Sunday, 5 October 2014

इतना कि बस Kavita 212

इतना कि बस

कल्पनाओं के महल ऊँचे
महल ऊँचे इतने
इतने कि बस.
पल में खंडहर हुए
खंडहर हुए इतने
इतने कि बस.
दिल में उठे झंझावात
झंझावात इतने
इतने कि बस.
सवाल रहे अनसुलझे
अनसुलझे इतने
इतने कि बस.

आँखों से खून झरा
खून झरा इतना
इतना कि बस.
सीने में शूल चुभा
शूल चुभा इतना
इतना कि बस.
बजता-बजता गीत रुका
गीत रुका इतना
इतना कि बस.
अकड़ा हुआ शीश झुका
शीश झुका इतना
इतना कि बस.

रोशनी की आभ घटी
आभ घटी इतनी
इतनी कि बस.
फूलों की गंध छँटी
गंध छँटी इतनी
इतनी कि बस.
उम्मीदें डूब गईं
डूब गईं इतनी
इतनी कि बस.
अँधियारी साँय-साँय
साँय-साँय इतनी
इतनी कि बस.

बहुत कहा, बहुत कहा
इतना कहा, इतना कहा
इतना कि बस.
बहुत सुना, बहुत सुना
इतना सुना, इतना सुना
इतना कि बस.
बहुत हुआ, बहुत हुआ
इतना हुआ, इतना हुआ
इतना कि बस.
बहुत सहा, बहुत सहा
इतना सहा, इतना सहा
इतना कि बस.

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