतियों को यूँ छोड़ बैठी हैं? एक देवी बन कर पति को थप्पड़ मार रही है, दूसरी पति को राखी बाँध रही है? और आराम से उस घर में साधिकार रह भी रही हैं. कोई तो कष्ट है इन दोनों को, वरना सुख में ऐसे टेढ़े रास्ते कौन अपनाता है? पर पतियों से बदला लेने का कमाल का रास्ता ढूँढा है.

सर्र से मेरे दिमाग में एक कहानी दौड़ गई. मैंने दिल्ली पहुँचते ही 'देवी' शीर्षक से कहानी लिखी कि गरीब, दकियानूसी माँ-बाप की बेपढ़ी-लिखी लड़कियों को भी आखिर ज़िन्दा रहना है, तलाक लेना उनके बस में नहीं, पर धर्म तो है आसरा देने के लिए.

2 comments:

  1. बहुत अच्छा लगा आपके विचारों को पढ़कर सचमुच स्थितियां बड़ी विचित्र है।इन सबमें अशिक्षित और शिक्षा प्राप्त अंधे लोग सभी रमे हुए हैं।कैसे भला होगा इनका।

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  2. बहुत अच्छा लगा आपके विचारों को पढ़कर सचमुच स्थितियां बड़ी विचित्र है।इन सबमें अशिक्षित और शिक्षा प्राप्त अंधे लोग सभी रमे हुए हैं।कैसे भला होगा इनका।

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