Saturday, 4 October 2014

एक व्यक्तिगत क्षण Kavita 211

एक व्यक्तिगत क्षण

वह ख़ास शख्स बहुत आम था
हवा के एक हल्के से झोंके में बह गया.
मज़बूत दरख़्त की तरह
उसकी जड़ें जमी होंगी ज़मीन में,
मेरा वहम था.
उसे टूटने के लिए
सिर्फ एक बहाने का इंतज़ार था.
इतनी भव्य इमारत की नींव
क्या इतनी खोखली थी
जो एक ज़रा से झटके से ढह गई?
पुख्ता नहीं थे उसके पाँव
कमज़ोर थे उसके मन के शिकंजे
भावुक नहीं था वह
पर मन पर कोई लगाम भी नहीं कसी थी.
मैं भी ढह गई
जब मैंने उसे गिरते हुए देखा
ख़ास से आम बनते हुए देखा.
मेरे सब्र के लिए
बस एक सकारात्मक भाव था
वह पूरा नहीं गिरा था
वह पूरा नहीं टूटा था.
मेरी शर्म के लिए इतना काफी था.

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