Wednesday, 8 October 2014

जीवे तेरा भाई, गली-गली भौजाई

जीवे तेरा भाई, गली-गली भौजाई

(31.10.2014 को 'जनसत्ता' में पृष्ठ 6 पर 'समांतर' कॉलम में "मुहावरों का दंश" शीषक से प्रकाशित)

सन्दर्भ : स्त्री-पुरुष सम्बन्ध / आकर्षण। लड़कियाँ सामान्यतया अच्छी होती हैं, अपवादस्वरूप खराब होती हैं. लड़के सामान्यतया खराब होते हैं, अपवादस्वरूप अच्छे होते हैं. लड़कों में आमतौर पर रेपिस्ट प्रवृत्ति पाई है. हर औरत को छूना-छेड़ना वे अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझते हैं. रानी-महारानी से लेकर नौकरानी तक पर उनकी बुरी नज़र होती है. गरीब, लाचार और बिना पढ़ी-लिखी लड़कियाँ आसान-शिकार होती हैं. प्रेम-व्रेम नाम की भावना लड़कों में कम ही पाई जाती है (अपवादों को छोड़ कर. अपवादस्वरूप मैंने ऐसे लड़के भी देखे हैं जो अपने प्रेम को पाने के लिए या प्रेम के छिनने पर पागल से हो गए.) लड़के यदि किन्हीं लड़कियों को हाथ लगाने की जुर्रत नहीं कर पाते तो वे होती हैं ऐसी लड़कियाँ जो धाकड़ यानि मर्दमार तरीके से रहती हैं. ऐसी लड़कियों से लड़के डर जाते हैं. ये डरने वाले लड़के भी अच्छे नहीं होते, बस डरे हुए होते हैं, इसलिए अच्छे बने हुए होते हैं.

अतीत के गर्भ में दबी एक बात अचानक मेरे स्मृतिपटल पर कौंध गई है, जिसे यहाँ बताना संगत लग रहा है.

मेरे पिता यानि दादा-दादी का घर पुरानी दिल्ली की एक गन्दी गली में एक बहुत बड़ी हवेली टाइप था. उसके आसपास भी हमारे मकान थे, जिन सब मे दादा का पूरा खानदान (तीन बेटों का) मिल-जुल कर रहता था. सबकी रसोई अलग-अलग थी लेकिन हर घडी का साथ था, मतलब एक-दूसरे में पूरी दखलंदाज़ी थी, जिसमे खूब आनंद आता था. मेरे एक तहेरे भाई थे यानि ताऊ जी के बेटे। हम इस वाले हिस्से में रहते थे, वो अपनी पत्नी सहित सामने वाले हिस्से में. सामने वाले हिस्से में ही दो और तहेरे भाई अपने परिवार सहित ऊपर-नीचे रहते थे. मुझसे सबका ख़ास प्यार था. भाइयों के साथ भी मेरी खूब पटती थी और भाभियों के साथ भी.

मेरे यह सामने वाले भाई बहुत ही हँसी-मज़ाकिया एवं प्रत्युत्पन्नमति थे. उनकी पत्नी से अच्छी बनती थी. दोनों के बीच कभी कोई मनमुटाव नहीं हुआ था। भाभी ज़्यादातर खीज कर, झुँझला कर ही बोलतीं थीं, लेकिन कोई बुरा नहीं मानता था और वो वैसे बोलते हुए अच्छी भी लगती थीं. सभी को चाय का बड़ा शौक था, हर घंटे चाय चाहिए थी. छुट्टी के दिन बस चाय-चाय. शाम को चाय बनते ही भाई की आवाज़ आती, 'मोहिनी, आ जा.' मैं जब अपने छज्जे पर खड़ी हो कर अपनी चाय पीती तो भाई भाग कर आते और मेरे कप में से एक घूँट ज़रूर पीते। हमें एक-दूसरे की जूठी चाय पीने में बड़ा मज़ा आता था. मुझे अपने सारे भाई बहुत पसंद थे और सारी भाभियाँ भी

बस, मैं कोई कहानी नहीं लिख रही, न सुना रही. यह थी मेरी आगे की बात की भूमिका।

मैं उस वक़्त बहुत छोटी थी, दस-बारह, तरह-चौदह, ऐसे ही कुछ. सारे भाई शाम को छत पर गुड्डी उड़ाते (हम पतंग को गुड्डी कहते थे). मैं चरखी पकड़ती। आसपास की सभी छतों पर गुड्डियाँ उड़तीं। भाभियों की अठखेलियाँ, वो काटा, वो काटा। मैंने एक शाम भाभियों से कहा, 'वो देखो सामने की छत वाला लड़का, उसकी कोई गुड्डी अभी तक नहीं कटी.'

तीनों भाभियों ने मेरा मुँह बंद कर दिया और एक कोने में ले जा कर फुसफुसा कर बोलीं, 'चुप. खबरदार जो किसी लड़के की बात की, तेरे भाई, बाप, ताऊ सुनेंगे तो तुझे यहीं गाड़ देंगे।'

मैं हैरान। मुझे समझ नहीं आया कि हुआ क्या?

फिर एक दिन मेरे चहेते भाई वाली भाभी भाई से खीज कर बोलीं, 'मेरे बस का नहीं है हर वक़्त चाय बनाना। अभी तो पी थी, अभी फिर बनाओ।'

मैं पास ही खड़ी थी. मैंने मज़ाक में कहा, 'भाई, आप भाभी को इतना तंग करेंगे तो भाभी आपसे बात करना बंद कर देंगी।'

भाई नाटकीय अंदाज़ में बोले, 'मोहिनी, तू फ़िक्र न कर. जीवे तेरा भाई, गली-गली भौजाई।'

क्या यह कोई मुहावरा था या भाई ने खुद ही बनाया था? लेकिन क्या कोई बहन अपने भाई से यह कह सकती है, भाई, जीवे तेरी बहना, गली-गली.......  छिः छिः वह लड़की तो वेश्या ही हो गई जिसके गली-गली में…… यदि ऐसी बात लड़की के लिए घृणित है, त्याज्य है, तो लड़कों के लिए क्यों नहीं? लड़के मज़ाक में अपने साथ अनेक लड़कियों को जोड़ कर गौरवान्वित होते हैं या कम से कम दिखाते हैं. मेरा कहने का अभिप्राय यह नहीं कि लड़कियाँ भी ऐसे बोलें बल्कि यह है कि लड़के इस तरह का बतरस आम लेते हैं और इसमें कुछ गलत नहीं समझा जाता, उन्हें कोई बुरा नहीं कहता। तो ऐसा क्यों है?

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