Friday, 3 October 2014

राम की पाती रावण के नाम Kavita 210

राम की पाती रावण के नाम

तुम्हारे मरने का एक दिन नियत है
लेकिन मैं रोज़ मर रहा हूँ
तिल-तिल जल रहा हूँ
क्योंकि मैं मर्यादा पुरुषोत्तम हूँ.

मर्यादा में रहना कोई आसान काम नहीं
नियमों का पाबन्द होना सरल नहीं होता
संस्कारों का निर्वहन हरेक के बस की बात नहीं
सहनशीलता को अर्जित किया है मैंने।

तुम विद्वान थे पर अहंकारी भी
तुम ज्ञानी थे पर अज्ञानी भी
तुम सर्वज्ञ थे पर अल्पज्ञ भी
इसीलिए सिद्ध होने पर भी निष्फल हुए.

काश ! तुमने भी बाँधा होता खुद को
तुमने भी खींची होती अपने लिए कोई रेखा
तुमने भी मारा होता अपने मन को
काश ! तुम्हें गुरूर न होता अपने होने पर.

तो इस तरह न मरते तुम सरेआम
इस तरह न फूँके जाते तुम्हारे पुतले।
इस तरह गली--गली चौराहे-चौराहे
न होता तुम्हारे होने पर हाहाकार।

सब कुछ पाने की धुन में कौन जीता है?
सब कुछ छोड़ने पर भी कौन रीता है?
एक दिन मर कर तुम हमेशा के लिए मरे
रोज़-रोज़ मर कर मैं हमेशा के लिए जिया।

(आओ, श्राद्ध के दिनों में रावण का श्राद्ध करें।)

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