Wednesday, 15 October 2014

मुझसा कोई नहीं Kavita 213

मुझसा कोई नहीं

मुझसा मूरख कोई नहीं
जो कद्रदान को ठुकरा दे.

मुझसा न कोई बेईमान
जो हँस-हँस कर गुमराह करे.

मुझसा झूठा कोई नहीं
मैं खुश हू, जो हर वक़्त कहे.

मुझसा दम्भी कोई नहीं 
जो दीन-हीन हो कर इठलाए.

मुझसा कोई कंजूस नहीं
जो ना खर्चें ग़म की दौलत.

मुझसा कोई बेतुका नहीं
जो मुश्किल को पाना चाहे.

मुझसा कातिल कोई नहीं
जो अपने सपनों का खून करे.

मुझसा पागल कोई नहीं
जो दुःख में भी हँसता जाए.

मुझसा कोई बेसुरा नहीं
जो आशा के गाने गाए.

मुझसा न कोई भाग्यवान
जो फिर भी अच्छा फल पाए.

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